NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कर्नाटक: क्या झूठ और सांप्रदायिक प्रचार से भाजपा चुनावों में जीत दिला सकती है?
कर्नाटक में लोग सो नहीं रहे हैं, बल्कि वे भाजपा की सत्ता पर काबिज़ होने की हताश रणनीति देख रहे हैं।
योगेश एस.
28 Feb 2018
Translated by महेश कुमार
कर्णाटक
Image Courtesy : deccanchronicle.com

राजनीति का मतलब है राजसत्ता इसलिए, स्वाभाविक रूप से, राजनीतिक दल चुनाव लड़कर जीतने के बाद सत्ता में आने के लिए अपनी तरफ से भरसक प्रयास करते हैं। चुनावों में, उन्हें जनता के सामने अपने एजेंडे के साथ जाना पड़ता है, वोटों का संग्रह प्रचार के ज़रिए जो परिणाम निकलते हैं वे हमें बताते हैं कि क्या राजनीतिक दल और उनका एजेंडा सफल या असफल रहा है। हालांकि, चुनावी लोकतंत्र का यह पाठ्यपुस्तक संस्करण भारत में बदल गया है। अधिकांश पार्टियाँ लोगों के विश्वास को जीतने की कोशिश एजेंडे पर नहीं, समझाने के आधार या वे क्या करने जा रहे हैं पर नहीं बल्कि अन्य कुटिल साधनों का सहारा लेते हैं। इसका कारण यह है कि वे केवल सत्ता में दिलचस्पी रखते हैं, लोगों की सेवा में नहीं। कर्नाटक, जहाँ मई में राज्य विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं, यह एक सबसे बढ़िया उदहारण कि सत्ता हथियाने के लिए कैसे-कैसे तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।

2014 में भाजपा केंद्र की सत्ता में आई और लोकसभा में बहुमत हासिल करने के बाद के हुए  विधानसभा चुनावों में अधिकांश राज्यों में वह सत्ता पर काबिज़ हो गयी। अब 29 राज्यों में से केवल 10 राज्यों में गैर-भाजपा दलों की सरकारें हैं। भाजपा ने स्पष्ट रूप से घोषित किया है कि इसका लक्ष्य सभी 29 राज्यों में शासन करना है। इसलिए, इन 10 गैर-भाजपा शासित राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए और इस लड़ाई को जीतने के लिए, सभी 29 राज्यों में अपने शासन का विस्तार करने और उसे स्थापित करने के लिए वह रणभूमि में कूद गए हैं।

कर्नाटक उन राज्यों में से एक है जहाँ यह युद्ध लड़ा जाना है। भाजपा भारत के पांच दक्षिणी राज्यों में सत्ता हासिल करने के लिए तैयारी कर रही है और यह कर्नाटक को दक्षिण के प्रवेश द्वार के रूप में देखता है। यह पाँच दक्षिणी राज्यों में से एक है, जहाँ पूर्व में बीजेपी सरकार रही है और पार्टी राज्य में वापसी करने के लिए अपनी करनी में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।

केवल चुनाव के नतीजे ही बताएंगे कि कौन सफल रहा और कौन नहीं, अभी चुनाव परिणामों के बारे में भविष्यवाणी करना और चर्चा करने के बारे में बहुत जल्दी नहीं करनी चाहिए। लेकिन चुनावों को जीतने के लिए भाजपा की कार्यरत रणनीति पर एक नजदीकी नजर डालने की जरूरत है। याद रखें, बीजेपी को 2013 में अपने कांग्रेस से चुनाव भ्रष्टाचार और कुलीनतावादी रवैये की वजह से हार गयी थी, और वह आम लोगों से स्पष्ट रूप से विमुख हो गयी थी, जो कि आम लोगों को एक सभ्य सरकार प्रदान करने में नाकाम रही थी। यह प्रासंगिक है क्योंकि यह सत्ता हासिल करने की भाजपा की हताशा को बताता है, भले ही इसके लिए उन्हें कई तरह की रणनीतियां जो हालात के अनुरूप बदलती रहती हैं को अपनाना पड़े।

द हिंदू में एक रिपोर्ट में यह उल्लेख है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही में यह प्रतियोगिता चल रही है कि "कौन अधिक सांप्रदायिक है और कैसे वे विकास के एजेंडा को अलग रखते हैं, और इसके लिए वे एक-दुसरे को उजागर करने के लिए काफी उत्सुक हैं"। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह दोनों ही अब तक कांग्रेस सरकार पर "हिंदू विरोधी" और अराजकता के आरोप लगा चुके हैं। शाह वर्तमान में कर्नाटक का दौरा कर रहे हैं, यहां तक कि परेश मेस्टा और दीपक राव के परिवारों का दौरा भी किया गया, जिनकी मौत को भाजपा नेताओं ने सांप्रदायिक रंग दे दिया था, जिसके परिणामस्वरूप राज्य में सांप्रदायिक हिंसा हुई।

इस यात्रा में शाह ने कर्नाटक और गोवा के बीच महादयी जल विवाद पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है, ताकि मुंबई-कर्नाटक क्षेत्र के किसानों के वोटों को लुभाया जका सके। शाह ने भी किसानों से वादा किया है कि कर्नाटक में किसानों को नदी के पानी तक पूर्ण पहुंच देकर भाजपा महादयी नदी विवाद सुलझा लेगी।

नदी पर विवाद बीजेपी शासित राज्य गोवा के साथ है। किसी को भी यह जरूर सोचना चाहिए कि अगर बीजेपी और प्रधानमंत्री किसानों की दिक्कत से सहानुभूति रखते हैं, तो उन्हें इस मुद्दे को हल करने किसने रोका है? आम तौर पर, प्रधानमंत्री और भाजपा तेजी से कार्यान्वयन और परिणाम का दावा करते हैं। तो वह दावा अब क्यों नहीं? वे निश्चित रूप से इसे हल नहीं करेंगे, क्योंकि उनकी चिंता इस चुनाव को दूसरे राज्य की तरह जीतना है न कि किसानों की समस्याओं को हल करना। झूठ बोलने की माहिर भाजपा की गंभीर आलोचना हो रही है।

कर्नाटक में बीजेपी का इतिहास हमें राज्य में सत्ता में आने के लिए पार्टी द्वारा अपनाई गई रणनीति और माध्यमों की एक झलक देता है। यह इतिहास बढ़ी हुई सांप्रदायिक हिंसा और बढे हुए भ्रष्टाचार को बताता है। वर्तमान कांग्रेस सरकार राज्य ने धर्मनिरपेक्ष ढांचे के विनाश को रोकने और येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के भ्रष्टाचार से लड़ने के एजेंडा के साथ सत्ता में आई थी।

येदियुरप्पा, जो फिर से पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं, पर आरोप लगाया गया था कि बेल्लारी खनन घोटाले में वे शामिल थे, जो कि 3 अरब डॉलर का घोटाला है। उनकी सरकार ने राज्य में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले भी किये। राज्य में इस कुख्यात इतिहास की वजह से, भाजपा के पास कुछ भी नहीं जिसे वह जनता के सामने पेश कर सके, लेकिन पार्टी को वोट देने के लिए जनता को रणनीति के तौर पर मौजूदा कांग्रेस सरकार पर किसी भी तरह का आरोप लगाया जा रहा है। चुनावों में पहले भी बीजेपी की वजह से राज्य में सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि हुई और उनके हाथ निर्दोष पीड़ितों के खून से सने हुए हैं, इस हिंसा को संघ परिवार ने सहायता प्रदान की थी, भाजपा से संबद्ध संगठनों के बड़े परिवार, जो सभी आरएसएस से जुड़े थे वे इसमें शामिल थे। अल्पमत के तुष्टीकरण की राजनीति का मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर आरोप लगाते हुए, भाजपा अपनी सांप्रदायिक राजनीति को उचित ठहरा रही है।

लंदन विश्वविद्यालय में उन्नत अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर जेम्स मैनर ने हमें कर्नाटक राज्य में चुनावी राजनीति का विस्तृत ऐतिहासिक लेख दिया है, हाल ही में आर्थिक और राजनीतिक साप्ताहिक में प्रकाशित विश्लेषणात्मक लेख में। मनोर ने सही ही कहा कि: "कर्नाटक में कोई भी राज्य सरकार 1985 से दोबारा से निर्वाचित नहीं हुई है। पिछले 32 सालों में मतदाताओं ने छह सरकारों को खारिज कर दिया जिनमें से कुछ ने काफी अच्छा प्रदर्शन भी किया था, लेकिन फिर भी उन्हें खारिज़ कर दिया।" यह वर्तमान कांग्रेस सरकार के साथ भी होने जा रहा है और वे कहते है: "यह गंभीर वास्तविकता राज्य में किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के दृष्टिकोण पर संदेह करती है, जिसमें सिद्दारमैया की अगुवाई वाली वर्तमान कांग्रेस सरकार भी शामिल है और जो मई 2018 में चुनाव का सामना करेंगे।"

जैसा कि राज्य में चुनाव के आसपास होने वाली घटना के बारे में हर कोई बहस कर रहा हैं, मनोर ने भी नोट किया कि: "कांग्रेस को भी एक बड़ी राजनीतिक गति के साथ एक पार्टी से चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश राज्य चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जीत और इसके बाद बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होने के कारण कई लोग इसे अजेय रूप से देखने लगे हैं। लेकिन कर्नाटक के पास अपना विशिष्ट राजनीतिक तर्क है मौजूद।"

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018
बीजेपी-आरएसएस
साम्प्रदायिकता

Related Stories

हिमाचल : गरीब किसानों को उजाड़कर पूंजीपतियों को बांटी जा रही सरकारी ज़मीन

दिल्ली में अखंड भारत मोर्चा द्वारा सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश

नीतीश कुमार BJP-RSS के राजनीतिक बंधक हैं : उर्मिलेश

ये दंगे सुनियोजित थे

बिहार-बंगाल दंगे, 2019 की तैयारी :उर्मिलेश

तमिलनाडु के विपक्षी दलों ने 'राम राज्य रथ यात्रा’ को अनुमति देने का विरोध किया

कर्नाटक में मोदी: नदी जल, एमएसपी और प्रशादम

देश में बढ़ती सांप्रदायिक घटनाओं के बीच, बीजेपी संसद ने कहा "मुसलमानों को भारत छोड़ देना चाहिए"

प्रधानमंत्री मंत्री के 'टॉप प्रायोरिटी' वाले बयान में है कितनी सच्चाई ?

झाड़ियों में घुसकर चूमते प्रेमियों को पकड़ने वाले समाज में अंकित की मौत अंतिम नहीं है


बाकी खबरें

  • yogi bulldozer
    सत्यम श्रीवास्तव
    यूपी चुनाव: भाजपा को अब 'बाबा के बुलडोज़र' का ही सहारा!
    26 Feb 2022
    “इस मशीन का ज़िक्र जिस तरह से उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियानों में हो रहा है उसे देखकर लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से इसे स्टार प्रचारक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।”
  • Nagaland
    अजय सिंह
    नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”
    26 Feb 2022
    आफ़्सपा और कोरोना टीकाकरण को नगालैंड के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है, जिसके ख़िलाफ़ लोगों में गहरा आक्रोश है।
  • women in politics
    नाइश हसन
    पैसे के दम पर चल रही चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नामुमकिन
    26 Feb 2022
    चुनावी राजनीति में झोंका जा रहा अकूत पैसा हर तरह की वंचना से पीड़ित समुदायों के प्रतिनिधित्व को कम कर देता है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व नामुमकिन बन जाता है।
  • Volodymyr Zelensky
    एम. के. भद्रकुमार
    रंग बदलती रूस-यूक्रेन की हाइब्रिड जंग
    26 Feb 2022
    दिलचस्प पहलू यह है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने ख़ुद भी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से सीधे पुतिन को संदेश देने का अनुरोध किया है।
  • UNI
    रवि कौशल
    UNI कर्मचारियों का प्रदर्शन: “लंबित वेतन का भुगतान कर आप कई 'कुमारों' को बचा सकते हैं”
    26 Feb 2022
    यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ने अपने फोटोग्राफर टी कुमार को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान कई पत्रकार संगठनों के कर्मचारी भी मौजूद थे। कुमार ने चेन्नई में अपने दफ्तर में ही वर्षों से वेतन न मिलने से तंग आकर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License