NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
किसानों की ज़िन्दगी -#1
बिनय दिनेश्वर देहरी : झारखण्ड के एक मालपहाड़ी आदिवासी किसान
वैशाली बंसल
23 Dec 2017
farmers crisis

2017 में देश भर में किसान आन्दोलनों की लहर सी उठ गयी I ऐसा क्यों हुआ इसे समझने के लिए न्यूज़क्लिक देश भर के विभिन्न किसानों पर एक सिरीज़ लेकर आया है,जो कि किसानों के इंटरव्यू पर आधारित है और जिसे दिल्ली के छात्रों द्वारा सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनोमिक रिसर्च की मदद से बनाया गया है I इस श्रंखला की भूमिका यहाँ पढ़ें I

45 साल के बिनय दिनेश्वर देहरी एक माल पहारी आदिवासी किसान हैं ,जो कि झारखंड के दुमका जिले से किसान मुक्ति संसद में हिस्सा लेने आये थे I बिनय दिनेश्वर देहरी एक अर्द्ध श्रमजीवी परिवार से आते हैं जहाँ बहुत मुश्किल गुज़ारा होता है I उन्हें सरकार से अपनी ज़मीन को बेहतर बनाने ,बेहतर आदान पाने और औपचारिक कर्ज़ पाने के लिए कोई सहारा नहीं मिलता I उन्हें अत्याधिक ब्याज़ लेने वाले साहूकारों से ही कर्ज़ पर निर्भर रहना पड़ता है ,  जिससे वह जंगल की ज़मीन पर छोटी मोटी खेती कर पाते हैं I बिना नये आदानों,टेक्नोलॉजी और निवेश के , खेती का उत्पाद कम होता है और उनकी कमाई बहुत कम होती है .

धुमका ज़िला झारखण्ड के उत्तर पूर्व में संथाल इलाके में स्थित है जहाँ ज़्यादातर आदिवासी रहते हैं. बिनय कुन्दपहारी में रहते हैं जो कि धमुका ज़िले गोपीकांदेर ब्लॉक में स्थित है I कुन्दापहरी गाँव में 100 घर हैं , और वह बंस्लाई नदी के किनारे बसा हुआ है I इस गाँव में 3 बस्तियाँ हैं जिनमें से एक में मालपहाड़ी आदिवासी रहते हैं और बाकि दो में संथाल आदिवासी I मालपहाड़ी बस्ती में एक प्राइमेरी स्कूल और एक आंगनवाड़ी है और संथाल इलाके में एक मिडल स्कूल है . गाँव में एक स्वास्थ सेवा केंद्र की इमारत भी है पर वह क्रियाशील नहीं है I सबसे करीबी स्वास्थ् केंद्र , मारकेट और बैंक अम्रापारा में हैं जो कि यहाँ से 10 किलोमीटर की दूरी पर है I 2011 के सेन्सस के अनुसार कुंडापहारी की 567 हैकटेयर ज़मीनी इलाका जंगल से घिरा हुआ है I

बिनय एक गरीब आदिवासी किसान है जिनके बड़े परिवार में 19 लोग हैं  उनके घर में उनके बूढ़े माँ-बाप, उनका परिवार , उनके भाई का परिवार और उनकी छोटी बहन का परिवार है .बिनय और उसका बहनोई खेत पर काम करने के आलावा अपना परिवार चलाने के लिए मज़दूरी भी करते हैं. उनके बड़े भाई जो पहले पंचायक सेवा का काम भी किया करते थे , अब काम करने के लिए बहुत बूढ़े हो गए हैं. औरतें घर का काम करने के साथ खेत में भी काम  करती हैं .

 इस परिवार के लोग 4 एकड़ जंगल की ज़मीन पर खेती करते हैं जिसका पट्टा उन्हें नहीं मिला है . यह ज़मीन पथरीली और असिंचित है . इसपर सिर्फ खरीफ़ के मौसम में ही खेती हो सकती है. पिछले साल इस परिवार ने 2 एकड़ ज़मीन पर बर्बाती की खेती की थी . बुआई मक्के , बाजरे , तूअर और कुल्थी के मिले जुले बीजों को बिखेरकर की गयी थी . परिवार के पास बीज और रासायनिक खाद खरीदने के लिए पैसे नहीं है . उनके पास ज्यादा खाद भी नहीं है. ज़मीन ज्यादा उपजाऊ नहीं है और उपजाऊपन बचाए रखने के लिए हर साल ज़मीन का कुछ हिस्सा खाली छोड़ना पड़ता है . बिनय का कहना है कि ज़मीन की उपज उनके परिवार के गुज़ारे  के लिए काफी नहीं होती . पिछले खरीफ़ के मौसम में 6 क्विंटल बर्बाती, 5 क्विंटल मक्का, और एक क्विंटल बाजारे की उपज हुई थी .

बर्बाती की उपज को हाट में बेचकर उन्हें कुछ पैसा मिलता है जिससे वो चावल खरीदते हैं  . मक्के और बाजरे की उपज से इस परिवार की ही ज़रूरतों को पूरा नहीं हो पाती और कई बार खर्चे पूरा करने के लिए उन्हें बीज बेचने पड़ते हैं. बीजों को या तो गाँव के व्यापारियों को या फिर साप्ताहिक हाट में  बेच दिया जाता है.

बिनय ने कहा “आदिवासी इलाकों में खेती से आमदनी की जगह हमें नुक्सान उठाना पड़ता है जिस वजह से हम कर्ज़ लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं”. उन्होंने हमे बताया कि , कम उपज होने की वजह से,परिवार अगले मौसम के लिए बीज बचा नहीं पाया , इसी वजह से उन्हें  व्यापारियों से बीज लोन पर लेने पड़े . जब बीज कर्ज़े पर लिए जाते हैं तो फसल के बाद कर्ज़ पर लिए गए कर्जों का ढाई गुना चुकाना पड़ता है . परिवार को व्यापारियों से पैसे भी कर्ज़ पर लेने पड़ते हैं , और ये कर्ज़ वापस करने के लिए कई बार व्यापारियों को बीज भी देने पड़ते हैं , जिनकी कीमत व्यापारी कम करके आँकते हैं . नोटबंदी के समय इन व्यापारियों के साथ व्यापार और भी कठिन हो गया था क्योंकि व्यापारी 500 के लेंन देंन पर सिर्फ 300 रुपये के नए नोट दे रहे थे .

खेती से परिवार की मूलभूत ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पाती हैं . बीजों के लोन को चुकाने के लिए उपज का एक हिस्सा देने के बाद , 4 एकड़ ज़मीन पर परिवार के द्वारा की गयी उपज की कीमत सिर्फ 23,357रुपये थी . क्योंकि खेती से गुज़ारा नहीं चल पता इसलिए बिनय और उनके बहनोई को पश्चिम बंगाल में दिहाड़ी मज़दूरी करने के लिए जाना पड़ता है . पिछले साल वो सितम्बर , दिसंबर और फरवरी में 15 से 20 दिनों के लिए वहाँ गए थे . पश्चिम बंगाल में उन्हें एक ठेकेदार के द्वारा काम मिला जिसके लिए उन्हें एक दिन में 200 रुपये मिलते थे . इससे पहले वो काम के लिए गुजरात और मुंबई भी जा हो चुके हैं .

पिछले 5 दशकों से कृषि के क्षेत्र में हो रहे तकनीकि विकास का कोई फायदा  बिनय देहरी जैसे गरीब आदिवासी किसानों को नहीं हुआ है . बिना सरकार की सहायता के , कृषि उत्पाद बहुत कम होता है और गरीब किसानों की हालत अनिश्चित .

वैशाली बंसल जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय ,नई दिल्ली की एक रिसर्च स्कॉलर 

farmers crises
farmers suicide
BJP
agrarian crises

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • women in politics
    तृप्ता नारंग
    पंजाब की सियासत में महिलाएं आहिस्ता-आहिस्ता अपनी जगह बना रही हैं 
    31 Jan 2022
    जानकारों का मानना है कि अगर राजनीतिक दल महिला उम्मीदवारों को टिकट भी देते हैं, तो वे अपने परिवारों और समुदायों के समर्थन की कमी के कारण पीछे हट जाती हैं।
  • Indian Economy
    प्रभात पटनायक
    बजट की पूर्व-संध्या पर अर्थव्यवस्था की हालत
    31 Jan 2022
    इस समय ज़रूरत है, सरकार के ख़र्चे में बढ़ोतरी की। यह बढ़ोतरी मेहनतकश जनता के हाथों में सरकार की ओर से हस्तांतरण के रूप में होनी चाहिए और सार्वजनिक शिक्षा व सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हस्तांतरणों से…
  • Collective Security
    जॉन पी. रुएहल
    यह वक्त रूसी सैन्य गठबंधन को गंभीरता से लेने का क्यों है?
    31 Jan 2022
    कज़ाकिस्तान में सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) का हस्तक्षेप क्षेत्रीय और दुनिया भर में बहुराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बदलाव का प्रतीक है।
  • strike
    रौनक छाबड़ा
    समझिए: क्या है नई श्रम संहिता, जिसे लाने का विचार कर रही है सरकार, क्यों हो रहा है विरोध
    31 Jan 2022
    श्रम संहिताओं पर हालिया विमर्श यह साफ़ करता है कि केंद्र सरकार अपनी मूल स्थिति से पलायन कर चुकी है। लेकिन इस पलायन का मज़दूर संघों के लिए क्या मतलब है, आइए जानने की कोशिश करते हैं। हालांकि उन्होंने…
  • mexico
    तान्या वाधवा
    पत्रकारों की हो रही हत्याओंं को लेकर मेक्सिको में आक्रोश
    31 Jan 2022
    तीन पत्रकारों की हत्या के बाद भड़की हिंसा और अपराधियों को सज़ा देने की मांग करते हुए मेक्सिको के 65 शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License