NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कोलेबिरा उपचुनाव : आदिवासी अस्मिता, राजनीति के नए रास्ते की तलाश में
कोलेबिरा उपचुनाव के परिणाम से कोई अप्रत्याशित राजनीतिक निष्कर्ष भले ही न निकले लेकिन प्रवृति के तौर पर इस क्षेत्र की आदिवासी अस्तित्व की राजनीति और इस समाज की नयी पीढ़ी में आ रहे बदलाओं का सूत्र-संकेत तो देगा ही।
अनिल अंशुमन
18 Dec 2018
सांकेतिक तस्वीर

अभी सम्पन्न हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति के गैर भाजपा खेमे में एक नयी सरगर्मी पैदा कर दी है। साथ ही चुनावी एकजुटता को लेकर हो रही कवायदों का भी आत्मविश्वास बढ़ाया है। लेकिन 20 दिसंबर को होनेवाले झारखंड के कोलेबिरा विधानसभा उपचुनाव की सियासी हलचल में इसका कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं दिख रहा बल्कि यहाँ तो भाजपा को हराने के नाम पर गैर भाजपा महागठबंधनी जमात में ही सभी दल एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोके हुए हैं। राज्य के महागठबंधनी राजनीति का शीराज़ा इस कदर बिखर गया है कि उम्मीदवार खड़ा करने और समर्थन देने के सवाल पर सभी ने अपने अपने कुनबे खड़ा कर लिये हैं। यह उपचुनाव वर्तमान विधायाक के एक पारा टीचर हत्याकांड में सजायाफ्ता हो जाने से उनकी विधायकी समाप्त हो जाने के कारण हो रहा है।

आदिवासी आरक्षित सीट होने के कारण सभी प्रत्याशी स्थानीय आदिवासी ही हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में आदिवासी बहुलता होने के कारण आदिवासी राजनीति भी एक निर्णायक पहलू है जिसके लिए सभी दल अपनी विशेष रणनीति के साथ ज़ोर आजमाइश में भिड़े हुए हैं। इस सीट पर कभी जीत हासिल नहीं करने वाले सत्ताधारी दल भाजपा की मुश्किलें विपक्ष के बिखराव से थोड़ी कम होती दीख रही है। तब भी आदिवासी मतों के बिखरने की स्थिति देखकर भी कोई पीछे हटने को तैयार नहीं है। इस क्षेत्र के कई इलाकों में माओवादियों और पीएलएफआई का अच्छा खासा प्रभाव है और इस राजनीतिक धारा को भी स्थानीय लोगों और नौजवानों का एक हद तक समर्थन प्राप्त है। इसके आलवा आदिवासियों में खड़िया समुदाय की बहुसंख्या होने के साथ साथ चर्च का भी अच्छा खासा प्रभाव है जो यहाँ के हर चुनाव में अपना असर डालता है। ये सारे पहलू ऐसे हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ कोई नहीं कर सकता। ऐसे में इस क्षेत्र की आदिवासी राजनीति कैसे और क्या करवट लेगी, यह चुनाव परिणाम ही बता सकेगा ।  

गौरतलब है कि हिन्दी पट्टी के राज्यों से सटे होने के बावजूद झारखंड का जो अपना एक अलग क्षेत्रीय स्वरूप रहा है, तो उसके मूल में आदिवासी समाज और उसकी राजनीति की सघन उपस्थिती है। जो ऊपर से देखने में तो एक जैसी लगती है लेकिन इसके अंदर कई भिन्न क्षेत्रीय व स्थानीय सामाजिक केन्द्रों का समावेश है, जो अपने बहुलता वाले इलाके की राजनीति में प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त होता है। उदाहरण के लिए, उत्तरी झारखंड की राजनीति का केंद्र है- संताल परगना का संताल बाहुल्य क्षेत्र, तो दक्षिणपूर्व झारखंड का केंद्र है - हो बाहुल्य सिंहभूम का इलाका, जिसे कोल्हान भी कहा जाता है। जबकि तीसरा केंद्र है- राज्य की राजधानी से सटा मुंडा, उरांव और खड़िया बाहुल्य पुरानी रांची कमिश्नरी का इलाका। 80 विधानसभा क्षेत्र वाले वर्तमान के झारखंड में 20 से भी अधिक सीटें आदिवासी/अनुसूचित जनजाति कि सीट के रूप में सुरक्षित है। राज्य गठन से पूर्व यह इलाका दक्षिण छोटानागपुर कहलाता था और रांची ग्रीष्मकालीन उप राजधानी थी ।

झारखंड गठन के बाद यहाँ की आम राजनीति के साथ साथ आदिवासी राजनीति में भी काफी बदलाव आया है। तब भी आदिवासी पहलू इतना महत्वपूर्ण है कि वर्तमान मुख्यमंत्री से पहले के सभी मुख्यमंत्री आदिवासी ही बनाए गए। लेकिन अब इसमें भी आ रहे नए बदलाव का असर आदिवासी राजनीति के शीर्ष से लेकर नीचे ज़मीनी स्तर तक के सामाजिक हलचल की सोच और व्यवहार में स्पष्ट परीलक्षित हो रहा है।  हाल के दिनों में पत्थलगड़ी अभियान से उभरा सरकार और आदिवासी समाज का टकराव इसी का एक ताज़ा उदाहरण है। दूसरे, आदिवासी मुद्दों और खासकर ज़मीन की लूट व राज्य में स्थानीयता जैसे सवालों पर परंपरागत झारखंड नामधारी दलों के रस्मी विरोध से इस समुदाय की नयी पीढ़ी के एक हिस्से में उग्र और अतिवादी सोच लगातार बढ़ रहा है। क्योंकि ये अपनी भाषा–परंपरा और जंगल–ज़मीन की खुली संगठित लूट अब बर्दाश्त नहीं कर पा रहें हैं। इसीलिए सोशल मीडिया में ये लिख रहें हैं कि झारखंड नामधारी दल और नेता उनके लिए एक मजबूरी भरा विकल्प हैं न कि उनकी पसंद। एक छोटा हिस्सा, आदिवासी नाम से चल रहे राजनीतिक धंधे में बड़ा हिस्सेदार बनने के लिए अपने पुराने नेतृत्व को दरकिनार कर शासक ताकतों और कंपनियों से खुद तोल मोल की राजनीति में उतर पड़ा है ।

बावजूद इसके आज विकास के नाम पर सरकार प्रायोजित जबरन विस्थापन, भूख–बेकारी और सुखाड़ जैसे संकटों से बढ़ते हुए पलायन के कारण खाली हो रहे आदिवासी गाँव आज विनाश के जीवंत दस्तावेज़ बन रहें हैं।

कोलेबिरा उप चुनाव के परिणाम से कोई अप्रत्याशित राजनीतिक निष्कर्ष भले ही न निकले लेकिन प्रवृति के तौर पर इस क्षेत्र की आदिवासी अस्तित्व की राजनीति और इस समाज की नयी पीढ़ी में आ रहे बदलाओं का सूत्र-संकेत तो देगा ही। सनद रहे कि कोलेबीरा विधानसभा क्षेत्र राज्य के उसी खूंटी संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत है जहां हाल के महीनों में आदिवासी समाज के लोगों ने सत्ता के हर दमन का सामना करते हुए “पत्थलगड़ी” अभियान चलाकर अपने संवैधानिक अस्तित्व और अधिकारों की नए जागरण का संकेत दिया है।

kolebira bypoll
jharkhand assembly
kolebira assembly
kolebira election
tribal communities
Adivasi

Related Stories

गुजरात: पार-नर्मदा-तापी लिंक प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को उजाड़ने की तैयारी!

आदिवासियों के विकास के लिए अलग धर्म संहिता की ज़रूरत- जनगणना के पहले जनजातीय नेता

एनआईए स्टेन स्वामी की प्रतिष्ठा या लोगों के दिलों में उनकी जगह को धूमिल नहीं कर सकती

नई रिपोर्ट ने कर्नाटक में ईसाई प्रार्थना सभाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को दर्ज किया

बार-बार विस्थापन से मानसिक, भावनात्मक व शारीरिक रूप से टूट रहे आदिवासी

दलित एवं मुस्लिम बच्चों के बौने होने के जोखिम ज्यादा

वाम की पंचायत और नगर निकायों के चुनाव दलीय आधार पर कराने की मांग, झारखंड सरकार ने भी दिया प्रस्ताव

मप्र : वन उत्पादों को इकट्ठा करने वाले आदिवासियों की ख़राब हालत कोविड-19 के चलते बदतर हुई

कोरकू आदिवासी बहुल मेलघाट की पहाड़ियों पर कोरोना से ज्यादा कोरोना के टीके से दहशत!

पश्चिम बंगाल चुनाव: प्रमुख दलों के घोषणापत्रों में सीएए, एनआरसी का मुद्दा


बाकी खबरें

  • sever
    रवि शंकर दुबे
    यूपी: सफ़ाईकर्मियों की मौत का ज़िम्मेदार कौन? पिछले तीन साल में 54 मौतें
    06 Apr 2022
    आधुनिकता के इस दौर में, सख़्त क़ानून के बावजूद आज भी सीवर सफ़ाई के लिए एक मज़दूर ही सीवर में उतरता है। कई बार इसका ख़ामियाज़ा उसे अपनी मौत से चुकाना पड़ता है।
  • सोनिया यादव
    इतनी औरतों की जान लेने वाला दहेज, नर्सिंग की किताब में फायदेमंद कैसे हो सकता है?
    06 Apr 2022
    हमारे देश में दहेज लेना या देना कानूनन अपराध है, बावजूद इसके दहेज के लिए हिंसा के मामले हमारे देश में कम नहीं हैं। लालच में अंधे लोग कई बार शोषण-उत्पीड़न से आगे बढ़कर लड़की की जान तक ले लेते हैं।
  • पटनाः डीजल-पेट्रोल से चलने वाले ऑटो पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ ऑटो चालकों की हड़ताल
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पटनाः डीजल-पेट्रोल से चलने वाले ऑटो पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ ऑटो चालकों की हड़ताल
    06 Apr 2022
    डीजल और पेट्रोल से चलने वाले ऑटो पर प्रतिबंध के बाद ऑटो चालकों ने दो दिनों की हड़ताल शुरु कर दी है। वे बिहार सरकार से फिलहाल प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहे हैं।
  • medicine
    ऋचा चिंतन
    दवा के दामों में वृद्धि लोगों को बुरी तरह आहत करेगी – दवा मूल्य निर्धारण एवं उत्पादन नीति को पुनर्निर्देशित करने की आवश्यता है
    06 Apr 2022
    आवश्यक दवाओं के अधिकतम मूल्य में 10.8% की वृद्धि आम लोगों पर प्रतिकूल असर डालेगी। कार्यकर्ताओं ने इन बढ़ी हुई कीमतों को वापस लेने और सार्वजनिक क्षेत्र के दवा उद्योग को सुदृढ़ बनाने और एक तर्कसंगत मूल्य…
  • wildfire
    स्टुअर्ट ब्राउन
    आईपीसीसी: 2030 तक दुनिया को उत्सर्जन को कम करना होगा
    06 Apr 2022
    संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम जलवायु रिपोर्ट कहती है कि यदि​ ​हम​​ विनाशकारी ग्लोबल वार्मिंग को टालना चाहते हैं, तो हमें स्थायी रूप से कम कार्बन का उत्सर्जन करने वाले ऊर्जा-विकल्पों की तरफ तेजी से बढ़ना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License