NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
कोयला उद्योग के निजीकरण के ख़िलाफ़ 24 सितंबर को मज़दूरों की राष्ट्रीय हड़ताल!
कोयला क्षेत्र के निजीकरण के ख़िलाफ़ 'कोल इंडिया बचाओ’ अभियान के तहत 5 सितंबर को रांची में भाजपा संचालित ट्रेड यूनीयन बीएमएस को छोड़ कोयला मज़दूरों-कर्मचारियों की सभी प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने 24 सितंबर को राष्ट्रीय हड़ताल की घोषणा की है।
अनिल अंशुमन
13 Sep 2019
Coal
फोटो साभार: प्रभात खबर

अजीब विडम्बना है कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रहित के नाम पर चमत्कारिक जनादेश लेने वाली सरकार जबकि खुलेआम राष्ट्रविरोधी कृत्य कर रही है तब भी जागरुक नागरिक-भक्त मतदाता उसे सही मान रहें हैं। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है- देश की लाइफ़ लाइन कहे जाने वाले रेलवे के बाद अब कोयला क्षेत्र को सरकार ने पूरी तरह से निजी कंपनियों के हवाले करने का फ़ैसला किया है। जिसका प्रतिकूल असर सीधे राष्ट्र के राजस्व पर ही पड़ेगा, यह जानते हुए भी भक्त मतदाता मौन साधे हुए हैं। गोदी मीडिया भी हमेशा की भांति इन गंभीर मामलों को सिरे से ग़ायब कर सबका ध्यान फ़ेक मुद्दों पर केंद्रित किए हुए है।   

ऐतिहासिक सच है कि 1971–73 में तत्कालीन केंद्र की सरकार द्वारा सम्पूर्ण कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर निजी कंपनियों का वर्चस्व समाप्त कर दिया गया था। तब से किसी भी निजी कंपनी को कोयला के व्यावसायिक खनन और व्यापार की अनुमति नहीं थी। लेकिन 43 वर्षों बाद अब ‘राष्ट्रभक्त शासन’ के दूसरे दौर में इसे बदला जा रहा है। 28 अगस्त को केंद्र की सरकार ने देश के कोयला उद्योग में 100% एफ़डीआई कर शत प्रतिशत निजीकरण का फ़ैसला लिया है। जिसके तहत सरकार ख़ुद सार्वजनिक उपक्रम के कोयला क्षेत्र को देशी–विदेशी निजी कंपनियों के हवाले कर खनन और व्यापार कराएगी। दिनों दिन रुग्ण होती जा रही राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को चौपट करने का यह ‘पुनीत कार्य’ भी होगा विनिवेशिकरण के नाम पर।

कोयला क्षेत्र के निजीकरण के ख़िलाफ़ 'कोल इंडिया बचाओ’ अभियान के तहत 5 सितंबर को रांची में भाजपा संचालित ट्रेड यूनीयन बीएमएस को छोड़ कोयला मज़दूरों-कर्मचारियों की सभी प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने 24 सितंबर को राष्ट्रीय हड़ताल की घोषणा की है। सीएमपीडीआई सभगार में आयोजित इस मज़दूर कन्वेन्शन में धनबाद–बोकारो–हजारीबाग–रामगढ़ और रांची समेत कई अन्य ज़िलों से आए 1000 से भी अधिक मजदूर प्रतिनिधि शामिल हुए। इस संयुक्त मज़दूर कन्वेन्शन के वक्ताओं ने एक स्वर से मोदी सरकार के इस फ़ैसले को राष्ट्र और मज़दूर विरोधी बताते हुए मुखर विरोध किया।

COAL INDIA.jpg

उन्होंने यह भी कहा कि एक समय ऐसा था जब केंद्र की सरकार ने राष्ट्र हित में कोयला क्षेत्र को निजी कंपनियों से छीनकर इस उद्योग और राजस्व पर राष्ट्र का नियंत्रण क़ायम किया था। लेकिन वर्तमान सरकार उसे समाप्त कर फिर से निजी कंपनियों को सौंप रही है। इससे कोल इंडिया द्वारा राष्ट्र को दिया जाने वाला प्रतिवर्ष हज़ारों करोड़ रुपयों का लाभांश राजस्व भी कमज़ोर होगा। मज़दूर प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि वर्तमान के मज़दूरों को प्रतिदिन 1000-2000 रुपये मज़दूरी मिल रही है जो निजीकरण के बाद 300–400 रुपये हो जाएगी। 2014 में सत्तारूढ़ हुई इस सरकार ने पहले भी पूरे देश को खुलेआम झांसा देकर कोयला सेक्टर का 29.65% शेयर बेच दिया था और अब पूरा कोयला क्षेत्र ही बेचने जा रही है।

मज़दूर कन्वेन्शन ने सर्वसम्मति से,

1.  कोयला क्षेत्र से एफ़डीआई वापस लेने

2. बीसीसीएल–ईसीएल–सीसीएल व सीएमपीडीआई समेत कोल इंडिया की सभी कंपनियों को मिलाकर एक कंपनी बनाने

3. कोयला खनन क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट और आउटसोर्सिंग बंद कर स्थायी कर्मियों से काम कराने

4. कोल इंडिया में पूर्व की भांति सभी तरह का नियोजन पुनः शुरू किए जाने की मांग की गयी।

‘कोल इंडिया बचाओ‘ अभियान के तहत ही 9 अगस्त को राष्ट्रव्यापी प्रतिवाद किया गया था। कोयला मज़दूर कन्वेन्शन में इंडियन नेशनल माइंस वर्कर्स फ़ेडेरेशन (इंटक), हिन्द खदान मज़दूर संघ, इंडियन माइंस वर्कर्स फ़ेडेरेशन (एटक), ऑल इंडिया कोल वर्कर्स फ़ेडेरेशन (सीटू) तथा कोल माइंस वर्कर्स यूनियन (एक्टू) के नेता– प्रतिनिधि शामिल हुए।  

स्थापित तथ्य यह भी है कि 1774 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही तत्कालीन बंगाल के रानीगंज में दामोदर नदी के किनारे सबसे पहले कोयले का वाणिज्यिक खनन शुरू किया था। बाद में ब्रिटिश हुकूमत की अनुमति से कई स्थानों पर निजी कोयला खदान शुरू हुए। जिनके मालिक अधिकतर अंग्रेज़ ही होते थे लेकिन जैसे जैसे इसमें मुनाफ़े की रफ़्तार बढ़ने लगी तो कई धनिक भारतीय भी इस कारोबार में उतरे। जाते समय अंग्रेज़ अधिकांश कोयला खदान भारतीय मालिकों को बेचकर चले गए। हालांकि आज़ाद भारत में कुछ एक सरकारी खदान भी खुले लेकिन कोयला उद्योग पर निजी कंपनियों व मालिकों का ही बोलबाला रहा और उन्होंने ख़ूब मुनाफ़ा कमाया।

लेकिन इन सारे खदानों में काम करने वाले मज़दूरों की दशा गुलामों से भी बदतर थी। जान जोखिम में डालकर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बावजूद भी उन्हें उचित मज़दूरी नहीं मिलती थी। मालिकों की मनमानी और अत्यचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले को या तो सीधे काम से ही निकालकर कंपनी मालिकों के लठैत–पहलवानों द्वारा मारपीट कर कोलियरी से ही बाहर खदेड़ दिया जाता था या मारकर किसी खदान में फेंक दिया जाता था। धनबाद क्षेत्र की पुरानी कोलियारियों में उस दौर के रेज़ा–कुलियों के लिए बनी तंग कोठारी की बैरकों और पहलवानों के धौड़ा के अवशेष आज भी देखने को मिल जाएँगे। जिन्हें देखकर सहज अनुमान किया जा सकता है कि निजी कोलियरियों के दौर में खदान मज़दूरों पर होने वाला अमानवीय शोषण जो अंग्रेजों के समय था, आज़ादी के बाद भी किस तरह बदस्तूर जारी रहा। बताया जाता है कि निजी कोलियारियों के राष्ट्रीयकरण में कोयला खदान मज़दूरों का शोषण और काम की अमानवीय स्थितियां भी एक महत्वपूर्ण कारण था।

उक्त भयावह संदर्भों के कारण ही मोदी शासन द्वारा कोयला क्षेत्र के निजीकरण किए जाने के फ़ैसले का कोयला मज़दूर और उनके संगठनों का भारी विरोध हो रहा है। इनके विरोध का एक पहलू यह भी है कि अबतक वर्षों की मेहनत-मशक़्क़त और जनता की गाढ़ी कमाई से खड़ा किया गया कोयला क्षेत्र जैसे देश के सार्वजनिक प्रतिष्ठान, जिनका पूरा लाभांश–राजस्व सीधे देश को मिलता है उसका सारा रुपया–मुनाफ़ा निजी कंपनियों की तिजोरियों में चला जाएगा।

निः संदेह रेलवे, रक्षा, बैंक और हवाई प्राधिकरण क्षेत्र के मज़दूरों-कर्मचारियों के बाद अब देश के कोयला मज़दूरों का वर्तमान सरकार की कंपनीपरस्त व मज़दूर विरोधी नीतियों ख़िलाफ़ आंदोलन में खड़ा होना स्वागतयोग्य है। लेकिन इससे कौन इनकार करेगा कि चंद महीने पहले ही मज़दूर–कर्मचारी विरोधी फ़ैसले लेने वाली वर्तमान सरकार को चमत्कारी जनादेश दिलाने में इन सभी सरकारी सेक्टरों के मज़दूर–कर्मचारियों का कितना बड़ा योगदान रहा था।

कहावत है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाए? आज सचमुच ये मुहावरा चरितार्थ हो रहा है!

Against privatization of coal industry
workers protest
Save Coal India
Labor convention
Exploitation of Workers
BJP

Related Stories

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

आंगनवाड़ी महिलाकर्मियों ने क्यों कर रखा है आप और भाजपा की "नाक में दम”?


बाकी खबरें

  • हाईकोर्ट ने नहीं मानी कोरोना काल में सेंट्रल विस्टा का काम रोकने की दलील
    भाषा
    हाईकोर्ट ने नहीं मानी कोरोना काल में सेंट्रल विस्टा का काम रोकने की दलील
    31 May 2021
    परियोजना रोके जाने की मांग करते हुए यह याचिका अनुवादक अन्य मल्होत्रा और इतिहासकार एवं वृत्तचित्र फिल्मकार सोहेल हाशमी ने दायर की थी। याचिका में दलील दी गई थी कि यह परियोजना आवश्यक गतिविधि नहीं है और…
  • Gautam Gambhir
    भाषा
    गंभीर के पास बड़ी मात्रा में फैबीफ्लू मिलने की सही जांच नहीं करने के लिए औषधि नियंत्रक को फटकार
    31 May 2021
    उच्च न्यायालय ने क्रिकेट खिलाड़ी से नेता बने गंभीर द्वारा दवा खरीद के मामले की जांच के सिलसिले में दाखिल औषधि नियामक की स्थिति रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि इस संस्था से अदालत का भरोसा डगमगा गया…
  • मजबूत सरकार से हाहाकारः मजबूर सरकार की दरकार
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    मजबूत सरकार से हाहाकारः मजबूर सरकार की दरकार
    31 May 2021
    उत्तर भारत में दलित आंदोलन के प्रणेता कांशीराम की एक बात बहुत याद आती है। वे कहा करते थे कि हमें देश में मजबूत नहीं मजबूर सरकार चाहिए। क्योंकि मजबूर सरकार जनता के लिए जवाबदेह होती है और मजबूत सरकार…
  • बदलाव के मुहाने पर इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष
    एम. के. भद्रकुमार
    बदलाव के मुहाने पर इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष
    31 May 2021
    जब तक फिलिस्तीनी भूभाग पर कब्जा और जातीय संहार वाली इजरायल की नीतियां जारी रहती हैं एवं हिंसा जारी रहती है,  तब तक उसका प्रतिरोध और मज़बूत होता रहेगा। 
  • भारत के विकास की दिशा की ख़ामियों को महामारी ने उधेड़ कर सामने रख दिया है
    टिकेंदर सिंह पंवार
    भारत के विकास की दिशा की ख़ामियों को महामारी ने उधेड़ कर सामने रख दिया है
    31 May 2021
    अगर भारत अपने संधारणीय विकास लक्ष्यों के पास पहुंचना और मौसम परिवर्तन, आय और लैंगिक असमानताओं की चुनौतियों का सामना करना चाहता है, तो देश को अपने तरीकों में बदलाव करना होगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License