NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कॉरपोरेट टैक्स में कटौती कर असमानता आधारित मंदी से नहीं निपटा जा सकता  
मांग को बेहतर करने के लिए कॉरपोरेट टैक्स में कटौती करने के बजाय सरकार को सामाजिक क्षेत्र के खर्चों में वृद्धि करनी चाहिए और गरीबों को अधिक पैसा देना चाहिए।
सुरजीत दास
24 Sep 2019
inequality
प्रतीकात्मक तस्वीर Image Courtesy : HuffPost India

भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत स्पष्ट हैं।  केवल ऑटोमोबाइल क्षेत्र में ही नहीं है बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की विकास दर गिर रही है। शोध से मिले साक्ष्य बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में बेरोज़गारी दर भी बढ़ रही है। पिछले पांच-छह वर्षों से विशाल जनसमूह की मजदूरी दर में गिरावट भले ही नहीं हुआ है लेकिन स्थिर रही है। संक्षेप में, अर्थव्यवस्था की स्थिति बदतर है और स्थिति बिगड़ती जा रही है। लेकिन हाल ही में (20 सितंबर को) सरकार ने गिरती विकास दर की स्थिति से निपटने के लिए क्या किया है? इसने शुद्ध लाभ (नेट प्रोफिट) की रक्षा के लिए कॉर्पोरेट लाभ पर कर की दर को घटा दिया है और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन दिया है। क्या इससे मदद मिलेगी?

अर्थव्यवस्था को बेहतर करने की नीति तैयार करने के लिए इस मंदी के पीछे के कारणों को समझना बेहद ज़रुरी है। कुछ लोगों ने कहा है कि नोटबंदी और वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) मूल कारण हैं। ये दोनों कारक मंदी का कारण हो सकते हैं  लेकिन मेरे विचार में विकास दर गिरने के असली कारण की जड़ें काफी गहरी हैं। असमानता में भारी वृद्धि ख़ास तौर पर उच्च विकास के अवस्था के दौरान लाभ की गिरती दर का कारण बनी है जिसके परिणामस्वरूप निवेश और विकास की दर में गिरावट आई है।

लगभग 125 साल पहले, कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक कैपिटल के वॉल्यूम 3 के अध्याय 13 में लाभ की इस गिरती दर के बारे में चर्चा की थी। इसके बाद, पोलैंड के अर्थशास्त्री माइकल कलेकी ने इस सिद्धांत को और विकसित करते हुए कहा कि असमानता बढ़ने से पूंजीवाद के अधीन लाभ की दर गिर सकती है और संकट पैदा हो सकता है।

ये तर्क बहुत सरल है। यदि बड़ी आबादी (श्रमिकों) की आय उस दर से नहीं बढ़ती है जिस दर से उत्पादक क्षमता बढ़ती है तो कुल जमा स्तर पर अतिउत्पादन की प्रवृत्ति पैदा हो जाएगी। घरेलू बाज़ार का आकार आम लोगों की ख़रीद क्षमता पर निर्भर है। यदि इसकी वृद्धि दर कुल स्तर पर निवेश की वृद्धि दर से कम है तो संभावित उत्पादन वस्तुओं और सेवाओं की कुल घरेलू मांग की तुलना में अधिक होगा। अगर समग्र मांग (एग्रीगेट डीमांड) कुल आपूर्ति (एग्रीगेट सप्लाई) की तुलना में कम होती है तो भले ही उत्पादक अधिक उत्पादन करें ऐसे में अतिरिक्त उत्पादन मौजूदा क़ीमतों पर ब़ाज़ार में नहीं बेचा जाएगा और किसी भी बाहरी (निर्यात) बाजार के अभाव में लाभ हासिल नहीं होगा। इस स्थिति में, भविष्य में लाभ की अपेक्षित दर गिर जाएगी और निवेश की दर कम हो जाएगी। परिणामस्वरूप, अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में भी गिरावट होगी।

जैसे ही अर्थव्यवस्था में असमानता बढ़ती है और आय वितरण समृद्ध वर्ग का पक्षधर होती है तो वस्तुओं और सेवाओं की कुल घरेलू मांग में कमी आती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ग़रीब तबके की आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है, जबकि सबसे अमीर तबके का ख़र्च औसतन अपेक्षाकृत कम होती है। अर्थव्यवस्था में वस्तुओं व सेवाओं की कुल मांग में बचत की कोई भूमिका नहीं होती है। इसलिए, असमानता में वृद्धि मंदी का कारण बन सकती है।

उद्योग के वार्षिक सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में संगठित विनिर्माण क्षेत्र में कुल वैल्यू एडेड में मज़दूरी और वेतन की हिस्सेदारी में काफी हद तक कमी आई थी। ये कमी खासकर उच्च विकास अवधि के दौरान आई थी। वर्तमान में मजदूरी का हिस्सा संगठित विनिर्माण क्षेत्र के कुल वैल्यू एडेड का लगभग 15% है। इसलिए संगठित विनिर्माण क्षेत्र में अधिकांश श्रमिकों और कर्मचारियों को कुल आमदनी का 15% हिस्सा मिला है। बड़ा हिस्सा लाभ कमाने वालों, ब्याज कमाने वालों और शेयरधारकों के पक्ष में गया है। अधिकांश श्रमिक विनिर्माण, निर्माण और सेवाओं के असंगठित क्षेत्र में हैं। इनमें से अधिकांश को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती है। ये मज़दूरी भी बहुत कम है।

किसानों के आय की स्थिति बदतर है। छोटे और सीमांत किसान व भूमिहीन खेतिहर मज़दूर इतने ग़रीब हैं कि उनके पास शायद ही ख़रीदने की शक्ति है। अगर हम गैर-कृषि ग्रामीण मज़दूरों को देखें तो स्थिति अगर बदतर नहीं है तो इतनी ही बुरा ज़रुर है। देश में लैंगिक आधार पर मज़दूरी का अंतर काफी ज़्यादा है। 13 कृषि और 12 गैर-कृषि गतिविधियों के लिए ग्रामीण मज़दूरी पर श्रम ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान वास्तविक मज़दूरी की औसत वृद्धि दर शून्य रही है। लेकिन इस अवधि में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 6-7% वार्षिक दर से बढ़ा है। कहने की जरूरत नहीं है कि बेरोज़गार किसी भी तरह से आय अर्जित नहीं कर सकते थे। इसलिए, वास्तविक राष्ट्रीय आय में संपूर्ण वृद्धि कुछ अमीरों के जेब में डाल दिया गया है। तुलनात्मक रुप से अमीर अधिक अमीर हो गए हैं और ग़रीब तबके का अधिकांश हिस्सा ग़रीब हो गया है।

शोध पर आधारित साक्ष्यों (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन तथा अन्य पर आधारित के सर्वेक्षणों) से पता चलता है कि देश में असमानता काफी समय से बढ़ रही है। वास्तव में नव-उदारवादी’ व्यवस्था के अधीन लाभ-आधारित विकास का ग्राफ असमानता को बढ़ाता है। एक तर्क दिया गया था कि अगर हर कोई अपेक्षाकृत बेहतर हो (वास्तविक आय के मामले में) स्थिति में हो जाते हैं तो असमानता कोई मायने नहीं रखेगी। भले समाज में असमानता बढ़ती है तो भी लोग अपेक्षाकृत अधिक खुश होंगे। लेकिन, यह दीर्घकालिक नहीं है।

भले ही हम सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं को एक तरफ रखते हैं जो असमानता से पैदा होती हैं तो असमानता पैदा करने वाली विकास प्रक्रिया ऊपर बताए गए कारणों के कारण खुद को क़ायम नहीं रख सकती है। वैकल्पिक रूप से अर्थव्यवस्था में बेहतर आय वितरण सुनिश्चित करने और इस तरह समग्र खपत की प्रवृत्ति में सुधार के द्वारा मज़दूरी आधारित विकास संभव है। इस स्थिति में थोड़ा अधिक सरकारी व्यय या निवेश या निर्यात उचित अंश में जीडीपी को अधिक बढ़ा सकेंगे। यह विकास प्रक्रिया तब तक स्थिर होगी जब तक कि अर्थव्यवस्था पूर्ण रोजगार या उत्पादन की पूर्ण क्षमता स्तर तक नहीं पहुंच जाती। वर्तमान में अर्थव्यवस्था पूर्ण रोज़गार या पूर्ण क्षमता की स्थिति से नीचे है। वास्तव में बेरोज़गारी हमारी अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है।

यदि शुद्ध निर्यात में वृद्धि की जाती है तो यह सभी स्तर (एग्रीगेट लेवल) पर अर्थव्यवस्था में कुछ अतिरिक्त मांग पैदा कर सकता है। हालांकि, निर्यात मांग अर्थव्यवस्थाओं के विकास पर निर्भर करती है जो हमारे मुख्य निर्यात का मंज़िल हैं। विकसित दुनिया भी तेज़ी से नहीं बढ़ रही है जो कि हमारे नियंत्रण से बाहर है। सरकार निश्चित रूप से बड़े राजकोषीय घाटे को बढ़ा कर अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त मांग को बढ़ा सकती है। अगर लोग कम टैक्स देते हैं तो उनकी डिस्पोजेबल इनकम (करों की कटौती और सामाजिक सुरक्षा शुल्क के बाद शेष आय) बढ़ जाएगी।

फिर, अगर सरकार अधिक पैसा खर्च करती है तो लोग (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से) अधिक आय अर्जित करते हैं। जब उस आय का कुछ हिस्सा खर्च किया जाता है तो कुछ अन्य लोग अधिक आय अर्जित करेंगे। इससे वस्तुओं और सेवाओं आदि की मांग पैदा होगी। यदि अर्थव्यवस्था में अप्रयुक्त उत्पादक क्षमता और बेरोजगार श्रम है तो अधिक उत्पादन होगा। इसे अर्थशास्त्र के साहित्य में कीन्स-कान गुणक प्रक्रिया कहा जाता है। लेकिन भारत में राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (फिस्कल रेस्पॉन्सेबलिटी एंड बजट मैनेजमेंट- एफआरबीएम) अधिनियम के कारण विस्तारवादी राजकोषीय नीति के लिए स्थान भी सीमित है।

सरकारों की 20 सितंबर की घोषणा के अनुसार कॉरपोरेट्स को लगभग 1.45 लाख करोड़ रुपये या जीडीपी के 0.75% से अधिक कर रियायत के कारण अनुमानित राजस्व को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इससे असमानता की स्थिति और खराब हो जाएगी और असमानता के कारण मंदी के मूल कारणों का समाधान नहीं करेगा।

कॉरपोरेट्स को कर में राहत देने के बजाय इस सरकार को यह पैसा बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्र (स्वास्थ्य, शिक्षा, मनरेगा, ग्रामीण नौकरी की गारंटी योजना आदि) पर खर्च करना चाहिए था जो कि ग़रीब और कमजोर वर्गों के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन के साथ-साथ असमानता को कम करने का काम करता था। अगर सरकार को एफआरबीएम प्रतिबंधों के तहत काम करना है तो कर राजस्व में कमी बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्र के खर्च के लिए स्थान को और कम कर देगा।

ग़रीब लोगों की क्रय शक्ति तभी बढ़ेगी जब सरकार सामाजिक क्षेत्र के ख़र्च को बढ़ाएगी। यदि सरकार ज़्यादा ग़रीबों से संबंधित गतिविधियों में व्यय करती है तो असमानता स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी। इसलिए, कॉर्पोरेट्स को इतनी बड़ी कर राहत दिए बिना अगर सरकार ने अतिरिक्त (विशेष रूप से बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्र में) खर्च किया होता तो यह आर्थिक मंदी के मूल कारण को दूर करने में बहुत अधिक प्रभावी होता। लेकिन, सरकार ने इसके ठीक विपरीत काम करने का फैसला किया।

सुरजीत दास दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में सहायक प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी है।

Economic slowdown
Corporate Tax Cuts
Social Sector Spending
fiscal deficit
Demand Slump
Overproduction Crisis
Taxes Foregone

Related Stories

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

क्यों घोंटा जा रहा है मनरेगा का गला! 

मोदी सरकार की राजकोषीय मूढ़ता, वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी की मांगों से मेल खाती है

कैसे भाजपा ने हिमाचल प्रदेश में अब तक हुई प्रगति को मटियामेट कर दिया

आरबीआई तो सरकार को बचा रहा है लेकिन क्या सरकार भी आरबीआई को बचा रही है?

मजबूत सरकार से हाहाकारः मजबूर सरकार की दरकार

7 साल: कैसे कम हुआ “शूरवीर” का पराक्रम

मोदी सरकार 2.O के दो साल: विकास तथा राष्ट्रवाद का झंडा और नफ़रत का एजेंडा!

मोदी सरकार और उसकी मज़दूर वर्ग की समस्याओं के प्रति निष्ठुरता

मांग में कमी और सार्वजनिक ख़र्च में कटौती वाला बजट अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी ख़बर नहीं है


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License