NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
किसान मुक्ति संसद: 'हमारे क़र्ज़ माफ़ करो, आत्महत्या कर रहे हैं किसानों के परिवारों ने की माँग
ऋण के बोझ से दबे किसानों को लगातार समर्थन के साथ-साथ, सरकार को प्रभावी कृषि बीमा, आपदा क्षतिपूर्ति और कम लागत वाली खेती को बढ़ावा देना चाहिए.
तारिक़ अनवर
21 Nov 2017
Translated by महेश कुमार
kisan sansad

18 वर्षीय मनीषा, तेलंगाना के सिद्दीपेट जिले के गोवरापल्ली गांव की निवासी हैं, जब वह सिर्फ 15 वर्ष की थीं तो उसने अपने माता-पिता कोखो दिया था. वे प्राकृतिक कारणों से नहीं मरे. देश में व्याप्त व्यवस्था ने उन्हें अपनी जीवन की दौड़ में असफल तो किया साथ ही उन्हें आत्महत्या करने के लिए भी मजबूर कर दिया.

मनीषा के माता-पिता किसान थे और उन्होंने सात एकड़ जमीन कपास की खेती के लिए पट्टे पर ली थी. उनके पिताजी ने निजी साहूकार से 3 लाख रुपये का क़र्ज़ लिया था. लेकिन सूखे और बीज की खराब गुणवत्ता की वजह से दो बार लगातार फसलें बर्बाद हो गयी, और साहूकार ने क़र्ज़ लौटाने के लिए उन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया.

परेशान और स्थिति से निपटने में असमर्थ, असहाय पिता को आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखा. 22 नवंबर 2014 की सुबह, खेत गए और कभी वापस नहीं आये, उन्होंने  जहर खाया और अपना जीवन समाप्त कर दिया.

लेकिन परिवार का संकट यहाँ ख़त्म नहीं हुआ. साहूकार लगातार उनके घर के चक्कर लगाता रहा, और परिवार पर दबाव बनाता रहा की वे उससे लिया उधार धन वापस करे. एक दिन, साहूकार ने घर में मौजूद एकमात्र बैल-गाड़ी को भी अपने साथ ले गया. परिवार इस दुखी स्थिति का सामना करने में असमर्थ रहा, मनीषा की मां ने भी एक चरम कदम उठाया और 27 फरवरी, 2015 को खुद को मार डाला.

मनीषा (जिसे कक्षा 12 के बाद पढ़ाई छोड़नी पडी) और उसके भई नितिन (जो नौवीं कक्षा में पढ़ रहा था) और जिसकी देखभाल उसके दादाजी कर रहे थे, वे चतुर्थ श्रेणी के सरकारी  कर्मचारी थे और अब पेंसनधारी हैं.

"इन तीन वर्षों में किसी भी सरकारी प्रतिनिधि ने हमारे घर का दौरा नहीं किया. और नहीं हमें कोई मुआवजा मिला. हमारे दादा की मृत्यु के बाद हमारी कौन देखभाल करेगा. हम कैसे जीवन व्यतीत करेंगे? मेरे पास तो राशन कार्ड भी नहीं है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का मिलना हमारे लिए एक ख्वाब जैसा ही है, "मनीषा ने ये बातें सोमवार को न्यूज़क्लिक को बतायी.

वह यानी मनीषा अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (ए.आई.के.एस.सी.सी.) के बैनर के तहत संसद मार्ग पर 184 किसानों के संगठनों द्वारा आयोजित ऐतिहासिक ‘किसान मुक्ति संसद’ में शरीक होने आई थी. देश भर में आत्महत्या करने वाले किसानों के सैकड़ों परिवारों के सदस्यों ने भी 40,000 से अधिक किसानों की सभा में भाग लिया.

गुजरात के सुरेंद्र नगर जिले में पत्री तालुका की पनिबेन वालजीभाई सोलंकी ने भी अपने पति को खो दिया है, जिन्होंने अपनी 10 एकड़ जमीन पर गेहूं और जीरे की खेती के लिए 5 लाख रुपये (बैंक से 2 लाख रुपये और बाकी साहूकार से) कर्ज लिए थे. लेकिन कम बारिश के कारण फसल तबाह हो गयी और नतीजतन बाजार से फसल को अच्छे दाम नहीं मिले.

उन्हें 600 रुपये प्रति क्विंटल गेहूं बेचना पड़ा; हालांकि, उस पर खर्च बहुत अधिक था "इससे पहले, पांच एकड़ जमीन पर फसलों की खेती करने के लिए (बीज से सिंचाई और उर्वरक तक) के लिए 5,000 रुपये पर्याप्त होते थे. लेकिन अब यह लागत 50,000 रुपये तक पहुंच गयी है. पहले  सिंचाई के लिए पानी मुफ्त मिलता था अब, पानी की कीमत 5 एकड़ जमीन के लिए 20,000 रुपये है, "उन्होंने बताया.

उसने कहा, पारिवारिक खर्चों और उधार की रकम वापस न कर पाने की वजह से, उनके पति ने खुद को फांसी लघा ली, "हमारे बातें सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है. परेशान लेकिन गुस्से से भरी महिला ने कहा: मोदी गुजरात के विकास के बारे में बातचीत करते हैं, लेकिन अपने राज्य में किसानों की दिक्कत को भूल गए हैं."

उनमें से एक 37 वर्षीय मंजुला भी तेलंगाना के यदुदिरी जिले के पुलिगीला गांव से एलेटी नरसिंह गौंड की पत्नी थीं. गौड़ ने 10 नवंबर 2014 को आत्महत्या की क्योंकि वह अपनी 7 एकड़ जमीन पर कपास पैदा करने के लिए  5 लाख रुपये क़र्ज़ लिए और उन्हें वे वापस नहीं कर पाए, यह पैसा उन्होंने साहूकार से ही लिया था.

फसल के खराब होने से, कम बाजार मूल्य (2,000-3,000 रुपये प्रति क्विंटल) और जमा हुए कर्ज ने उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया.

मंजुला अब दैनिक मजदूर के रूप में काम करती है और अपने परिवार के लिए प्रति दिन 100-150 रुपये कमाती है, उसके दो बच्चे हैं (एक बेटा जो स्नातक/ग्रेजुएशन कर रहा है और दूसरा बेटा 12 कक्षा में है). हालांकि कार्यकर्ताओं के दबाव एवं आन्दोलन के बाद सरकार ने उन्हें 2 लाख रुपये का मुवावजा दिया, लेकिन उसका अधिकांश हिस्सा कर्ज के एक बड़े हिस्से को अदा करने में चला गया.

बढ़ता कृषि संकट और उससे जुड़े कुछ तथ्य

  • भारत में कम से कम एक किसान हर घंटे आत्महत्या कर रहा है
  • 2014 और 2015 के बीच किसानों द्वारा की गयी आत्महत्या की संख्या में 42% की वृद्धि हुई
  • आत्महत्या करने वालों में 58 प्रतिशत हिस्सा उन किसानों का है जो कर्ज और फसल की बर्बादी के कारण आत्हत्या करते है.
  • दिवालियापन और क़र्ज़ में दबे किसानों की संख्या में पिछले तीन वर्षों में सबसे तेज वृद्धि देखी गई,  2014 की तुलना में लगभग तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई.
  • भारत में किसानों की आत्महत्याओं का 91% हिस्सा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में दर्ज किया गया है और यह बीजेपी शासित महाराष्ट्र में सबसे ऊपर है.
  • कृषि से उत्पन्न आय कभी भी किसान को क़र्ज़ के जाल से बाहर निकालने के लिए सक्षम नहीं है. आर्थिक सर्वेक्षण (2015-16) मानते हैं कि मध्यस्थ किसानों की औसत वार्षिक आय, उत्पादन लागत का शुद्ध, 20,000 रुपये से कम है. इसका मतलब प्रति किसान की प्रति महीने 1600 रुपये से भी कम की आय है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य पर एक और जुमला?

प्रधान मंत्री चुने जाने से पहले, नरेंद्र मोदी ने एम. एस. स्वामिनाथन समिति की सिफारिशों का सम्मान करने और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) का भुगतान करने का वादा किया जो कि लागत पर 50% लाभप्रदता सुनिश्चित करेगा. लेकिन यह वादा भी एक और "जुमला" बन कर रह गया.

किसान की लूट

ए.आई.के.एस.सी.सी. के अनुमान के हिसाब से खरीफ सीजन 2017-18 में शीर्ष सात फसलों (धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, बाजरा, मूंगफली और उडद) के लिए मौजूदा एम.एस.पी. के मुकाबले किसानों ने पहले ही 6,283 करोड़ रुपये गंवा दिए हैं यानी माल घाटे पर बेच दिया.उसी अध्ययन के अनुसार, किसानों द्वारा बेची जाने वाली कुल फसल के लिए, मौजूदा एम.एस.पी. की तुलना में अनुमानित नुकसान 35,968 करोड़ रुपये तक का होगा. और अगर  वादा की गयी एम.एस.पी. की तुलना में, अर्थात्, उत्पादन की लागत + 50%, की तुलना में किसानों का नुकसान 2 लाख करोड़ रुपये तक का होगा.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि खरीफ 2017-18 की फसल की 14 फसलों के बीच, सात फसलों के लिए एम.एस.पी. उत्पादन की लागत से नीचे तय तय की गयी है और अन्य उच्च सात फसलों के लिए, उत्पादन की लागत के ऊपर केवल 2% से 19% का मार्जिन ही रखा गया है.

कॉर्पोरेट्स के लिए क़र्ज़ और करोड़ों रुपए की क़र्ज़ माफ़ी और किसानों को गोली!

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार कर एवं कर्ज माफ़ी के लिए अडानी और अंबानियों पर सौगातों की बोछारे करती है और देश के किसानों द्वारा क़र्ज़ और न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करने पर उन्हें गोली मारते हैं.

उत्तर प्रदेश चुनावों में, बीजेपी ने किसानों से ऋण माफी का शानदार वादा किया था. इसकी सच्ची तस्वीर अब व्यापक रूप से सबके सामने है, वादे की धज्जियाँ उड़ाते हुए 'चुनाव के बाद इसके कार्यान्वयन के बाद', यूपी में किसानों को मात्र 1 पैसे, 19 पैसे, 1 रुपया और २ रूपए के क़र्ज़ माफ़ लिए गए हैं.

निति के मामले में निर्लज दोहरा मापदंड

यह भी नोट करना महत्वपूर्ण है, कि दोनों, सरकार और मीडिया घराने  के प्रतिनिधी बड़े अमीर कंपनियों के लिए करों और क़र्ज़ माफ़ी के "प्रोत्साहन" को एक “”इनाम” के रूप में पेश करते हैं. लेकिन जब किसान क़र्ज़ माफ़ी या न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करते हैं तो वे इसे "सब्सिडी" का बोझ मानते हैं - यह शर्मनाक है कि सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आर.बी.आई.), जोकि  बैंकिंग क्षेत्र के नियामक का काम करता है, दोनों ने ही लुटेरे पूंजीपतियों की सूची को जानबूझकर गुप्त रखा है जिन्होंने लाखों करोड़ के क़र्ज़ वापस नहीं किये. इसके विपरीत, किसान जो केवल 15,000 रुपये के अपने फसल ऋण को वापस करने में विफल रहते हैं या कम न्यूनतम समर्थन मूल्य या शत्रुतापूर्ण माहौल के कारण क़र्ज़ वापस नहीं कर पाते हैं उनको समाचारों में शर्मिंदा किया जाता है और अंतत उन्हें मिलता है अपमान और मृत्यु
 

मांगें

ए.आई.के.एस.सी.सी. ने निम्नलिखित मांगों को पेश किया है:

किसानों की कड़ी मेहनत पर उचित और लाभकारी रिटर्न, जो उत्पादन की कुल लागत से कम से कम 50% अधिक हो. किसान संगठनों ने सभी बड़ी फसलों के साथ-साथ और अन्य उपजों जैसे कि दूध और जंगल के छोटे उत्पादन के लिए भी मांग की है, और इस तरह की कीमत को सभी किसानों के लिए वैधानिक मूल्य बनया जाए और उसकी गारंटी की जाए, ताकि यह केवल एक कीमत की घोषणा बन कर न रहे जाए और घोषित कीमत सभी किसानों को मिले इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

एक स्थायी संस्थागत तंत्र के माध्यम से क़र्ज़ से निजात मिले जो कि न केवल तत्काल ऋण माफी बल्कि सभी किसानों की संस्थागत और गैर-संस्थागत क़र्ज़ पर भी लागू हो, क़र्ज़ के द्वारा बोझ तले दबे किसानों को लगातार सहायता मिले. सरकार को प्रभावी फसल बीमा योजना, आपदा क्षतिपूर्ति और कम या बिना किसी लागत वाली खेती को बढ़ावा देना भी सुनिश्चित करना चाहिए.

kisan mukti sansad
Modi
farmer crises
farmer suicide

Related Stories

मोदी का ‘सिख प्रेम’, मुसलमानों के ख़िलाफ़ सिखों को उपयोग करने का पुराना एजेंडा है!

कटाक्ष: महंगाई, बेकारी भुलाओ, मस्जिद से मंदिर निकलवाओ! 

यूपी चुनाव: छुट्टा पशुओं की बड़ी समस्या, किसानों के साथ-साथ अब भाजपा भी हैरान-परेशान

कोविड के दौरान बेरोजगारी के बोझ से 3 हजार से ज्यादा लोगों ने की आत्महत्या

किसानों और सरकारी बैंकों की लूट के लिए नया सौदा तैयार

टीकाकरण फ़र्जीवाड़ाः अब यूपी-झारखंड के सीएम को भी बिहार में लगाया गया टीका

कृषि क़ानूनों के वापस होने की यात्रा और MSP की लड़ाई

चुनावी मौसम में नये एक्सप्रेस-वे पर मिराज-सुखोई-जगुआर

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या

अबकी बार, मोदी जी के लिए ताली-थाली बजा मेरे यार!


बाकी खबरें

  • अनिल सिन्हा
    उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!
    12 Mar 2022
    हालात के समग्र विश्लेषण की जगह सरलीकरण का सहारा लेकर हम उत्तर प्रदेश में 2024 के पूर्वाभ्यास को नहीं समझ सकते हैं।
  • uttarakhand
    एम.ओबैद
    उत्तराखंडः 5 सीटें ऐसी जिन पर 1 हज़ार से कम वोटों से हुई हार-जीत
    12 Mar 2022
    प्रदेश की पांच ऐसी सीटें हैं जहां एक हज़ार से कम वोटों के अंतर से प्रत्याशियों की जीत-हार का फ़ैसला हुआ। आइए जानते हैं कि कौन सी हैं ये सीटें—
  • ITI
    सौरव कुमार
    बेंगलुरु: बर्ख़ास्तगी के विरोध में ITI कर्मचारियों का धरना जारी, 100 दिन पार 
    12 Mar 2022
    एक फैक्ट-फाइंडिंग पैनल के मुतबिक, पहली कोविड-19 लहर के बाद ही आईटीआई ने ठेके पर कार्यरत श्रमिकों को ‘कुशल’ से ‘अकुशल’ की श्रेणी में पदावनत कर दिया था।
  • Caste in UP elections
    अजय कुमार
    CSDS पोस्ट पोल सर्वे: भाजपा का जातिगत गठबंधन समाजवादी पार्टी से ज़्यादा कामयाब
    12 Mar 2022
    सीएसडीएस के उत्तर प्रदेश के सर्वे के मुताबिक भाजपा और भाजपा के सहयोगी दलों ने यादव और मुस्लिमों को छोड़कर प्रदेश की तकरीबन हर जाति से अच्छा खासा वोट हासिल किया है।
  • app based wokers
    संदीप चक्रवर्ती
    पश्चिम बंगाल: डिलीवरी बॉयज का शोषण करती ऐप कंपनियां, सरकारी हस्तक्षेप की ज़रूरत 
    12 Mar 2022
    "हम चाहते हैं कि हमारे वास्तविक नियोक्ता, फ्लिपकार्ट या ई-कार्ट हमें नियुक्ति पत्र दें और हर महीने के लिए हमारा एक निश्चित भुगतान तय किया जाए। सरकार ने जैसा ओला और उबर के मामले में हस्तक्षेप किया,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License