NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कृषि में जाति का बोलबाला
दलितों के पास कम भूमि है, और वह भी ज्यादातर मामूली या छोटी जोत है, यह हाल में हुए नवीनतम कृषि सर्वेक्षण से पता चलता है।
सुबोध वर्मा
11 Oct 2018
सांकेतिक तस्वीर

भारत में 1571.4 लाख हेक्टेयर (157 मिलियन हेक्टेयर) ऐसा क्षेत्र है जो कृषि उपयोग के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह आंकड़ा एक चौंकाने वाली संख्याओं में विभाजित है - उपरोक्त में लगभग 1457.3 लाख (146 मिलियन) हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है लेकिन इसकी ख़तरनाक परिभाषित विशेषता जाति है जिसके आधार पर इस भूमि का स्वामित्व फैला हुआ है।

जैसा कि कृषि जनगणना (2015-16 में किया गया) की नई जारी रिपोर्ट के अनुसार, दलित (या अनुसूचित जाति) इस विशाल भूमि के सिर्फ 9 प्रतिशत से भी कम पर खेती का काम करते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार ग्रामीण इलाकों में उनकी आबादी का हिस्सा 18.5 है। जैसा कि अन्य सर्वेक्षणों और जनगणना में दिखाया गया है, अधिकांश दलित वास्तव में भूमिहीन हैं।

आदिवासी समुदाय (या अनुसूचित जनजाति) भूमि के लगभग 11 प्रतिशत हिस्से पर खेती से जुड़ा काम करते हैं जो ग्रामीण इलाकों में उनकी जनसंख्या की हिस्सेदारी के बराबर है। लेकिन इनमें से अधिकांश भूमि मुश्किल भरे दूर-दराज़ वाले इलाके में है, इस भूमि के लिए सिंचाई का कोई इंतजाम नहीं है और सड़कें भी नहीं पहुंची हैं। इसमें जीवन निर्वाह खेती के लिए समुदायों द्वारा संचालित वन भूमि भी शामिल है।

लगभग 80 प्रतिशत कृषि भूमि का संतुलन 'अन्य' जातियों द्वारा संचालित होता है जो तथाकथित ऊंची जातियों या 'अन्य पिछड़े वर्ग' से (ओबीसी) हैं।

Share of operated area1.jpg

यह चौंकाने वाली असमानता और विघटन सदियों से दमनकारी प्रथाओं का ही एक परिणाम है जहां दलित किसान अधिकतर कुलीन संपत्ति मालिकों की भूमि पर और बाद में मजदूरी के लिए बंधुआ या दास के रूप में काम करते हैं। इस प्रणाली की निरंतरता से भूमि सुधार बुरी तरह से असफल रहे हैं और केवल दलितों की असहाय एवं दयनीय स्थिति को कायम रखा है।

भारत में भूमि अधिग्रहण प्रणाली का एक और पहलू है जो इस जाति आधारित शोषण को मजबूत करता है। यह नीचे ग्राफिक में दर्शाया गया है जो विभिन्न समुदायों द्वारा संचालित भूमि स्वामित्व का आकार दिखाता है।

caste and land gfx2.jpg

दलितों के स्वामित्व वाली सभी भूमियों में से लगभग 61 प्रतिशत का स्वामित्व 2 हेक्टेयर से कम है। इन्हें आमतौर पर सीमांत (1 हेक्टेयर से कम) और छोटे (1 और 2 हेक्टेयर के बीच) के रूप में वर्णित किया जाता है। आदिवासियों में, छोटे और सीमांत किसानों की यह श्रेणी लगभग 40 प्रतिशत है जबकि 'अन्य' समुदायों में यह 46 प्रतिशत से अधिक है।

इस प्रकार, न केवल आबादी के उनके हिस्से की तुलना में दलितों के पास काफी कम भूमि है, बल्कि यह उनकी भूमि का आकार इतना छोटा है, कि जो उन्हें निरंतर स्थानिक आर्थिक संकट में धंसने के लिए मजबूर कर रहा है। मध्यम आकार के किसान- जिनके पास 2 से 10 हेक्टेयर भूमि है- उनमें से केवल एक तिहाई दलित किसान शामिल हैं जबकि 'अन्य' समुदायों में यह अनुपात 44 प्रतिशत है और आदिवासी समुदायों में यह 50 प्रतिशत से अधिक है।

कृषि जनगणना से उत्पन्न ये परिणाम क्या दिखाते हैं कि प्राचीन जाति व्यवस्था देश में भूमि वितरण पर मौत की तरह जकड़ी हुई है, यह इस प्रकार दलितों और आदिवासियों के खिलाफ लगभग सार्वभौमिक उत्पीड़न और भेदभाव की नींव रखती है। इसलिए भूमि अधिग्रहण ही इन समुदायों को भारतीय समाज की सबसे गहराई में धक्का देने वाला सिर्फ एकमात्र कारक नहीं है, बल्कि निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण आधारभूत कारण है।

नतीजे यह भी दिखाते हैं कि जाति के नष्ट होने की बातें और कि यह भारत से गायब हो गई है जैसी हवाई बातें हैं जिसे पूरी तरह से उच्च जाति शहरी समर्थक द्वारा निर्मित किया गया है। ये सर्वेक्षण परिणाम 2015-16 के हैं जिन्हे हाल ही में जारी किया  हैं। वर्णाश्रम का किला आज़ भी उतना ही मजबूत है जितना की सदियों पहले था।

agricultural crises
cast-ism
cast economy
Scheduled Caste
Dalit farmer
upper caste

Related Stories

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

बिहार: कोल्ड स्टोरेज के अभाव में कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर आलू किसान

सीवर और सेप्टिक टैंक मौत के कुएं क्यों हुए?

यूपी चुनाव: पूर्वी क्षेत्र में विकल्पों की तलाश में दलित

उत्तराखंड चुनाव : जंगली जानवरों से मुश्किल में किसान, सरकार से भारी नाराज़गी

“आरक्षण मेरिट के ख़िलाफ़ नहीं”, सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को ज़बानी याद करने की ज़रूरत है

ग्राउंड  रिपोर्टः रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के गृह क्षेत्र के किसान यूरिया के लिए आधी रात से ही लगा रहे लाइन, योगी सरकार की इमेज तार-तार

उत्तर प्रदेश चुनाव : हौसला बढ़ाते नए संकेत!

पूर्वांचल से MSP के साथ उठी नई मांग, किसानों को कृषि वैज्ञानिक घोषित करे भारत सरकार!


बाकी खबरें

  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    सुधा भारद्वाज को SC से राहत, यूपी के aspirant शिक्षक तेज़ करेंगे आंदोलन और अन्य ख़बरें
    07 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी सुधा भारद्वाज को SC से मिली राहत, यूपी शिक्षक भर्ती आंदोलन और अन्य ख़बरों पर।
  • bhasha
    न्यूज़क्लिक टीम
    पांच राज्यों में मोदी की नीतियों पर गुस्सा परिणाम में दिखेगाः मनोज कुमार झा
    07 Dec 2021
    वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा से संसद के भीतर विपक्ष पर हो रहे हमले से लेकर पांच विधानसभा चुनावों के राजनीतिक समीकरण पर बातचीत की। मनोज कुमार झा ने…
  • chunav
    अजय कुमार
    बिहार के दो पंचायत क्षेत्रों के चुनावी दांवपेच और भावुकता की कहानी
    07 Dec 2021
    संसद और विधायकी के चुनावी माहौल पर बहुत ज्यादा बहस होती है लेकिन पंचायती चुनाव के माहौल पर बहुत कम। तो चलिए बिहार के दो पंचायत क्षेत्रों के चुनावी माहौल को भांपने की कोशिश करते हैं।
  • Medical staff
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः ओमिक्रॉन के बढ़ते मामलों के बीच सभी छुट्टियां रद्द होने के चलते नाराज़ मेडिकल स्टाफ़
    07 Dec 2021
    बिहार में कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का ख़तरा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। विदेश से लौटे कुछ लोग कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं। इसको लेकर राज्य में चिंता बढ़ गई है।
  • MGNREGA
    प्रभात पटनायक
    क्यों घोंटा जा रहा है मनरेगा का गला! 
    07 Dec 2021
    यूपीए-2 के दौरान ही मनरेगा से पीछे खिसकने की शुरूआत हो चुकी थी। कई साल तक इसके लिए बजट आवंटन 60,000 करोड़ रुपए के करीब ही बनाए रखा गया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License