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भारत
राजनीति
किसान मुक्ति संसदः प्रदर्शन के दौरान किसान 'एक-बार कुल ऋण माफी' की मांग करेंगे
क़रीब 50% किसान कर्ज़दार हैं, हर साल 12000 से ज़्यादा आत्महत्याएं करते हैं - क्या सरकार इसे सुन रही है?
सुबोध वर्मा
18 Nov 2017
famers mukti sansad

पूरे देश के किसान ऐतिहासिक 'किसान मुक्ति संसद' (किसान लिबरेशन संसद) के लिए दिल्ली में 20-21 नवंबर को इकट्ठा हो रहे हैं। उनकी मुख्य मांगों में से दो इस प्रकार है: उत्पादन तथा ऋण राहत के लिए बेहतर क़ीमत। ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं: किसान कर्ज़दार हो जाते हैं क्योंकि अन्य चीज़ों के अलावा उनको अपने उत्पादन के लिए पर्याप्त क़ीमत नहीं मिलती है। ऋणग्रस्तता के पैमाने पर भारतीय किसानों की स्थिति चौंकाने वाली है, और तो और ये वही हैं जो सभी भारतीयों को भोजन मुहैय्या कराते हैं। इस संसद में उन किसानों के परिवार भी हिस्सा लेंगे जो आत्महत्या करने को मजबूर थें।

पिछले 10 वर्षों की अगर बात करें तो वर्ष 2005-06 में भारत का खाद्य उत्पादन 365 मिलियन टन से बढ़कर 2015-16 में 534 मिलियन टन हो गया। इसमें अनाज और सब्जियां तथा फल शामिल हैं। समान अवधि में किसानों के संगठनों के अनुसार करीब 150,000 किसानों ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वे कर्ज चुकाने में अक्षम थें या फसलों का भारी नुक़सान हो गया था। कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रत्येक दुखद आत्महत्या के लिए ऐसे सैकड़ों लोग होंगे जो समान कर्ज़ की स्थितियों में हैं।

एनएसएसओ सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार किसान परिवारों में कर्ज़दार परिवारों के शेयर वर्ष 1992 में 25.9% से बढ़कर वर्ष 2013 में 45.9% हो गए। प्रति ग्रामीणपरिवार में औसत कर्ज़ करीब 70,000 रुपए से ज़्यादा था, लेकिन अगर औसतन कर्ज़दार परिवारों को ही लिया जाता है, तो यह प्रति परिवार 1.5 लाख रुपए तक अचानक बढ़ जाता है। क्या आपको लगता है कि ऋण परिसंपत्तियों जैसे कि भूमि या मशीनरी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, ऋण-संपत्ति अनुपात के आंकड़े इस भ्रम को दूर करते हैं: ऋण-संपत्ति अनुपात वर्ष 1992 में 1.61 से बढ़कर वर्ष 2013 में 2.46 पर पहुंच गए। इसका मतलब यह है कि उक्त परिवारों द्वारा परिसंपत्तियां रखने की तुलना में कर्ज़ कहीं अधिक बढ़ गया है। इसका कारण यह है कि बड़े पैमाने पर कर्ज़ के पैसे का इस्तेमाल बीज, उर्वरक की ख़रीदारी आदि के लिए किया जाता है।

एक अन्य एनएसएसओ सर्वेक्षण में बताया गया है कि क़रीब 40% ऋण गैर-संस्थागत स्रोतों जैसे पेशेवर साहूकारों तथा दुकानदारों से लिया जाता है। ब्याज दर30% से भी अधिक हो सकता है, पेशेवर साहूकारों से कर्ज़ लेने वाले हर तीसरे या उससे ज़्यादा किसान अधिक ब्यजा दरों के बोझ तले दबे होते हैं। अखिल भारतीय किसान सभा के अनुसार, किसानों को हर साल 36% से 60% प्रतिवर्ष ब्याज दरों पर साहूकारों, उर्वरक, कीटनाशक तथा बीजों के डीलरों से कर्ज़ लेने को मजबूर किया गया है। इसके अलावा विश्लेषण से पता चला है कि बैंक ऋण में ज्यादातर बड़े भूमि मालिकों द्वारा दख़ल दिया जाता है, जो गरीब वर्गों को ऋणदाताओं की दया पर छोड़ देते हैं।

इन्ही चीज़ों ने खेतिहर समाज के रोष को जन्म दिया, विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर के किसानों को जिनके पास कर्ज़ चुकाने के कोई संसाधन नहीं है और वे दिन-प्रतिदिन कर्ज़ में डुबते चले चा रहे हैं। यह उल्लेखनीय है कि जब सरकार कंपनियों को 'दिवालिया' होने से बचने तथा इस प्रकार की ऋण चुकौती के लिए कानूनों को आसान बना रही है ऐसे में किसानों के लिए इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। अन्य उद्यमों की तुलना में कहीं ज्यादा किसानों को अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। बारिश की कमी, अत्यधिक वर्षा, ग़ैर-मौसमी बारिश, मूसलधार बारिश, तूफान तथा प्रचंड हवा, कीटों के हमलों आदि के कारण किसानों को फसल के नुक़सान का सामना करना पड़ सकता है। बदलते माहौल के साथ ऐसी घटनाएं लगातार अधिक होती जा रही हैं। फिर भी कोई भी ऋण छोड़ा नहीं गया है। कई अन्य देशों में किसानों के लिए 'ग़ैर-आश्रय ऋण' की यह प्रथा मौजूद है।

सरकार बीमा योजना से फसल नुक़सान की समस्या को हल करने की कोशिश कर रही है। लेकिन पिछले साल के प्रदर्शन से पता चलता है कि किसानों का एक बड़ा हिस्सा छोड़ दिया जाता है, दावे का निपटारा नहीं किया जाता है - तथा निजी कंपनियां सरकार की निपटान राशि को गटक करके पूरे सेट-अप से हजारों करोड़अर्जित कर रही हैं।

यह इस पृष्ठभूमि में है कि पिछले कुछ सालों से किसान आंदोलन कर रहे हैं और अब अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) की सहयोगी संस्था के बैनर तले दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं। कर्ज़ के संबंध में उनकी मांगों में से एक 31 मई, 2017 के अनुसार सभी किसानों की बकाया फसल ऋण का एक बार छूट है, किसानों के ऋण राहत आयोग की स्थापना के ज़रिए किसानों के निजी (गैर-संस्थागत) कृषि ऋणों से ऋण राहत। इसमें निजी ऋणों के निपटारे के साथ-साथ निजी ऋण को बैंक ऋण में परिवर्तित करने के लिए ऋण स्वैपिंग, सभी किसानों का समय-बद्ध समावेश, सीमांत किसानों सहित, अगले 2 वर्षों के भीतर पट्टेदार किसानों और बटाईदारों को संस्थागत ऋण (क्रेडिट) प्रणाली में, आपदा राहत तथा फसल बीमा की एक प्रभावी प्रणाली जिससे कि किसान किसी खराब वर्ष में भी अपने कर्ज का अधिकांश हिस्सा निपटा दें और समय पर अपना फसल ऋण चुकाने वाले किसानों को दंडित करने से बचने के लिए, पिछले मौसम में चुकाए गए फसल ऋण की राशि के बराबर छोटे किसानों के बैंक खातों के लिए ऋण शामिल होना चाहिए।

 

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