NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
किसके लिए रफ़ाल डील में डीलर और कमीशनखोर पर मेहरबानी की गई?
सरकार बार-बार कहती है कि रफाल डील में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। वही सरकार एक बार यह भी बता दे कि रफाल डील की शर्तों में भ्रष्टाचार होने पर कार्रवाई के प्रावधान को क्यों हटाया गया?
रवीश कुमार
11 Feb 2019
Rafale

आज के हिन्दू में रफाल डील की फाइल से दो और पन्ने बाहर आ गए हैं। इस बार पूरा पन्ना छपा है और जो बातें हैं वो काफी भयंकर हैं। द हिन्दू की रिपोर्ट को हिन्दी में भी समझा जा सकता है। सरकार बार-बार कहती है कि रफाल डील में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। वही सरकार एक बार यह भी बता दे कि रफाल डील की शर्तों में भ्रष्टाचार होने पर कार्रवाई के प्रावधान को क्यों हटाया गया? वह भी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में इसे हटाया गया।

क्या आपने रक्षा ख़रीद की ऐसी कोई डील सुनी है जिसकी शर्तों में से किसी एजेंसी या एजेंट से कमीशन लेने या अनावश्वयक प्रभाव डालने पर सज़ा के प्रावधान को हटा दिया जाए? मोदी सरकार की कथित रूप से सबसे पारदर्शी डील में ऐसा ही किया गया है। मोदी जी बता दें कि किस डीलर को बचाने के लिए इस शर्त को हटाया गया है?

हिन्दू अख़बार में अपने पहले पन्ने के पूरे कवर पर विस्तार से इसे छापा है। अगर सब कुछ एक ही दिन छपता तो सरकार एक बार में प्रतिक्रिया देकर निकल जाती। अब उसे इस पर भी प्रतिक्रिया देनी होगी। क्या पता फिर कोई नया नोट जारी कर दिया जाए। एन राम ने जब 8 फरवरी को नोट का आधा पन्ना छापा तो सरकार ने पूरा पन्ना जारी करवा दिया। उससे तो आधे पन्ने की बात की ही पुष्टि हुई। लेकिन अब जो नोट जारी हुआ है वह उससे भी भयंकर है और इसे पढ़ने के बाद समझ आता है कि क्यों अधिकारी प्रधानमंत्री कार्यालय के समानांतर रूप से दखल देने को लेकर चिन्तित थे।

एन राम ने रक्षा ख़रीद प्रक्रिया की शर्तों का हवाला देते हुए लिखा है कि 2013 में बनाए गए इस नियम को हर रक्षा ख़रीद पर लागू किया जाना था। एक स्टैंडर्ड प्रक्रिया अपनाई गई थी कि कोई भी डील हो इसमें छूट नहीं दी जा सकती। मगर भारत सरकार ने फ्रांस की दो कंपनियों दास्सों और एमबीडीए फ्रांस को अभूतपूर्व रियायत दी।

रक्षा मंत्रालय के वित्तीय अधिकारी इस बात पर ज़ोर देते रहे कि पैसा सीधे कंपनियों के हाथ में नहीं जाना चाहिए। यह सुझाव दिया गया कि सीधे कंपनियों को पैसे देने की बजाए एस्क्रो अकाउंट बनाया जाए। उसमें पैसे रखे जाएं। यह खाता फ्रांस की सरकार का हो और वह तभी भुगतान करे जब दास्सो और एमबीडीए फ्रांस सारी शर्तों को पूरा करते हुए आपूर्ति करे। यह प्रावधान भी हटा दिया गया। ऐसा क्यों किया गया। क्या यह पारदर्शी तरीका है? सीधे फ्रांस की कंपनियों को पैसा देने और उसे उनकी सरकार की निगेहबानी से मुक्त कर देना, कहां की पारदर्शिता है।

एन राम ने लिखा है कि ऐसा लगता है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से ये बातें छिपाई हैं। क्या सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इस डील में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधानमंत्री कार्यालय की भी भूमिका रही है? इस सवाल का जवाब सरकार से आ सकता है या फिर सुप्रीम कोर्ट से।

एन राम का कहना है कि बग़ैर ऊपर से आए दबाव के इन शर्तों को हटाना आसान नहीं है। बेवजह प्रभाव डालने पर सज़ा का प्रावधान तो इसीलिए रखा जाता होगा कि कोई ख़रीद प्रक्रिया में दूसरे चैनल से शामिल न हो जाए और ठेका न ले ले। एजेंट और एजेंसी का पता चलने पर सज़ा का प्रावधान इसीलिए रखा गया होगा ताकि कमीशन की गुंज़ाइश न रहे। अब आप हिन्दी में सोचें, क्या यह समझना वाकई इतना मुश्किल है कि इन शर्तों को हटाने के पीछे क्या मंशा रही होगी?

23 सितंबर 2016 को दिल्ली में भारत और फ्रांस के बीच करार हुआ था। इसके अनुसार दास्सों रफाल एयरक्राफ्ट की सप्लाई करेगा और MBDA फ्रांस भारतीय वायुसेना को हथियारों का पैकेज देगी। इसी महीने में पर्रिकर की अध्यक्षता में रक्षा ख़रीद परिषद की बैठक हुई थी। इस बैठक में ख़रीद से संबंधित आठ शर्तों को बदल दिया गया। इनमें आफसेट कांट्रेक्ट और सप्लाई प्रोटोकोल भी शामिल हैं। आफसेट कांट्रेक्ट को लेकर ही विवाद हुआ था क्योंकि अनिल अंबानी की कंपनी को रक्षा उपकरण बनाने का ठेका मिलने पर सवाल उठे थे। 24 अगस्त 2016 को पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में रक्षा की मंत्रिमंडलीय समिति ने मंज़ूरी दे दी थी।

डील से एजेंट, एजेंसी, कमीशन और अनावश्यक प्रभाव डालने पर सज़ा के प्रावधान को हटाने से जो कमर्शियल सप्लायर थे उनसे सीधे बिजनेस करने का रास्ता खुल गया। इस बात को लेकर भारतीय बातचीत दल के एम पी सिंह, ए आर सुले और राजीव वर्मा ने असहमति दर्ज कराई थी। दि हिन्दू के पास जो दस्तावेज़ हैं उससे यही लगता है कि इन तीनों ने काफी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। दो कंपनियों के साथ सीधे डील करने वाली बात पर नोट में लिखते हैं कि ख़रीद दो सरकारों के स्तर पर हो रही है। फिर कैसे फ्रांस सरकार उपकरणों की आपूर्ति, इंडस्ट्रीयल सेवाओं की ज़िम्मेदारी फ्रांस के इंडस्ट्रीयल सप्लायरों को सौंप सकती हैं। यानी फिर सरकारों के स्तर पर डील का मतलब ही क्या रह जाता है जब सरकार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं रह जाती है।

तीनों अधिकारी इस बात को लेकर भी आपत्ति करते हैं कि ख़रीद के लिए पैसा फ्रांस सरकार को दिया जाना था। अब फ्रांस की कंपनियों को सीधे दिया जाएगा। वित्तीय ईमानदारी की बुनियादी शर्तों से समझौता करना उचित नहीं होगा।

अब आप हिन्दी में सोचें। रक्षा मंत्रालय के तीन बड़े अधिकारी लिख रहे हैं कि वित्तीय ईमानदारी की बुनियादी शर्तों से समझौता करना उचित नहीं होगा। वे क्यों ऐसा लिख रहे थे?

आखिर सरकार फ्रांस की दोनों कंपनियों को भ्रष्टाचार की स्थिति में कार्रवाई से क्यों बचा रही थी? अब मोदी जी ही बता सकते हैं कि भ्रष्टाचार होने पर सज़ा न देने की मेहरबानी उन्होंने क्यों की। किसके लिए की। दो डिफेंस सप्लायर के लिए क्यों की ये मेहरबानी।

एन राम अब इस बात पर आते हैं कि इस मेहरबानी को इस बात से जोड़ कर देखा जाए कि क्यों भारत सरकार ने सत्तर अस्सी हज़ार करोड़ की इस डील के लिए फ्रांस सरकार से कोई गारंटी नहीं मांगी। आप भी कोई डील करेंगे तो चाहेंगे कि पैसा न डूबे। बीच में कोई गारंटर रहे। मकान ख़रीदते समय भी आप ऐसा करते हैं। यहां तो रक्षा मंत्रालय के अधिकारी कह रहे हैं कि बैंक गारंटी ले लीजिए, सरकार से संप्रभु गांरटी ले लीजिए मगर भारत सरकार कहती है कि नहीं हम कोई गारंटी नहीं लेंगे। ये मेहरबानी किसके लिए हो रही थी?

एन राम ने लिखा है कि इसके बदले सरकार लेटर ऑफ कंफर्ट पर मान जाती है जिसकी कोई कानून हैसियत नहीं होती है। उसमें यही लिखा है कि अगर सप्लाई में दिक्कतें आईं तो फ्रांस की सरकार उचित कदम उठाएगी। 
यह लेटर ऑफ कंफर्ट भी देर से आया। 24 अगस्त 2016 की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक से पहले तक गारंटी लेने का प्रस्ताव था। यही कि फ्रांस की सरकार के पास एक खाता हो जिसे एस्क्रो अकाउंट कहते हैं। उसी के ज़रिए जब जब जैसा काम होगा, जितनी सप्लाई होगी, उन दो कंपनियों को पैसा दिया जाता रहेगा। कंपनियां भी इस भरोसे काम करेंगी कि माल की सप्लाई के बाद पैसा मिलेगा ही क्योंकि वह उसी की सरकार के खाते में है। लेकिन रक्षा मंत्रालय के निदेशक ख़रीद स्मिता नागराज इसे हटा देने का प्रस्ताव भेजती हैं और मंज़ूरी मिल जाती है। प्रधानमंत्री ने इसे मंज़ूरी क्यों दी ? 
अब आप यहां 8 फरवरी को छपी एन राम की रिपोर्ट को याद कीजिए। उस रिपोर्ट में यही था कि 24 नवंबर 2015 को रक्षा मंत्रालय के तीन शीर्ष अधिकारी आपत्ति दर्ज करते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय हमारी जानकारी के बग़ैर स्वतंत्र रूप से इस डील में घुस गया है। जिससे हमारी टीम की मोलभाव की क्षमता कमज़ोर हो जाती है। रक्षा सचिव जी मोहन कुमार भी इससे सहमत होते हुए रक्षा मंत्री को फाइल भेजते हैं। और कहते हैं कि य़ह उचित होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय इससे दूर रहे।

इस नोट पर रक्षा मंत्री करीब डेढ़ महीने बाद साइन करते हैं। 11 जनवरी 2016 को। ख़ुद रक्षा मंत्री फाइल पर साइन करने में डेढ़ महीना लगाते हैं। लेकिन रक्षा मंत्रालय मे वित्तीय सलाहकार सुधांशु मोहंती को फाइल देखने का पर्याप्त समय भी नहीं दिया जाता है। 14 जनवरी 2016 को सुधांशी मोहंती नोट-263 में लिखते हैं कि काश मेरे पास पूरी फाइल देखने और अनेक मुद्दों पर विचार करने का पर्याप्त समय होता। फिर भी चूंकि फाइल तुरंत रक्षा मंत्री को सौंपी जानी है मैं वित्तीय नज़र से कुछ त्वरित टिप्पणियां करना चाहता हूं।

मोहंती लिखते हैं कि अगर बैंक गारंटी या संप्रभु गारंटी की व्यवस्था नहीं हो पा रही है तो कम से एक एस्क्रो अकाउंट खुल जाए जिसके ज़रिए कंपनियों को पैसा दिया जाए। इससे सप्लाई पूरी कराने की नैतिक ज़िम्मेदारी फ्रांस की सरकार की हो जाएगी। चूंकि फ्रांस की सरकार भी इस डील में एक पार्टी है और सप्लाई के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार है तो उसे इस तरह के खाते से आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

मोहंती अपने नोट में सरकार और कंपनी के बीच विवाद होने पर कैसे निपटारा होगा, उस पर जो सहमति बन चुकी थी, उसे हटाने पर भी एतराज़ दर्ज किया गया है। कानून मंत्रालय ने भी बैंक गारंटी और संप्रभु गारंटी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। रक्षा मंत्रालय को भेजे गए अपने नोट में।

अब आप ख़ुद सोचें और हिन्दी में सोचें। कोई भी कथित रूप से ईमानदार सरकार किसी सौदे से भ्रष्टाचार की संभावना पर कार्रवाई करने का प्रावधान क्यों हटाएगी? बिना गारंटी के सत्तर अस्सी हज़ार करोड़ का सौदा क्यों करेगी? क्या भ्रष्टाचार होने पर सज़ा के प्रावधानों को हटाना पारदर्शिता है? आप जब इन सवालों पर सोचेंगे तो जवाब मिल जाएगा।

(रवीश कुमार की ये टिप्पणी उनके आधिकारिक फेसबुक पेज से साभार ली गई है।)

Rafale deal
Rafale Controversy
Dassault
Dassault-Reliance deal
Modi government
France
the hindu news paper
N Ram
ravish kumar

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेता


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License