NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोरोना काल में और मुश्किल हो गई है विकलांग महिला प्रवासी मज़दूरों की ज़िंदगी
कोविड-19 से पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभावों ने हाशिये पर खड़े लोगों की ज़िंदगी की मुश्किलों को और अधिक बढ़ाने का काम किया है।
वेदिका कक्कड़
22 Jul 2020
w

कोविड-19 से पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभावों ने हाशिये पर खड़े लोगों की जिन्दगी की गुत्थियों को और अधिक बढाने का कम किया है। लेखिका विकलांग प्रवासी महिला मजदूरों की जिन्दगी में राजनीतिक अर्थव्यवस्था की भूमिका को समझने और सरकारी पहल की पड़ताल कर रही हैं।
———-
अनीता घई, जोकि विकलांग लोगों के अधिकारों के सवाल पर एक वकील के त्तौर पर प्रमुख हस्ताक्षर हैं, कहती हैं कि विकलांगता की विषमताओं को अक्सर शासन और नीति-निर्धारण के वक्त नजरअंदाज कर दिया जाता है, तो उनकी बात का महत्व समझ में आता है।

मौजूदा नीतियों के बावजूद उनके क्रियान्वयन को लेकर कई खामियाँ नजर आती हैं। विकलांगता के राजनैतिक अर्थशास्त्र को भी समझने की जरूरत है। सरकारों की यह सोच बनी हुई है कि यदि उन्होंने विकलांग लोगों के बुनियादी ढाँचे में निवेश कर दिया तो उनका यह सारा पैसा बर्बाद होने वाला है। महिलाओं और विकलांगों की जिन्दगी समाज के सबसे कमजोर वर्गों के तौर पर बनी हुई है। किसी विकलांग प्रवासी महिला के संघर्षों को समझने के लिए हमें राजनीतिक अर्थशास्त्र और उनके सामाजिक अभाव को करीब से देखने की जरूरत है।

“विकलांगता के राजनैतिक अर्थशास्त्र को समझने की आवश्यकता है।”

हालिया प्रवासी मजदूरों के रिवर्स माइग्रेशन की लहर को पैदा कर दिया है, जिसमें प्रवासी मजदूर अपने-अपने मूल राज्यों की ओर लौटने के लिए मजबूर हैं। यह सब कोविड-19 महामारी के चलते भारत में थोपे गए राष्ट्रीय लॉकडाउन का असर था, जिसकी वजह से चारों  तरफ आर्थिक मंदी का आलम छाया हुआ है।
इसने सभी काम-धंधों को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया है, और प्रवासी श्रमिकों को नौकरियों और आजीविका के सभी साधनों को छीनने का काम किया है। इसकी वजह से प्रवासी श्रमिक लम्बी दूरी की यात्रा करने के लिए मजबूर थे, जिसमें उन्हें राज्यों की सीमाओं को पैदल ही नंगे पांव पूरा करना पड़ा। आर्थिक विपन्नता और यातायात के साधनों पर सरकार की ओर से लगाये गए प्रतिबंधों के चलते वे ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिए गए थे।

दुर्भाग्यवश श्रम अधिकारों की रक्षा के लिए सरकारी तंत्र की अक्सर अनदेखी और उपेक्षित की जाती रही है। अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम के तहत प्रवासी मजदूरों की भर्ती प्रक्रिया के दौरान, अतिरिक्त 50% विस्थापन भत्ता पहले से निर्धारित कर रखा गया है। इसके साथ ही प्रवासी को अन्य राज्यों से उनके घरों को वापसी के लिए यात्रा मजदूरी की भी व्यवस्था है। हाल के दिनों में इस अधिनियम की सबसे अधिक अनदेखी की गई है। कई अन्य सामाजिक कल्याण की योजनायें भी इन प्रवासी मजदूरों के हिस्से में आने से वंचित रह गई हैं, क्योंकि उनका वर्तमान निवास उनके पैन कार्ड और आधार कार्ड में दर्ज पते से भिन्न है।

इस अंतर-राज्यीय प्रवासन संकट का सबसे बड़ा शिकार महिलाएं रही हैं। उन्हें अपेक्षाकृत कम मजदूरी दी जाती है और उनकी विशिष्ट-लैंगिक जरूरतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।“प्रवासी महिला श्रमिकों में सबसे कमजोर तबका वो है जो अकुशल से लेकर अर्ध-कुशल नौकरियों में कार्यरत था।”प्रवासी महिला श्रमिकों में सबसे कमजोर तबका वो है जो अकुशल से लेकर अर्ध-कुशल नौकरियों में कार्यरत था। आमतौर पर ये लोग ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बद्ध थे और अपने परिवार के साथ काम की तलाश में शहरी क्षेत्रों में उद्योगों और विनिर्माण की जगहों पर कार्यरत थे।

एक अध्ययन के मुताबिक  ग्रामीण क्षेत्र का 78% और शहरी क्षेत्र का 59% महिला प्रवासी श्रमिक तबका अकुशल शारीरिक श्रम के तौर पर कार्यरत था। वहीँ इनमें से 16% लोग गाँवों और 18% शहरी क्षेत्रों में रोजगार पर थे। उनके इस अंतर-राज्यीय पलायन के पीछे की मुख्य वजहों में गरीबी, कर्ज, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अभाव के साथ-साथ उनके पतियों के प्रवासन की भूमिका थी।

रिपोर्टों से पता चलता है कि प्रवासी महिला श्रमिकों के बीच आत्महत्या की दर में बढ़ोत्तरी का क्रम बना हुआ है, और उनके प्रवासन की स्थिति में अनियमितता प्रत्यक्ष तौर पर उनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार से सम्बद्ध है। कारखानों में महिला श्रमिकों के तौर पर और घरों में घरेलू मदद के तौर पर काम करने वालीं इन प्रवासी महिला श्रमिकों को अपने घरों की भी देखभाल की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, जिसका कोई आर्थिक मोल नहीं किया जाता।

वर्तमान में भारी संख्या में अंतर-राज्यीय प्रवासी परिवारों के पास किसी भी प्रकार की भोजन और चिकित्सकीय सुविधा की व्यवस्था नहीं हासिल है। इन बेहद यंत्रणादायक परिस्थितियों में माहवारी से जुडी स्वास्थ्य समस्याओं और स्वच्छता की अनेदखी आम बात रही है। इसकी एक मुख्य वजह यह भी है कि सेनेटरी उत्पादों को (30 मार्च तक) आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में शामिल ही नहीं किया गया था।

जो प्रवासी महिलाएं गर्भवती थीं उन्हें हाईवे पर ही अपने बच्चों को जन्म देने पर मजबूर होना पड़ा था। मासिक धर्म सम्बन्धी चुनौतियों से निपटने के लिए वे मात्र कपडे और राख पर ही पूरी तरह से निर्भर थीं। चिकित्सा सुविधा और आवश्यक स्वास्थ्य सुविधा के तन्त्र की मौजूदगी के बगैर बच्चों को जन्म देते समय इन मातृत्व को कुपोषण और डिहाइड्रेशन का शिकार रहते हुए भी सड़कों पर चलते जाने के लिए बाध्य होना पड़ा था। ऐसी स्थितियों में मौजूदा क़ानूनी उपायों जैसे कि मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम जैसे कानून किसी भी तरह से कारगर साबित नहीं हो सके हैं।

"ह्यूमन राइट्स वॉच ने उन्हें 'यौन हिंसा के अदृश्य शिकार' के तौर पर संदर्भित किया है।"

जो महिलाएं किसी न किसी प्रकार से विकलांगता का शिकार थीं उन्हें बाकियों की तुलना में इस लॉकडाउन के दौरान कहीं ज्यादा कष्टों को झेलना पड़ा है। प्रवासन संकट के अलावा ये महिलाएं घरेलू हिंसा का भी शिकार रही हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच ने उन्हें 'यौन हिंसा के अदृश्य शिकार' के तौर पर संदर्भित किया है। अपनी अलग से कोई आर्थिक हैसियत न होने के कारण अक्सर घरेलू हिंसा के मामलों में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती, क्योंकि इसमें सामाजिक तौर पर कलंकित किये जाने और सामाजिक बहिष्कार तक की स्थिति में इन महिलाओं को जाना पड़ता है। हालाँकि कागजों पर यौन दुर्व्यवहार को लेकर अनेकों सुधार के संसोधन किये जा चुके हैं, किन्तु अमल में न लाये जाने की वजह से महिलाओं के लिए न्याय तक आसानी से पहुँच बना पाना दुरूह बना हुआ है।
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी विकलांगता दिशानिर्देशों की उद्घोषणाओं के अनुसार: "विकलांग महिलाओं और बच्चों के संबंध में विशेष ध्यान रखे जाने को सुनिश्चित किया जाना चाहिए"। लेकिन इस सबके बावजूद विकलांग घरेलू महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा और घरेलू दुर्व्यवहार की अनेकों रिपोर्टें देखने को मिलती हैं, जिसमें उन्हें परिवार और समाज पर एक बोझ के रूप में चिन्हित किया जाता देखा गया है।

इन्टरनेट पर इन दिनों अपंग और बूढ़े लोगों को उनके परिवार वालों और सहकर्मियों द्वारा अपनी पीठ पर ढोकर ले जाने की तस्वीरें छाई हुई हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि नेत्रहीन और मानसिक रूप से कमजोर प्रवासियों को अपने रोजमर्रा के कामों में निरंतर सहयोग की दरकार बनी रहती है।

वर्तमान महामारी और सामाजिक-दूरी के स्थापित मानदंडों में उन्हें अपने रोजगार और जिन्दगी का खतरा बना हुआ है। परी (पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया) हमें आँखों से लाचार उन दो प्रवासियों के बारे में बताती है, जो सड़कों पर भीख माँगने और रेलवे स्टेशन पर काम करते थे। आज वे इस बात पर विचारमग्न हैं कि कौन उन्हें ट्रेनों और बसों से उतारने में अब मदद करेगा या फुटपाथ पर दुकानदारी से सामान खरीदने की जहमत उठाएगा। देश के भीतर समावेशी बुनियादी ढांचे की कमी के चलते वे सूचना और परिवहन पर आसानी से पहुंच बना सकने में बाधा बनी हुई है।

"उनकी जटिल विशिष्ट-वर्गीय पहचान और उनकी जरूरतों के प्रति समाज की अनभिज्ञता ने उन्हें समान हक पाने से रोक रखा है और इस जकड़न ने उन्हें आत्म-निर्भर और स्वतंत्र भूमिका में जीने के मार्ग को अवरुद्ध कर रखा है।"एक प्रवासी श्रमिक ने अपनी बातचीत में उल्लेख करते हुए कहा है कि ब्रेल चिन्हों को पढ़ने के लिए भी उन्हें लगातार उन चीजों को छूने की जरूरत पड़ती है जिससे उनके वायरस की चपेट में आने का खतरा काफी हद तक बना रहता है। हम में से अधिकांश लोगों के विपरीत, अपंग प्रवासी महिलाएं अपने काम को वर्चुअल संसार में कर पाने में अक्षम हैं, और वे इस हाल में नहीं होतीं कि अपने लिए या परिवार के कोई कमाई कर सकें। विकलांग प्रवासी महिलाओं के हालात के बारे में सूचनाओं के अभाव के कारण, मुख्यधारा की मीडिया द्वारा उन्हें पर्याप्त कवरेज न मिलने की वजह से सरकारी नीति में इस विषय में कोई प्रमुख बदलाव या मौजूदा कानूनों में संशोधन की उम्मीद करना बेमानी साबित होगा। उनकी जटिल अंतर वर्गीय पहचान और उनकी जरूरतों के प्रति समाज की अनभिज्ञता ने उन्हें समान हक पाने से रोक रखा है और इस जकड़न ने उन्हें आत्म-निर्भर और स्वतंत्र भूमिका में जीने के मार्ग को अवरुद्ध कर रखा है।

सरकार को चाहिए कि ऐसे विकलांग लोगों के लिए प्रभावी स्तर पर घर-घर जाकर मदद मुहैय्या कराने वाले तंत्र को विकसित करे। अब चूँकि देश के ज्यादातर राज्यों में लॉकडाउन के दौरान में लगाये गए प्रतिबन्ध हटा लिए गए हैं तो ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि जरुरी सहूलतें मुहैय्या की जायें, जिससे कि लोग अपने पाँवों पर खड़े हो सकने के काबिल बन सकें।

सरकार अपंग लोगों के लिए कार्ड बना रही है जो उनके लिए कई योजनाओं में मददगार साबित हो सकते हैं। लॉकडाउन की वजह से इस बीच स्थानीय उद्यमशीलता में वृद्धि देखने को मिली है, और इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि यह स्थानीय रोजगार को बढाने में सहायक सिद्ध हो सकती है। इसके चलते अपंग ग्रामीण महिलाएं भविष्य में लाभ की स्थिति में भी हो सकती हैं, क्योंकि यदि ऐसी स्थिति बनती है तो बिना अपने घरों से दूर रहे वे अपने परिवार के साथ में ही बने रहकर अपनी कमाई को जारी रख सकती हैं।

(लेखिका जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल से स्नातक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
सौजन्य: द लीफलेट 

differently abled women worker
migrant women worker
women worker in corona time

Related Stories


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License