NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
किसानों की ज़िन्दगी #5
शांति : बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले के नारौली से एक दलित किसान जो खेती के लिए ज़मीन किराये पर लिती हैं I
अंकुर वर्मा
04 Jan 2018
farmers crises

2017 में देश भर में किसान आन्दोलनों की लहर सी उठ गयी I ऐसा क्यों हुआ इसे समझने के लिए न्यूज़क्लिक देश भर के विभिन्न किसानों पर एक सिरीज़ लेकर आया है,जो कि किसानों के इंटरव्यू पर आधारित है और जिसे दिल्ली के छात्रों द्वारा सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनोमिक रिसर्च की मदद से बनाया गया है I इस श्रंखला की भूमिका यहाँ पढ़ें I

शांति बिहार के मुज़्ज़फरपुर ज़िले के मुशाहारी ब्लॉक के नारौली गाँव की एक किसान हैं I वे 70 साल की हैं और किसानी के साथ-साथ उन्हें दूसरों के खेतों में मज़दूरी भी करनी पड़ती है I उनके पति उनसे उम्र में कुछ साल बड़े हैं और वे थोड़े समय पहले तक रिक्शा चलाते थे, लेकिन अब उनमें काम करने की हिम्मत नहीं रही I शांति और उनके पति दोनों ही अनपढ़ हैं, लेकिन शांति ने अपना नाम लिखना सीख लिया है I उनके चार बेटे हैं I उनका सबसे बड़ा बेटा पेंटर का काम करता है और उसकी पत्नी घर का काम देखती हैं और जानवरों की देखभाल करती हैI शांति के दो 27 साल के जुड़वाँ बेटे हैं जो दिल्ली में दिहाड़ी मज़दूर हैं I सबसे छोटा बेटा 22 साल का है और कॉलेज में पढ़ रहा है I शांति के दो पोते और दो पोतियाँ हैं I

नारौली एक बड़ा गाँव है I 2011 की जनगणना के अनुसार इसमें 1083 घर हैं और यहाँ की कुल आबादी 5157 है I यहाँ से सबसे क़रीब शहर मुज़्ज़फरपुर है जो 14 किलोमीटर दूर है I शांति के परिवार के पास उनका अपना एक छोटा से घर है लेकिन खेती की ज़मीन नहींI पिछले दो साल उन्होंने सालाना 35,000 रूपये पर 0.17 एकड़ ज़मीन किराये पर ली I इसपर वे खरीफ़ के मौसम में धान और रबी के मौसम में मक्का और धनिया उगाते हैं I सिंचाई के लिए वे एक पंपसेट किराये पर लेते हैं I

पिछले रबी के मौसम (नवम्बर 2016 से अप्रैल 2017) में छ: क्विंटल मक्के की फ़सल हुई जिसमें से दो क्विंटल अपने इस्तेमाल के लिए रखकर बाकि गाँव के व्यापारी को बेच दी गयीI उन्होंने 40 किलोग्राम धनिया के पत्ते भी उगाये जिन्हें समय-समय पर तोड़कर गाँव में ही 10 रूपये प्रति किलो के हिसाब से बाँट दिया गया I परिवार ने खेत के लिए कुछ खाद, DAP और यूरिया भी खरीदाI उन्होंने 700 रूपये के मक्के के बीज खरीदेI पूरे खेती के मौसम में उन्होंने 18 बार खेत की सिंचाई की जिसमें पंपसेट और डीज़ल मिलाकर 1980 रूपये खर्च हुए I इस छोटे से खेत में खेती के लिए परिवार ने ही अपना श्रम दिया किसी भी बाहरी मज़दूर को नहीं रखा गया I मज़दूरी का खर्च बचाने के बावजूद इन्होंने मुश्किल से ही अपनी लागत की भरपाई कीI मक्के की फ़सल में 1145 रूपये का फ़ायदा हुआ लेकिन धनिये की फ़सल में उन्हें 700रूपये का नुक्सान उठाना पड़ा I

जून 2017 में उन्होंने धान की खेती के लिए ज़मीन तैयार करने शुरू कर दिया I इसके लिए उन्होंने 300 रूपये में एक ट्रेक्टर किराये पर लिया I उन्होंने 500 रूपये में बीज और 900 रूपये में खाद और यूरिया खरीदा I मौसम की शुरुआत में उन्हें दो बार खेत में पानी छोड़ना था जिसके लिए उन्होंने 220 रूपये खर्च किये I ये सारा खर्च बेकार गया क्योंकि बाढ़ से उनकी फ़सल बर्बाद हो गयी I फ़सल बर्बाद हो जाने के लिए न उन्हें सरकार से कोई मुआवज़ा नहीं मिला न ही किसी बीमा एजेंसी से I धान की फ़सल के लिए उन्होंने जो भी खर्चा किया वो वसूल नहीं हुआ और उन्हें 3,670 रूपये का नुक्सान झेलना पड़ा I अगर धान की फ़सल उगाने के लिए परिवार ने जो श्रम दिया उसे भी जोड़ा जाये तो इनका नुक्सान और भी ज़्यादा था I

परिवार के साल भर के हिसाब-किताब को देखकर मालूम पड़ता है कि किसानी से इन्हें नुक्सान हुआ है I पूरा घर मूलतः शांति और मुजफ्फरपुर में काम करने वाले उनके बड़े बेटे की कमाई से ही चल पाया I शांति खेत मज़दूर के तौर पर काम करती हैं I जब उन्हें काम मिल पता है तो वो दिन के 110 रूपये कमा पाते हैं I

कम आय के चलते इन्हें अक्टूबर 2016 में एक अनौपचारिक बचत ग्रुप से 2 प्रतिशत प्रतिमाह की ब्याज़दर से 15,000 रूपये उधार लेने पड़े I पिछले साल 5,000 रूपये लौटा देने के बावजूद उनपर अब भी ब्याज़ मिलकर कुल 13,500 रूपये का कर्ज़ है I

साल 2016 में नोटबंदी के दौरान परिवार के पास बैंक में जमा करने के लिए पुराने हज़ार और पाँच सौ के नोट थे ही नहीं I शांति का एक जन धन खाता है लेकिन उसमें डालने के लिए उसके पास रूपये नहीं है I मार्च 2017 तक उनके पास नए नोट नहीं थे और तब तक उन्हें सब ज़रूरत की चीज़ें उधार पर ही लेनी पड़ीं I स्थानीय दूकानदार ने उन्हें खाने की चीज़ें और बाकि ज़रूरत का सामान उधार पर दिया I इसी समय परिवार में से किसी को डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा और डॉक्टर की फ़ीस भी उन्होंने बाद में ही दिए I जब शांति के बेटों ने दिल्ली से उन्हें कुछ रकम भेजी तभी शांति ये सारा पैसा चुका पायीं I

अंकुर वर्मा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली  में शोधार्थी है I      

इस श्रंखला का पहला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं I

इस श्रंखला का दूसरा भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं I

इस श्रंखला का तीसरा भाग आप यहाँ  पढ़  सकते हैं I

इस श्रंखला का चौथा  भाग आप यहाँ  पढ़ सकते हैं I

farmers crises
farmer suicide
Bihar
Narauli
demonitisation
BJP

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

बिहार : जीएनएम छात्राएं हॉस्टल और पढ़ाई की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    मुद्दा: बिखरती हुई सामाजिक न्याय की राजनीति
    11 Apr 2022
    कई टिप्पणीकारों के अनुसार राजनीति का यह ऐसा दौर है जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिकी और देश-समाज की बदहाली पर राज करेगा। लेकिन विभिन्न तरह की टिप्पणियों के बीच इतना तो तय है कि वर्तमान दौर की राजनीति ने…
  • एम.ओबैद
    नक्शे का पेचः भागलपुर कैंसर अस्पताल का सपना अब भी अधूरा, दूर जाने को मजबूर 13 ज़िलों के लोग
    11 Apr 2022
    बिहार के भागलपुर समेत पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल के 13 ज़िलों के लोग आज भी कैंसर के इलाज के लिए मुज़फ़्फ़रपुर और प्रदेश की राजधानी पटना या देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का चक्कर काट…
  • रवि शंकर दुबे
    दुर्भाग्य! रामनवमी और रमज़ान भी सियासत की ज़द में आ गए
    11 Apr 2022
    रामनवमी और रमज़ान जैसे पर्व को बदनाम करने के लिए अराजक तत्व अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, सियासत के शह में पल रहे कुछ लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगे हैं।
  • सुबोध वर्मा
    अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता
    11 Apr 2022
    सीएमआईए के मुताबिक़, श्रम भागीदारी में तेज़ गिरावट आई है, बेरोज़गारी दर भी 7 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा ही बनी हुई है। साथ ही 2020-21 में औसत वार्षिक आय भी एक लाख सत्तर हजार रुपये के बेहद निचले स्तर पर…
  • JNU
    न्यूज़क्लिक टीम
    JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !
    11 Apr 2022
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो साल बाद फिर हिंसा देखने को मिली जब कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों ने राम नवमी के अवसर कैम्पस में मांसाहार परोसे जाने का विरोध किया. जब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License