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भारत
राजनीति
किसने गढ़ी मोदी की छवि?
कैसे इंटरनेट जगत के एक माहिर खिलाड़ी को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए अपने साथ जोड़ा और अपनी एक अलग छवि गढ़ी।
सिरिल सैम, परंजॉय गुहा ठाकुरता
11 Mar 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Moneycontrol (File Photo)

राजनीतिक सोच को प्रभावित करने में फेसबुक और व्हाट्सएप की भूमिका का एहसास काफी समय तक नहीं हुआ था। 2002 के आखिरी दिनों में पश्चिम भारत के राज्य गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। उस वक्त गुजरात को भारतीय जनता पार्टी और वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का गढ़ माना जाता था।

2002 में ही गुजरात में मुस्लिम समाज के खिलाफ दंगे हुए थे। इससे मोदी की छवि खराब हुई थी। ऐसे में मोदी खुद की छवि ‘उद्योग जगत’ और ‘तकनीक’ के अनुकूल बनाने की कोशिश कर रहे थे। राजनीतिक लाभ लेने के लिए डिजिटल मीडिया की मदद लेने की दिशा में वे सोचने की शुरुआत कर चुके थे।

इसे भी पढ़ें : क्यों फेसबुक कंपनी को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की मांग उठ रही है?

2010 में नरेंद्र मोदी की मुलाकात राजेश जैन से हुई। मुंबई में रहने वाले राजेश जैन इंटरनेट क्षेत्र के बड़े कारोबारी हैं। राजेश जैन ने मोदी के सामने एक पावर प्वाइंट प्रस्तुति दी। इसका शीर्षक था- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, 2014।

चार महीने बाद राजेश जैन को गुजरात सरकार की सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी गुजरात इन्फॉर्मेटिक्स लिमिटेड का निदेशक बना दिया गया। इसके बाद के तीन सालों में राजेश जैन ने भारत के आधुनिक राजनीतिक इतिहास का सबसे विस्तृत राजनीतिक मार्केटिंग अभियान चलाया। इसके लिए उन्होंने अन्य कारोबारियों, बैंकरों, पत्रकारों और भाजपा के आईटी प्रकोष्ठ के लोगों का साथ लिया। जैन के इस अभियान के बारे में भाजपा के विरोधी यह कहते हैं कि इसके जरिये मोदी की छवि के आसपास मिथक गढ़ने का काम किया गया।

इसे भी पढ़ें : #सोशल_मीडिया : लोकसभा चुनावों पर फेसबुक का असर?

जैन की अपनी एक योजना थी। उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई से कम्युनिकेशंस इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। बाद में उन्होंने न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई की।

1993 में जैन तब खबरों में आए थे जब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का भारत सरकार द्वारा किए जा रहे बचाव के झूठ का पर्दाफाश किया था। राव पर रिश्वत के एक मामले में संलिप्त होने का आरोप था। उन पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने मुंबई के स्टॉक ब्रोकर हर्षद मेहता से एक करोड़ रुपये की रिश्वत ली है। मेहता एक प्रमुख वित्तीय घोटाले के केंद्र में थे। 

प्रधानमंत्री कार्यालय ने नरसिम्हा राव के बचाव में एक तस्वीर जारी की थी। इसमें राव को पाकिस्तान के विदेश मंत्री से मिलते हुए दिखाया गया था। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से यह दावा किया गया कि यह तस्वीर ठीक उसी वक्त की है जिस वक्त के बारे में हर्षद मेहता दावा कर रहे हैं कि उन्होंने राव को रिश्वत दी है।

इंडिया टुडे में छपी उस तस्वीर का विश्लेषण करके राजेश जैन ने यह साबित किया कि प्रधानमंत्री कार्यालय झूठ बोल रहा है। उस रिपोर्ट में तस्वीर को झूठ साबित करने वाली कंपनी का नाम रावी डाटाबेस कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड बताया गया था। उस वक्त राजेश जैन इस कंपनी के प्रमुख थे।

राजेश जैन दूसरी बार 1994 में अमेरिका गए। इस बार उन्होंने पहली बार इंटरनेट की अपार संभावनाओं को समझा। इसके बाद मार्च, 1995 में उन्होंने इंडिया वर्ल्ड के नाम से एक कंपनी शुरू की। उनका दावा है कि यह भारत की पहली डिजिटल मीडिया कंपनी थी। 

इसे भी पढ़ें : मुफ्त इंटरनेट के जरिये कब्ज़ा जमाने की फेसबुक की नाकाम कोशिश?

पांच साल के अंदर ही राजेश जैन को जैकपॉट मिला। दिसंबर, 1999 में इंडिया वर्ल्ड कम्युनिकेशंस को सत्यम इंफोवे ने 499 करोड़ रुपये में खरीद लिया। तब तक इंडिया वर्ल्ड न सिर्फ वेबसाइट चलाने वाली कंपनी बल्कि इंटरनेट सेवा मुहैया कराने वाली, वेबसाइट होस्ट करने वाली, मेल सेवा देने वाली और सर्च ईंजन की सुविधा देने वाली कंपनी बन गई थी। यह कंपनी नौ वेबसाइट चला रही थी। इनमें खबरों, खेल, मनोरंजन, पर्सनल फायनांस, इतिहास और खान-पान से संबंधित वेबसाइट शामिल थे। उस दौर में इंडिया वर्ल्ड  के वेब पेज को देखने वालों की संख्या 1.3 करोड़ थे। इस वेबसाइट को देखने वालों में अधिकांश देश के बाहर रहने वाले भारतीय थे। इस सौदे के बाद अगले दो साल तक राजेश जैन ने सत्यम इंफोवे में काम किया। 

2001 में राजेश जैन ने नेटकोर सॉल्यूशंस को संभाल लिया। इंडिया वर्ल्ड  का सॉफ्टवेयर से संबंधित काम यही कंपनी देखती थी। आज नेटकोर का दावा है कि वह देश की सबसे बड़ी डिजिटल मार्केटिंग और कैंपेन मैनेजमेंट की सेवा देने वाली कंपनी है। अपनी दूसरी पारी में राजेश जैन ने भारतीय राजनीति में असरदार भूमिका निभाई। 

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#सोशल_मीडिया : क्या नरेंद्र मोदी की आलोचना से फेसबुक को डर लगता है?

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सोशल मीडिया की अफवाह से बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा

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