“काश! ये बेटियां बिगड़ जाएं...” ये दुआ है उर्दू के मशहूर शायर और वैज्ञानिक गौहर रज़ा की। इसी के साथ वे पूछते हैं कि “नाम किसके करूँ/ इन ख़िज़ाओं को मैं/ किस से पूछूँ/ बहारें किधर खो गयीं/ किससे जाकर कहूँ/ ज़र्द पत्तों का बन, अब मेरा देस है/ दर्द की अंजुमन, अब मेरा देस है।
“काश! ये बेटियां बिगड़ जाएं...” ये दुआ है उर्दू के मशहूर शायर और वैज्ञानिक गौहर रज़ा की। इसी के साथ वे पूछते हैं कि “नाम किसके करूँ/ इन ख़िज़ाओं को मैं/ किस से पूछूँ/ बहारें किधर खो गयीं/ किससे जाकर कहूँ/ ज़र्द पत्तों का बन, अब मेरा देस है/ दर्द की अंजुमन, अब मेरा देस है।