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भारत
राजनीति
कर्नाटक सीज़न 2 : जनादेश को उलट सत्ता हथियाने की कला  
भाजपा देश के सामने सत्ता के बदल और सत्ता को हथियाने का एक नया मॉडल पेश कर रही है, खासकर उस स्थिति में जब उसे लोगों से जनादेश नहीं मिलता है।
सुबोध वर्मा
29 Jul 2019
Translated by महेश कुमार
KARNTAKA

अभी एक साल पहले ही, यानी मई 2018 में, कर्नाटक की जनता ने विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को निर्णायक रूप से खारिज़ कर दिया था। चुनाव आयोग के रिकार्ड के अनुसार, भाजपा को 36 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को 38 प्रतिशत और जनता दल (सेक्युलर) को 18प्रतिशत वोट मिले। यह बात सही है कि कांग्रेस और जेडीएस ने चुनाव अलग-अलग लड़ा था, लेकिन चुनाव के बाद वे एक साथ आ गए थे। बीजेपी को सबसे पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया था क्योंकि राज्यपाल, गुजरात से भाजपा के निष्ठावान, स्पष्ट रूप से भाजपा के पक्ष में पक्षपाती थे। यह इस तथ्य से भी स्पष्ट था कि नई सरकार को अपना बहुमत साबित करने के लिए लंबा समय दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, सदन के पटल पर तुरंत मतदान का आदेश दिया और भाजपा इस मतदान में हार गई। यह इस नाटक का सीजन 1 था।

सीज़न 2 में, भाजपा ने देश के सामने सत्ता हथियाने का एक अनोखा तरीका पेश किया है। यह थोक में दलबदल नहीं करा रहे है, न ही कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों को खरीद रहे हैं, वे छोटे दलों को विभाजित या निगल भी नहीं रहे हैं, न ही यह क्षेत्रीय पार्टी के साथ कोई नया गठबंधन है। इन तरीकों को अन्य राज्यों में लागू किया गया था (विवरण के लिए नीचे देखें) मुख्य रूप से दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए। लेकिन, कर्नाटक में, एक अलग ही स्थिति थी। यहां दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने के लिए आवश्यक संख्या बहुत बड़ी थी और इसलिए भाजपा कांग्रेस और जेडीएस में विभाजन या कानूनी तोड़फोड़ का इंतज़ाम नहीं कर सकती थी।

लेकिन, कहते हैं जहां चाह, वहां राह। खासकर अगर आपके अपार धन है।

सत्ता परिवर्तन का नया मॉडल

इसलिए, भाजपा ने सत्ता परिवर्तन का एक नया चमत्कार पेश किया। इसे विधानसभा सत्र से अनुपस्थित रहने के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन के 17 विधायक मिले। जिससे सदन की कुल ताकत में कमी आ गई। जहां तक विश्वास मत का संबंध है, उपस्थिति के बारे में कोई कानून नहीं है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘विद्रोही’विधायकों को सदन में अनुपस्थित रहने की अनुमति दे दी। यदि सदन की ताकत कम है, तो स्वाभाविक रूप से बहुमत पाने के लिए आवश्यक संख्या भी कम हो जाती है। और इस तरह, गठबंधन की ताकत ‘विद्रोहियों’ के वोट के बिना कम होनी ही है।

इसलिए, बीजेपी को – सरकार बनाने के लिए उसी गवर्नर ने आमंत्रित कर लिया। बेशक, इनके नेता वही बीएस येदियुरप्पा (Yediyuruppa) हैं, जिन्होंनेअपने नाम की वर्तनी में बदलाव किया है। 2007 से, वह इसे येद्दयुरप्पा (Yeddyurappa) के रूप में लिख रहे थे। यह कोई तकनीकी आवश्यकता नहीं है, यह सिर्फ इतना है कि न्यूमेरोलॉजिस्टों (अंक ज्योतिषी) ने उन्हें इसकी सलाह दी है कि पहले की वर्तनी उनके लिए दुःख का कारण बन रही थी, जो 2008 और2013 में मुख्यमंत्री पद से हटने और 2018 में फिर से उनके लिए रुकावट बनी थी।

हालाँकि मीडिया “दूर रहकर” भाजपा के दुष्ट चाल (devilish skills) की प्रशंसा कर रहा है, यहाँ तक कि कांग्रेस और जेडीएस का नैतिक गठबंधन खुद ब खुद ही मर गया, जो सच्चाई से बहुत दूर है। बीजेपी और येदियुरप्पा पिछले साल से ही गठबंधन सरकार को बर्बाद करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे थे। विधायकों के बार-बार लालच दिए जाने की कई खबरें आ रही थी। एक जेडीएस विधायक ने यहां तक कहा कि बीजेपी उन्हें उनके साथ आने के लिए 40 करोड़ रुपये की पेशकश कर रही है जिसका एक वीडियो भी जारी किया गया। इस साल मई में लोकसभा चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद, इन प्रयासों को एक नई उर्ज़ा मिली। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी 17 विधायकों को लुभाने और 2018 के जनादेश को पलटने में कामयाब रही।

अन्य राज्यों में बीजेपी द्वारा सत्ता पर कब्ज़ा

2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से, उसने खुलेआम विधायकों/सांसदो की खरीद्फरोख्त शुरू कर दी और लोगों के जनादेश के खिलाफ जाकर भाजपा ने कई राज्यों में सत्ता गंदी चालों के जरिये हड़प ली। यहाँ कुछ उदाहरण पेश हैं:

• अरुणाचल प्रदेश में 2014 के विधानसभा चुनावों में, बीजेपी ने 11 सीटें जीतीं थी, कांग्रेस ने 42, पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल ने 5 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2 सीटें जीती थी। दो वर्षों के दौरान, यह संख्या बदल गई: बीजेपी 48; कांग्रेस 1; पीपीए 9; स्वतंत्र 2 हो गए! यानी थोक में दलबदल, फिर राष्ट्रपति शासन का मंत्र, पूर्व सीएम की मृत्यु, सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप, एक अनिच्छुक राज्यपाल को वापस बुलाना और उसके बाद चार मुख्यमंत्री और भाजपा ने आखिरकार सत्ता हथिया ली!

• 2014 में झारखंड के विधानसभा चुनावों में, 81 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी ने 35 सीटें और उसके सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन ने 5 सीटें जीतीं थी। वे बहुमत से थोड़े ही दूर थे। इसलिए, फिर से उन्होंने कुछ निर्दलीय सदस्यों पर जीत हासिल की और झारखंड विकास मोर्चा के 8 में से 6 विधायकों को लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया।

• 2015 में बिहार विधानसभा में 243 सीटों के लिए चुनाव हुए थे, भाजपा को सिर्फ 53 सीटें मिलीं और उसके सहयोगियों को 2 सीटें मिलीं थी। राष्ट्रीय जनता दल-जनता दल (युनाइटेड)-कांग्रेस के गठबंधन जिसे चुनाव पूर्व गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ने के लिए बनाया गया था को 178 सीटों का भारी जनादेश मिला। फिर भी, बीजेपी ने इस गठबंधन को तोड़ दिया। जेडी (यू) और उसके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लालच दिया गया और जुलाई 2017 में गठबंधन सरकार बनाई गई।

• गोवा विधानसभा में, 2017 के चुनावों में भाजपा को कुल 40 में से 13 सीटें मिली थी। परिणाम घोषित होने के बाद उन्होंने छोटे स्थानीय दलों के साथ गठबंधन बनाया और सरकार बना ली जबकि सदन में सबसे बड़ा दल, कांग्रेस, 17 सीटों के साथ विपक्ष में बैठा।

• मणिपुर में, भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनावों में 60 में से 21 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस को 28 सीटें मिलीं थी। लेकिन भाजपा ने दो स्थानीय पार्टियों नेशनल पीपुल्स पार्टी और नागा पीपुल्स फ्रंट तथा लोक जनशक्ति पार्टी के अकेले विधायक को अपनी तरफ मिला लिया और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। भाजपा की पूर्व सांसद राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने सरकार बनाने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को पहले आमंत्रित कर मदद की।

• मेघालय में, भाजपा ने 2018 के चुनाव में 60 सदस्यीय विधानसभा में दो सीटें जीतीं थी। लेकिन इसने सरकार का हिस्सा बनने के लिए एनपीपी के साथ चुनाव बाद गठबंधन किया। फिर, एक सहायक राज्यपाल, गंगा प्रसाद, जो बिहार के एक पूर्व भाजपा एमएलसी थे, ने सरकार बनाने में मदद की।

• और, 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में, 224 सदस्यीय विधानसभा में केवल 104 विधायक होने के बावजूद (जबकि 2 सीटों पर चुनाव नहीं हुए),भाजपा ने 55 घंटे के लिए, भाजपा के गुजरात के पूर्व विधायक वजुभाई वाला की मदद से जो अब राज्य के राज्यपाल हैं सरकार बनाई। अगर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया होता और अगले दिन ही फ्लोर टेस्ट नहीं हुआ होता, तो भाजपा खुशी से सत्ता में बनी रहती।

इन उदाहरणों, और कर्नाटक में नवीनतम सीज़न 2, फिर से यह साबित करता हैं कि भाजपा हर स्तर पर सत्ता के लालच में बेशर्म और बेईमान है। उनकी नजरों में आम लोगों या उनके जनादेशों का सम्मान नहीं हैं और खुले तौर पर लोकतांत्रिक मानदंडों और संघीय सिद्धांतों को पलटने के कुटिल तरीके अपनाए है, जो संविधान का मूल है। उनके लिए, अंत भला तो सब भला का सिद्धांत सही है।

 

 

 

 

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