NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
विज्ञान
यूरोप
कोविड-19: सीरो-सर्वेक्षण हमें क्या बताते हैं और वे किस प्रकार से हमारे लिए फायदेमंद हैं?
समूचे भारत के विभिन्न शहरों में अलग-अलग परिणामों के साथ सीरो-सर्वेक्षण संचालित किये गए हैं। हालाँकि जिस प्रकार से मीडिया द्वारा इसके नतीजों को लेकर रिपोर्टिंग की गई है, उससे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
संदीपन तालुकदार, सत्यजीत रथ
20 Aug 2020
wa
प्रतिनिधि छवि सौजन्य: फाइनेंशियल एक्सप्रेस

भारत अपने विभिन्न शहरों में सीरो-सर्वेक्षणों की श्रृंखला को चला रहा है, जिसमें हालिया सर्वेक्षण महाराष्ट्र के पुणे शहर में किया गया है। पुणे के सीरो-सर्वेक्षण में पाँच इलाकों या ‘प्रभागों’ को शामिल किया गया था, जिनमें कोरोनावायरस के मामलों की संख्या बहुतायत में देखने को मिल रही थी।

कुल मिलाकर 1,664 उत्तरदाताओं के बीच इस सर्वेक्षण को संचालित किया गया था, और वे सभी लोग 18 वर्ष से ऊपर की उम्र के थे। इसमें पाया गया कि 51.5% उत्तरदाताओं में SARS-CoV-2 कोरोनावायरस का संक्रमण हो चुका था, जिसके चलते यह कोविड-19 महामारी दुनिया में पनपी, के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित हो चुकी है। इससे पहले भी इसी तरह के सर्वेक्षण दिल्ली, मुंबई, बेहरामपुर (ओडिशा में) और अन्य शहरों में भी संचालित किये जा चुके थे।

बेहद छोटे आकार के नमूना सर्वेक्षण के जरिये, जो लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और कभी-कभी तो यह संख्या करोड़ों तक भी चली जाती है, को देखते हुए सीरो-सर्वे को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति बनी रहती है। इस तरह के सर्वेक्षणों की प्रभावशीलता के बारे में जाँच-पड़ताल के लिए न्यूज़क्लिक ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर), पुणे के प्रतिरक्षाविज्ञानी और संक्रमण और रोगों के विशेषज्ञ सत्यजीत रथ से इस सम्बंध में बातचीत की।

न्यूज़क्लिक (एनसी): पुणे सर्वेक्षण के नतीजे सार्वजनिक संज्ञान में आने के बाद से मीडिया के एक बड़े हिस्से ने यह खबर काफी वायरल कर दी है कि पुणे शहर की 51% आबादी संक्रमित हो चुकी है। क्या 35 लाख से भी अधिक जनसंख्या वाले किसी शहर में मात्र 1,664 नमूनों से इस बात का सटीक अंदाजा लगाया जा सकता है? क्या इस तरह की घोषणाओं से पहले और ज्यादा नमूनों और सर्वेक्षणों की जरूरत नहीं होनी चाहिये?

सत्यजीत रथ (एसआर): इसे 'पुणे' (जिले या शहर का भी) का सर्वेक्षण नहीं कह सकते। यह सर्वेक्षण तो पुणे शहर में मौजूद पांच उप-वार्डों ('प्रभागों') में चलाया गया था, जहाँ पहले से ही कोविड-19 के मामलों की भारी संख्या दर्ज की गई थी। इसलिए आमतौर पर इन नतीजों से जो अंदाजा लगाया जा रहा है, जिसका आपने जिक्र किया है वे गलत और बेसिरपैर के हैं। इस सर्वेक्षण को इस प्रकार से घोषित करने के लिए निर्धारित नहीं किया गया था कि, पुणे शहर में लोग किस अनुपात में संक्रमित हुए हैं। इस सर्वेक्षण को तो उन विशेष समुदायों में वायरस के संक्रमण के फैलाव की सीमा के मामूली प्रारंभिक आकलन के तौर पर तैयार किया गया था, जिनमें से काफी संख्या में कोविड-19 के मामले निकल कर आ रहे थे।

जहाँ तक '51%' वाले आंकड़े का सवाल है तो उसका भी कोई अर्थ नहीं रह जाता। यह गणना भी बेहद अलग-अलग संख्याओं पर आधारित है, उदहारण के लिए किसी एक प्रभाग में तो यह संख्या साठ प्रतिशत तक दर्ज की गई, वहीँ किसी अन्य में यह संख्या तीस प्रतिशत तक ही पाई गई है।

हां, अवश्य ही हमें इसके बाद व्यापक पैमाने पर व्यस्थित सैंपलिंग और सर्वेक्षण को किये जाने की आवश्यकता है, ताकि व्यापक पैमाने पर स्थितियों को समझने में मदद मिल सके। तेजी से बदलते हालात में, हम किसी भी छोटे-पैमाने पर इकट्ठा किये गए आंकड़ों के भरोसे नहीं बैठ सकते, और ना ही उसके जरिये हम बड़े पैमाने पर हालात का कुछ भी सार्थक आकलन कर पाने की स्थिति में हो सकते हैं। पुणे में चले इस सीरो-सर्वेक्षण को मैं समझता हूँ कि इसे मात्र एक प्रारंभिक चरण के तौर पर लेना चाहिए, और मुझे आशा है कि इस प्रकार के अध्ययनों की एक श्रृंखला आगे भी देखने को मिलेगी।

एनसी: सीरो-सर्वेक्षण निश्चित तौर पर किसी विशेष इलाके में संक्रमण के स्तर को मापने के लिए एक उपयोगी माध्यम हो सकते हैं। ऐसे में आपके अनुसार महामारी विज्ञान के दृष्टिकोण से इस प्रकार के सर्वेक्षण का क्या महत्व है?

एसआर: वायरस किसी राजनीतिक भौगोलिक इलाके को नहीं पहचानता और यह सिर्फ 'पुणे शहर में ही नहीं फैला' है। यह उन समुदाय के लोगों के बीच में फैलता है जो एक-दूसरे के संपर्क में बने रहते हैं। इसलिए इस तरह के सर्वेक्षण (और निश्चित तौर पर सभी कोविड-19 से संबंधित महामारी विज्ञान में) से यदि कोई सार्थक समझ बननी है तो उसे हमेशा समुदायों को लेकर बनानी होगी, न कि किसी शहर, राज्य या देश जैसे प्रशासनिक अस्तित्व को ध्यान में रखकर बनाने की आवश्यकता है। लेकिन इसके बावजूद महामारी को लेकर हमारी वास्तविक सरकारी प्रतिक्रिया अनिवार्य तौर पर इन राजनीतिक भूभागों के आधार पर ही तय हो सकती हैं। इसे ध्यान में रखते हुए हम जब महामारी विज्ञान के प्रमाण की व्याख्या करते हैं और इसके आधार पर नीतिगत निर्णय लेते हैं तो हमें कम से कम उपरोक्त सीमाओं को ध्यान में रखना होगा।

जैसा कि आपने सीरो-सर्वेक्षण की उपयोगिता के बारे में जानना चाहा है, तो निश्चित तौर पर किसी समुदाय में संक्रमण कितना फ़ैल चुका है, इसके आकलन के लिए यह एक अच्छा औजार है। हमें नियमित तौर पर सीरो-सर्वे के काम को श्रंखलाबद्ध तरीके से जारी रखने की आवश्यकता है, ताकि जिस रफ्तार से वायरस समुदायों के बीच में फैल रहा है, उसे ट्रैक किया जा सके। (निश्चित तौर पर इसमें हमारे पास संसाधनों की बेहद कमी है, मैं इस बात को समझता हूँ।)

ऐसे में अभी जो सीरो-सर्वेक्षण किये गए हैं, उनसे हमें क्या पता चलता है? सबसे पहली बात तो यह है कि इसके जरिये कुछ स्पष्ट तथ्यों की पुष्टि हो रही है। इसके अनुसार वायरस का कम्युनिटी में फैलाव व्यापक स्तर पर हो रहा है। इससे पता चलता है कि वायरस सभी उम्र के वयस्कों में व्यापक स्तर तक पहुँच चुका है (बच्चों के बारे में हमें नहीं मालूम, क्योंकि उनके नमूने नहीं लिए गए हैं)। यह बताता है कि वायरस उन समुदायों के बीच में ज्यादा फैलता है जो भीड़-भाड़ वाले इलाकों (झोपड़ियों और किराये के मकानों) में निवास करते हैं, जैसा कि श्वसन सम्बन्धित किसी वायरस संक्रमण से उम्मीद की जाती है। इसकी पुष्टि के तौर पर प्रमाण का होना अच्छी बात है।
इससे भी दिलचस्प तथ्य यह है कि इस सीरो-सर्वेक्षण से किस दिशा में सोचने की जरूरत है, इस बारे में संकेत मिलते हैं।

ये बताता है कि जहाँ पिछले कुछ महीनों में इन समुदायों से कोविड-19 से संक्रमित होने वाले लोगों की औसत संख्या मात्र चार प्रतिशत ही रिपोर्ट हुई थी, जबकि असल में वहाँ तकरीबन 50% लोग संक्रमित हैं। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि ज्यादातर मामलों में वायरस ज्यादा से ज्यादा लोगों को संक्रमित तो कर रहा है (स्पर्शोन्मुख संक्रमण), लेकिन अधिकतर लोग इससे बीमार नहीं पड़ रहे हैं और हमारी समझ के विपरीत यह बेहद कम घातक स्वरूप लिए हुए है? यह निश्चित तौर पर संभव है यदि हमारे कोविड-19 मामलों (और मौतों) की संख्या विश्वसनीय रही होगी। क्या वे वाकई में हैं? यह वह प्रश्न है जिसके बारे में हमें अभी की तुलना में, कहीं अधिक गहनता से सवाल करने की जरूरत है।

सीरो-सर्वेक्षण हमें एक प्रमुख सवाल पूछने की अनुमति भी प्रदान करता है, और वह यह कि: दोबारा से संक्रमण की क्या संभावना है? हम अब उन लोगों के बीच भविष्य में संक्रमण की रफ्तार की तुलना करने के लिए आगे के सर्वेक्षण की योजना बना सकते हैं, जिसमें इस बात का पता लग सके कि 'सीरोनेगेटिव' की तुलना में 'सीरोपॉजिटिव' भविष्य में कितने संक्रमित हुए हैं। सीरो-सर्वेक्षण हमें अनुवर्ती कार्य की योजना तैयार करने की भी इजाजत देता है।

उदाहरण के लिए: ये एंटीबॉडी प्रतिक्रियाएं कितने समय तक के लिए काम में आने वाली हैं? नीति-निर्धारण में यह जानना बेहद अहम रहेगा, ताकि यह पूछा जा सके कि ‘जो लोग सीरोपॉजिटिव पाए गये थे, उन लोगों के बीच में सुरक्षात्मक एंटीबॉडी का स्तर कितना है? और इस प्रकार के अनुवर्ती कार्य हमें इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम बनाते हैं कि: इस रोग से बचाव के लिए वास्तव में किस स्तर के सुरक्षात्मक एंटीबॉडी की आवश्यकता है? इसमें कोई शक नहीं है कि टीकाकरण नीतियों को लेकर योजना बनाने का काम बेहद अहम है।

एनसी: एक महामारी को रोकने में सीरो-सर्वेक्षण किस प्रकार से उपयोगी हो सकता है?

एसआर: सीरो-सर्वेक्षण अपनी प्रकृति में ही पूर्वव्यापी स्वरूप लिए होते हैं, जिसमें हम इतिहास में अपनी सामूहिक भूमिका को देख सकते हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि वे सीधे तौर पर किसी महामारी को रोकने में वास्तव में उपयोगी साबित हो सकते हैं, हालांकि इस बात की काफी संभावना है कि मैं कुछ चीजें भूल रहा हूँ।

सीरो-सर्वेक्षण में रोगज़नक़ के खिलाफ इम्यून सिस्टम से विकसित विशिष्ट एंटीबॉडी की उपस्थिति का पता लगाने के लिए आबादी के किसी एक समूह को चुनकर उनके रक्त के नमूने को इकट्ठा कर, उनका सीरो-सर्वेक्षण किया जाता है। यहां SARS-CoV-2  के मामले में, रक्त के नमूने में वायरस के लिए विशिष्ट IgG एंटीबॉडी की उपस्थिति पाई गई है।

एक रोगज़नक़ की चपेट में आने और उसके साथ आनुषांगिक संक्रमण के उपरान्त शरीर में मौजूद इम्यून सिस्टम द्वारा इसके खिलाफ कई प्रकार के एंटीबॉडी के उत्पादन का काम शुरू कर देता है। ये एंटीबॉडी लंबे समय तक शरीर में बने रह सकते हैं, यहाँ तक कि कई महीनों तक इनकी उपस्थिति बनी रहती है। ऐसे में परीक्षण के दौरान ऐसे कई लोग देखने को मिलते हैं, जिन्हें खुद के संक्रमित होने के बारे में कोई जानकारी नहीं होती (स्पर्शोन्मुख मामलों), और उनमें विशिष्ट एंटीबॉडी मौजूद रहती है। व्यापक आबादी पर किए गए इस प्रकार के परीक्षण से संक्रमण के स्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि ऐसे सर्वेक्षणों से किसी प्रकार के निष्कर्षों को निकालते समय हमें आवश्यक सावधानी बरतने की जरूरत है।

 

https://www.newsclick.in/What-is-Sero-Survey-COVID-19-India-Pune

  

importance of sero survey for citizens
importance of sero survey
satyjeet rath on sero survey

Related Stories


बाकी खबरें

  • No more rape
    सोनिया यादव
    दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर
    29 Jan 2022
    भारत के विकास की गौरवगाथा के बीच दिल्ली में एक महिला को कथित तौर पर अगवा कर उससे गैंग रेप किया गया। महिला का सिर मुंडा कर, उसके चेहरे पर स्याही पोती गई और जूतों की माला पहनाकर सड़क पर तमाशा बनाया गया…
  • Delhi High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: तुगलकाबाद के सांसी कैंप की बेदखली के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दी राहत
    29 Jan 2022
    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 फरवरी तक सांसी कैंप को प्रोटेक्शन देकर राहत प्रदान की। रेलवे प्रशासन ने दिल्ली हाईकोर्ट में सांसी कैंप के हरियाणा में स्थित होने का मुद्दा उठाया किंतु कल हुई बहस में रेलवे ने…
  • Villagers in Odisha
    पीपल्स डिस्पैच
    ओडिशा में जिंदल इस्पात संयंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में उतरे लोग
    29 Jan 2022
    पिछले दो महीनों से, ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोग 4000 एकड़ जमीन जिंदल स्टील वर्क्स की एक स्टील परियोजना को दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह परियोजना यहां के 40,000 ग्रामवासियों की…
  • Labour
    दित्सा भट्टाचार्य
    जलवायु परिवर्तन के कारण भारत ने गंवाए 259 अरब श्रम घंटे- स्टडी
    29 Jan 2022
    खुले में कामकाज करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के हिस्से में श्रम हानि का प्रतिशत सबसे अधिक दक्षिण, पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में है, जहाँ बड़ी संख्या में कामकाजी उम्र के लोग कृषि क्षेत्र में…
  • Uttarakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड : नदियों का दोहन और बढ़ता अवैध ख़नन, चुनावों में बना बड़ा मुद्दा
    29 Jan 2022
    नदियों में होने वाला अवैज्ञानिक और अवैध खनन प्रकृति के साथ-साथ राज्य के खजाने को भी दो तरफ़ा नुकसान पहुंचा रहा है, पहला अवैध खनन के चलते खनन का सही मूल्य पूर्ण रूप से राज्य सरकार के ख़ज़ाने तक नहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License