NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
किसान मुक्ति संसदः प्रदर्शन के दौरान किसान 'एक-बार कुल ऋण माफी' की मांग करेंगे
क़रीब 50% किसान कर्ज़दार हैं, हर साल 12000 से ज़्यादा आत्महत्याएं करते हैं - क्या सरकार इसे सुन रही है?
सुबोध वर्मा
18 Nov 2017
famers mukti sansad

पूरे देश के किसान ऐतिहासिक 'किसान मुक्ति संसद' (किसान लिबरेशन संसद) के लिए दिल्ली में 20-21 नवंबर को इकट्ठा हो रहे हैं। उनकी मुख्य मांगों में से दो इस प्रकार है: उत्पादन तथा ऋण राहत के लिए बेहतर क़ीमत। ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं: किसान कर्ज़दार हो जाते हैं क्योंकि अन्य चीज़ों के अलावा उनको अपने उत्पादन के लिए पर्याप्त क़ीमत नहीं मिलती है। ऋणग्रस्तता के पैमाने पर भारतीय किसानों की स्थिति चौंकाने वाली है, और तो और ये वही हैं जो सभी भारतीयों को भोजन मुहैय्या कराते हैं। इस संसद में उन किसानों के परिवार भी हिस्सा लेंगे जो आत्महत्या करने को मजबूर थें।

पिछले 10 वर्षों की अगर बात करें तो वर्ष 2005-06 में भारत का खाद्य उत्पादन 365 मिलियन टन से बढ़कर 2015-16 में 534 मिलियन टन हो गया। इसमें अनाज और सब्जियां तथा फल शामिल हैं। समान अवधि में किसानों के संगठनों के अनुसार करीब 150,000 किसानों ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वे कर्ज चुकाने में अक्षम थें या फसलों का भारी नुक़सान हो गया था। कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रत्येक दुखद आत्महत्या के लिए ऐसे सैकड़ों लोग होंगे जो समान कर्ज़ की स्थितियों में हैं।

एनएसएसओ सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार किसान परिवारों में कर्ज़दार परिवारों के शेयर वर्ष 1992 में 25.9% से बढ़कर वर्ष 2013 में 45.9% हो गए। प्रति ग्रामीणपरिवार में औसत कर्ज़ करीब 70,000 रुपए से ज़्यादा था, लेकिन अगर औसतन कर्ज़दार परिवारों को ही लिया जाता है, तो यह प्रति परिवार 1.5 लाख रुपए तक अचानक बढ़ जाता है। क्या आपको लगता है कि ऋण परिसंपत्तियों जैसे कि भूमि या मशीनरी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, ऋण-संपत्ति अनुपात के आंकड़े इस भ्रम को दूर करते हैं: ऋण-संपत्ति अनुपात वर्ष 1992 में 1.61 से बढ़कर वर्ष 2013 में 2.46 पर पहुंच गए। इसका मतलब यह है कि उक्त परिवारों द्वारा परिसंपत्तियां रखने की तुलना में कर्ज़ कहीं अधिक बढ़ गया है। इसका कारण यह है कि बड़े पैमाने पर कर्ज़ के पैसे का इस्तेमाल बीज, उर्वरक की ख़रीदारी आदि के लिए किया जाता है।

एक अन्य एनएसएसओ सर्वेक्षण में बताया गया है कि क़रीब 40% ऋण गैर-संस्थागत स्रोतों जैसे पेशेवर साहूकारों तथा दुकानदारों से लिया जाता है। ब्याज दर30% से भी अधिक हो सकता है, पेशेवर साहूकारों से कर्ज़ लेने वाले हर तीसरे या उससे ज़्यादा किसान अधिक ब्यजा दरों के बोझ तले दबे होते हैं। अखिल भारतीय किसान सभा के अनुसार, किसानों को हर साल 36% से 60% प्रतिवर्ष ब्याज दरों पर साहूकारों, उर्वरक, कीटनाशक तथा बीजों के डीलरों से कर्ज़ लेने को मजबूर किया गया है। इसके अलावा विश्लेषण से पता चला है कि बैंक ऋण में ज्यादातर बड़े भूमि मालिकों द्वारा दख़ल दिया जाता है, जो गरीब वर्गों को ऋणदाताओं की दया पर छोड़ देते हैं।

इन्ही चीज़ों ने खेतिहर समाज के रोष को जन्म दिया, विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर के किसानों को जिनके पास कर्ज़ चुकाने के कोई संसाधन नहीं है और वे दिन-प्रतिदिन कर्ज़ में डुबते चले चा रहे हैं। यह उल्लेखनीय है कि जब सरकार कंपनियों को 'दिवालिया' होने से बचने तथा इस प्रकार की ऋण चुकौती के लिए कानूनों को आसान बना रही है ऐसे में किसानों के लिए इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। अन्य उद्यमों की तुलना में कहीं ज्यादा किसानों को अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। बारिश की कमी, अत्यधिक वर्षा, ग़ैर-मौसमी बारिश, मूसलधार बारिश, तूफान तथा प्रचंड हवा, कीटों के हमलों आदि के कारण किसानों को फसल के नुक़सान का सामना करना पड़ सकता है। बदलते माहौल के साथ ऐसी घटनाएं लगातार अधिक होती जा रही हैं। फिर भी कोई भी ऋण छोड़ा नहीं गया है। कई अन्य देशों में किसानों के लिए 'ग़ैर-आश्रय ऋण' की यह प्रथा मौजूद है।

सरकार बीमा योजना से फसल नुक़सान की समस्या को हल करने की कोशिश कर रही है। लेकिन पिछले साल के प्रदर्शन से पता चलता है कि किसानों का एक बड़ा हिस्सा छोड़ दिया जाता है, दावे का निपटारा नहीं किया जाता है - तथा निजी कंपनियां सरकार की निपटान राशि को गटक करके पूरे सेट-अप से हजारों करोड़अर्जित कर रही हैं।

यह इस पृष्ठभूमि में है कि पिछले कुछ सालों से किसान आंदोलन कर रहे हैं और अब अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) की सहयोगी संस्था के बैनर तले दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं। कर्ज़ के संबंध में उनकी मांगों में से एक 31 मई, 2017 के अनुसार सभी किसानों की बकाया फसल ऋण का एक बार छूट है, किसानों के ऋण राहत आयोग की स्थापना के ज़रिए किसानों के निजी (गैर-संस्थागत) कृषि ऋणों से ऋण राहत। इसमें निजी ऋणों के निपटारे के साथ-साथ निजी ऋण को बैंक ऋण में परिवर्तित करने के लिए ऋण स्वैपिंग, सभी किसानों का समय-बद्ध समावेश, सीमांत किसानों सहित, अगले 2 वर्षों के भीतर पट्टेदार किसानों और बटाईदारों को संस्थागत ऋण (क्रेडिट) प्रणाली में, आपदा राहत तथा फसल बीमा की एक प्रभावी प्रणाली जिससे कि किसान किसी खराब वर्ष में भी अपने कर्ज का अधिकांश हिस्सा निपटा दें और समय पर अपना फसल ऋण चुकाने वाले किसानों को दंडित करने से बचने के लिए, पिछले मौसम में चुकाए गए फसल ऋण की राशि के बराबर छोटे किसानों के बैंक खातों के लिए ऋण शामिल होना चाहिए।

 

kisan mukti yatra
kisan
farmer suicide
kisan sabha

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय

यूपी चुनाव दूसरा चरण: अल्पसंख्यकों का दमन, किसानी व कारोबार की तबाही और बेरोज़गारी हैं प्रमुख मुद्दे

कोविड के दौरान बेरोजगारी के बोझ से 3 हजार से ज्यादा लोगों ने की आत्महत्या

उत्तराखंड चुनाव : जंगली जानवरों से मुश्किल में किसान, सरकार से भारी नाराज़गी

बजट के नाम पर पेश किए गए सरकारी भंवर जाल में किसानों और बेरोज़गारों के लिए कुछ भी नहीं!

फ़ैक्ट चेकः योगी का दावा ग़लत, नहीं हुई किसानों की आय दोगुनी

यूपीः बीजेपी नेताओं का विरोध जारी, गांव से बैरंग लौटा रहे हैं किसान


बाकी खबरें

  •  Punjab security lapse
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब में पीएम की "सुरक्षा चूक" पर पूरी पड़ताल!
    06 Jan 2022
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे में आज अभिसार शर्मा चर्चा कर रहे प्रधानमंत्री के पंजाब दौरे की। साथ ही वे नज़र डाल रहे हैं कि किस तरह मीडिया द्वारा किसानों को टारगेट किया जा रहा है
  • fact check
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेक : संबित ने जर्जर स्कूलों को सपा सरकार का बताया, स्कूल योगी सरकार के निकले
    06 Jan 2022
    एक बार फिर बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने ट्विटर पर फ़ेक न्यूज़ के ज़रिये विपक्ष पर निशाना साधने की कोशिश की है।
  • jnu
    रवि कौशल
    जेएनयू हिंसा के दो साल : नाराज़ पीड़ितों को अब भी है न्याय का इंतज़ार 
    06 Jan 2022
    ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस की जांच भटक चुकी है। अब तक दोषियों की पहचान तक नहीं की जा सकी है।
  • punjab security
    शंभूनाथ शुक्ल
    'सुरक्षा चूक' की आड़ में राजनीतिक स्टंट?
    06 Jan 2022
    प्रधानमंत्री को एयरपोर्ट में पंजाब के अधिकारियों को दिए बयान से बचना चाहिए था। और जो कुछ करना था, वह सीधे गृह मंत्रालय के आला अधिकारी करते तो भविष्य में ऐसी किसी भी चूक से प्रशासन सतर्क रहते। तथा…
  • election
    सौरभ शर्मा
    यूपी: युवाओं को रोजगार मुहैय्या कराने के राज्य सरकार के दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते हैं!
    06 Jan 2022
    लगभग 43 उम्मीदवारो को उत्तर प्रदेश में पिछले साल विभिन्न चिकित्सा विभागों द्वारा विभिन्न कोरोना लहरों के दौरान में रोजगार पर रखा गया था। बाद में इन्हें काम से मुक्त कर दिया गया। उन्होंने इस कदम के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License