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कोटलर पुरस्कार : मोदी की छवि चमकाने का एक बनावटी प्रयास!
मोदी मुख्यधारा के पहले भारतीय राजनेता हैं जिन्होंने बड़ी सावधानी से अपनी छवि बनाने की कोशिश की है। लेकिन संदिग्ध कनेक्शन वाले इस पुरस्कार को प्राप्त कर लेने से प्रधानमंत्री पद की गरिमा में इज़ाफा नहीं होता।
सुभाष गाताडे
18 Jan 2019
Philip Kotler Award
Image Courtesy: Indian Express

प्रथम फिलिप कोटलर पुरस्कार समारोह आम पुरस्कार समारोह की तुलना में बिल्कुल अलग था। आम समारोह में जहां प्रधानमंत्री पुरस्कार देते हैं और कुछ जोशीला भाषण देते हैं वहीं इस पुरस्कार समारोह में मोदी को खुद प्रथम फिलिप कोटलर पुरस्कार मिला।

जैसे कि अपेक्षा की जाती थी कि केवल भक्त ही नहीं बल्कि मोदी के कई कैबिनेट सहयोगी भी इस 'पुरस्कार' की खुशी को छिपा नहीं सकेंगे और उनकी काफी प्रशंसा करेंगे। जल्द ही यह पता चल गया कि (द वायर को धन्यवाद, जिसने इस पुरस्कार के बारे में कुछ बुनियादी सवाल उठाए) इस पुरस्कार को लेकर ज़्यादा उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है इसलिए उन्होंने ख़ामोश रहना बेहतर समझा।

इंटरनेट पर थोड़ा सर्च करने से पता चला कि फिलिफ कोटलर नाम के व्यक्ति के बारे में अमेरिकन मार्केटिंग एसोसिएशन ने इस तरह व्याख्या किया कि वे "हर समय के सबसे प्रभावशाली व्यापारी" हैं। वे मूल रूप से मैनेजमेंट गुरु हैं जिन्होंने इन विषयों पर कई किताबें लिखी हैं जिसे दुनिया भर के छात्र पढ़ते हैं। वे कई कॉरपोरेट घरानों के सलाहकार हैं जिन्होंने इस पुरस्कार को अपने नाम से शुरू किया है और मोदी को इसके लिए 'बहुत गोपनीय तरीके' से चुना गया है।

https://www.kotlerawards.com/about/

यह वैसा है जैसे भारत में कोई प्रबंधन सलाहकार जो कई कॉरपोरेट घरानों के बेहद लाडले हैं और कुछ विशिष्ट कॉलेजों में कोर्स कर रहे हैं, वह एक रोज़ सुबह में अपने नाम पर एक पुरस्कार शुरु करने का निर्णय लेता है और इसे किसी देश के राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री को देता है जिसमें उनका अपना व्यक्तिगत/व्यावसायिक हित शामिल है।

जब पुरस्कार की घोषणा की गई तो सोमवार की शाम तक विपक्षी दलों की बारी थी कि वह इस 'अनोखी उपलब्धि' के लिए प्रधानमंत्री को बधाई दें और उपहास करते हुए टिप्पणी करें।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, "मैं विश्व प्रसिद्ध 'कोटलर प्रेसिडेंशियल अवार्ड' जीतने पर अपने पीएम को बधाई देना चाहता हूं! वास्तव में यह इतना प्रसिद्ध है कि इसमें कोई जूरी नहीं है, इसे पहले कभी भी नहीं दिया गया और अलीगढ़ की एक अनजान कंपनी द्वारा समर्थित है। इवेंट पार्टनर पतंजलि और रिपब्लिक टीवी है।”

एक दिन बाद ही यह पता चला कि इस पुरस्कार के कुछ सऊदी कनेक्शन भी थे और एक ख़ास सऊदी कंपनी जो भारत में अपना नेटवर्क फैलाने की योजना बना रही थी उसका सहयोग हासिल था। अन्य मीडिया समूह ने यह भी पाया कि इस पुरस्कार के लिए स्पॉन्सर करने वाली कंपनियों में से एक सस्लेंस रिसर्च इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट भी है जिसने अलीगढ़ का एक फर्जी पता दे रखा था।

ख़ैर जो भी हो ये सभी विवरण निश्चित रूप से प्रधानमंत्री पद के गौरव को नहीं बढ़ाते हैं।

कल्पना कीजिए कि किसी अन्य देश के मुखिया को संदिग्ध कनेक्शन वाला इस तरह का पुरस्कार मिले और इसके पीछे पारदर्शिता के बिना संदिग्ध उद्देश्य हो जिसको बारे में शोर मचाया जाता है। बाकी दुनिया में उनके बारे में क्या छवि बनेगी? यह ठीक वैसे ही है जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे और मोदी ने उनका स्वागत करने के दौरान एक सूट पहना था जिस पर सोने के तार से उनका नाम लिखा था। ऐसा करके मोदी मिस्र के तानाशाह होस्नी मुबारक के बाद दुनिया में दूसरे नेता बन गए और दुनिया भर में उपहास के पात्र बने।

इस पुरस्कार के बारे में ये सभी विवरण पब्लिक डोमेन में आसानी से उपलब्ध थे और प्रधानमंत्री के क़रीबी अधिकारियों को भी पता होना चाहिए था। उन्हें इन विवरणों को जांचना चाहिए था और उसके बाद ही उन्हें उनके साथ मंच साझा करना चाहिए था। उन्हें इस पर विचार करना चाहिए।

इसके बाद यह सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री ने एक ऐसे पुरस्कार को स्वीकार करने के लिए क्यों सहमति व्यक्त की जिसकी कोई अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता नहीं है और यहां तक कि उन्होंने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर एक 'बड़ी उपलब्धि' के रूप में इस समाचार को साझा किया। इस तरह प्रभावी रूप से फिलिप कोटलर और उनके लोगों की पसंद के लिए एक 'पोस्टर ब्वॉय' बनते हुए वह वैधता प्रदान करते हैं जिसका वे समर्थन करते हैं?

पीएम नरेंद्र मोदी को पहला फिलिप कोटलर प्रेसिडेंशियल अवार्ड मिला।

यह पुरस्कार पीपुल्स, प्रॉफिट और प्लेनेट की ट्रिपल बॉटम-लाइन पर केंद्रित है।

यह हर वर्ष राष्ट्र के प्रमुख को दिया जाएगा।

क्या यह सऊदी कनेक्शन के कारण था जैसा कि कुछ लोग तर्क देते हैं या फिर यह कुछ लेन देन का हिस्सा था जिसकी मार्केटिंग फर्म के साथ परिकल्पना की जा रही थी जहां कोटलर और उनकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल 'ब्रांड मोदी' की छवि को और बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है जो इन दिनों बुरे दौर में है?

सच्चाई यह है कि मोदी का करिश्मा फीका पड़ रहा है जो जाहिर हो गया है। उनकी पार्टी बीजेपी को तीन हिंदी भाषी राज्यों में नुकसान तो पहुंचा साथ ही दो अन्य राज्यों में हाशिए पर चली गई। अब वह अपनी छवि में कृत्रिम चमक पैदा करना चाहते हैं।

उपलब्ध सभी संभावित साधनों का इस्तेमाल कर मोदी अपनी छवि सुधारने में कितने सावधान हैं यह सबको पता है।

कुछ महीने पहले देश में फैले पेट्रोल-डीजल पंपों के एक शीर्ष संगठन कंसोर्टियम ऑफ़ पेट्रोलियम डीलर्स ने खुलासा किया कि कैसे सरकार के स्वामित्व वाली विपणन कंपनियों ने 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरों को डिस्प्ले करने के लिए पेट्रोल पंप डीलरों को एक मौखिक सलाह जारी की थी। इतना ही नहीं कथित तौर पर उन्हें धमकी दी गई थी कि अगर वे इसका पालन नहीं करते हैं तो आपूर्ति में कटौती कर दी जाएगी।

जब मुकेश अंबानी ग्रुप ने अपने जियो मोबाइल फोन सेवाओं को लॉन्च किया तो मीडिया में मचे शोर को कई लोग नहीं भुला पाए हैं। इसने अपने विज्ञापनों में प्रधानमंत्री कार्यालय से औपचारिक अनुमति के बिना मोदी की तस्वीर का खुलकर इस्तेमाल किया। उनकी छवि का खुलकर इस्तेमाल करना आखिर क्या दर्शाता है? यहां देश के प्रधानमंत्री को लोकतांत्रिक तरीके से चुना गया था जो देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने द्वारा लॉन्च किए गए एक नए मोबाइल फोन के 'ब्रांड एंबेसडर' के रूप में काम कर रहे थे!

डिजिटल लेनदेन करने वाली कंपनी पेटीएम का मामला भी ठीक ऐसा ही था। नोटबंदी के एक दिन बाद पेटीएम ने इस कदम का स्वागत करते हुए देश के प्रमुख अखबारों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया। यहां भी विज्ञापनों में मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था।

याद रखिए कि मोदी मुख्यधारा के पहले भारतीय राजनेता हैं जिन्होंने बड़ी सावधानी से अपनी छवि बनाने की कोशिश की है। लगभग एक दशक पहले जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने अपनी छवि बेहतर करने के लिए 25,000 (वर्ष 2007) डॉलर के मासिक ख़र्च पर एक अमेरिकी लॉबिंग कंपनी एपीसीओ वर्ल्डवाइड को जिम्मा सौंपा था। इस लॉबिंग फर्म के शब्दों मेंः

...'सरकारों, राजनेताओं और कॉर्पोरेशन के लिए "पेशेवर और असाधारण विशेषज्ञता" ऑफर करता हूं और अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों मामलों की जटिल दुनिया में परेशान ग्राहकों की हमेशा मदद करने के लिए तैयार हूं।'

वह एक ऐसा दौर था जब किसी भी राजनेता ने ऐसी कंपनी के बारे में नहीं सुना था और उसकी सेवाओं के बारे में सोचा भी नहीं था। यही वह समय था जब 2002 के गुजरात नरसंहार के कारण अमेरिकी वीजा न मिलने से मोदी चिंतित थे। यह गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा का सीधा नतीजा था जो गोधरा ट्रेन की घटना के बाद हुआ था। इस घटना को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा व्यापक रूप से कवर किया गया था। एक सकारात्मक छवि बनाने और विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए काफी उत्सुक मोदी ने लॉबीइंग फर्म एपीसीओ पर डोरा डाला। इस कंपनी ने पहले नाइजीरियाई तानाशाह सानी अबाचा और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान नजरबायेव को सेवाएं दी। यह वही दौर था जब एपीसीओ अपने हालिया ग्राहक एक रूसी अरबपति मिखाइल खोदोरकोवस्की को सेवा दे रहा था।

अमेरिकी दिग्गज स्टीव जॉब्स ने एक बार लिखा था: “मेरे लिए, विपणन मूल्यों के ईर्द गिर्द फैला हुआ है। यह एक बहुत ही जटिल दुनिया है, यह बहुत शोर करने वाली दुनिया है।और हमें मौका नहीं मिलेगा लोगों को अपने बारे में बहुत कुछ याद दिलाने का। कोई कंपनी नहीं है। इसलिए हमें वास्तव में स्पष्ट होना चाहिए कि हम उनके बारे में क्या जानना चाहते हैं।"

यह संभव है कि मोदी और उनकी टीम इस बार एक अलग छवि बनाने के लिए उत्सुक हो जो 'हम चाहते हैं कि वे हमारे बारे में जानें' को सुविधाजनक बनाए और इसलिए 'हर समय के सबसे प्रभावशाली व्यापारी' के लिए अच्छा प्रयास हो।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं। )

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