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भारत
राजनीति
कश्मीर: अमित शाह का 'विकास' का तर्क धोखा जैसा क्यों है ?
हिंदुत्व को बढ़ावा देने के अलावा एक उत्पादक गतिविधियों में लगी हुई अर्थव्यवस्था का विशेष दर्जा हटाने से बीजेपी के कॉर्पोरेट संरक्षकों को सबसे अधिक फायदा पहुंचेगा।
प्रभात पटनायक
11 Aug 2019
jammu and kashmir
image courtesy: Wikimedia Commons

कश्मीर के विशेष राज्य दर्जा को समाप्त करने के फैसले के समर्थन में अमित शाह ने राज्यसभा में अपने भाषण में कश्मीर के "विकास" का सवाल उठाया। उन्होंने यह तर्क देते हुए कहा कि शेष भारत के साथ घनिष्ठ संबंध से इस राज्य में निवेश होगा। उन्होंने ख़ासतौर से कश्मीर के युवाओं से अपील करते हुए कहा कि उनके पास रोज़गार के बड़े अवसर होंगे।

जब भारत में बेरोज़गारी पिछले 45 वर्षों में अभी के जितना ख़राब नहीं हुआ तो यह दावा करना कि भारत के साथ घनिष्ठ संबंध से कश्मीर की रोज़गार की संभावनाओं में सुधार होगा ऐसे में यह विडंबना ही है। लेकिन हमें इस तर्क पर बारीकी से ग़ौर करना चाहिए।

विशेष दर्जा या ग़ैर विशेष दर्जा, यह विचार कि बड़े पैमाने पर उद्योग जो किसी भी स्थानीय कच्चे माल के प्रसंस्करण से असंबद्ध है वह कश्मीर में जाएगा काफी हास्यास्पद है (हालांकि शाह ने बड़े पैमाने पर उद्योग का उल्लेख किया है)। कश्मीर में एक संयंत्र लगाने से जुड़ी परिवहन लागत निषेधात्मक होगी; और "बाहरी लोगों" द्वारा भूमि की ख़रीद को प्रतिबंधित करने वाला अनुच्छेद 35A के हटने के साथ भूमि की क़ीमत बढ़ेगी। ये तर्क भावी "सकारात्मक विकास" के रूप में शाह ने दिया है। इसलिए कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर फुटलूज इंडस्ट्री लगाने वाले किसी व्यक्ति का विचार महज़ बेतुका है। और लगभग ऐसा ही छोटे स्तर के उद्योग के लिए है।

इसलिए स्थानीय वस्तुओं का इस्तेमाल करने वाले उद्योग ही केवल घाटी में पनप सकती हैं चाहे वह ऊन हो, या फल, या लकड़ी, या मांस। इस तरह के उद्योग घाटी में पहले से ही काफी अच्छी तरह से स्थापित हैं बस उन्हें प्रभावशाली प्रोत्साहन की आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए राज्य में सहानुभूति रखने वाले सरकार की आवश्यकता है न कि विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करके और न ही भूमि ख़रीद पर लगी बाहरी लोगों के प्रतिबंधों को हटा करके।

निश्चित रूप से यह सोचा जा सकता है कि देश के बाकी हिस्सों के लिए अधिक खुलापन बहुराष्ट्रीय कंपनियां या भारतीय बड़े व्यापार इन उद्योगों को विकसित करने में मदद करेंगे और इस तरह घाटी की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगा। लेकिन बड़ी पूंजी चाहे भारतीय हो या विदेशी उन्हीं गतिविधियों में लगे हुए हैं जिनमें स्थानीय छोटे उत्पादक लगे हुए हैं वह रोज़गार में इज़ाफ़ा नहीं करते हैं। जो कुछ भी हो इससे स्थानीय उत्पादकों को विस्थापित करने के माध्यम से रोज़गार में कमी आ सकती है। और समय के साथ इस तरह की गतिविधियों में वृद्धि की जहां तक बात है अगर ऐसी किसी भी वृद्धि की गुंजाइश है तो यह स्थानीय उत्पादकों द्वारा खुद उनका शोषण किया जा सकता है जो राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा सहायता प्राप्त है।

लेकिन शाह के अनुसार असल इच्छा कश्मीर घाटी में ज़मीन ख़रीदने के लिए बाहरी लोगों के प्रवेश से है। यह अविश्वसनीय है कि हिमाचल प्रदेश और अन्य सीमांत पहाड़ी राज्यों में बाहरी लोगों को भूमि की ख़रीद पर प्रतिबंध है ऐसे में केवल कश्मीर को "विकास" के नाम पर उसे हटाने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन क्या कश्मीर घाटी में ज़मीन के क़ीमत में वृद्धि से विकास होगा?

जब कोई व्यक्ति ज़मीन ख़रीदता है तो वह कुछ अन्य संपत्तियों को लेने के बजाय ज़मीन ख़रीदता है; और ज़मीन बेचने वाले के लिए यह उलटा है। सवाल यह है कि कौन सी अन्य संपत्ति? यदि ज़मीन के ख़रीदार उत्पादक संपत्तियों को ख़रीदने के बजाय कश्मीर घाटी में ज़मीन ख़़रीदते हैं तो निश्चित रूप से यह शेष भारत में पूर्ववर्ती स्थिति में वापसी का कारण है। लेकिन हमें यह मान लेना चाहिए कि ये मामला नहीं है और अमित शाह के अनुकूल ही व्यवस्था को लें: ख़रीदार नक़दी रखने के बजाय भूमि खरीदते हैं जो कि पहली नज़र में भारत के बाकी हिस्सों में निवेश में कमी होने का कोई कारण नहीं होता है।

अब सवाल यह है कि ज़मीन बेचने वालों को जो पैसा मिलेगा उससे वे क्या करते हैं? सिर्फ चर्चा के लिए, स्थानीय उत्पादों के उत्पादन के विस्तार को छोड़कर घाटी में निवेश करने की संभावना तो नहीं है। लेकिन यह मानने का कोई कारण नहीं है कि स्थानीय वस्तुओं के उत्पादन में निवेश वित्त की कमी के कारण बाधित हुआ है। उत्पादन के पर्याप्त विस्तार की गुंजाइश हो सकती है लेकिन इसके लिए राज्य सरकार के प्रभावशाली मध्यस्थता की आवश्यकता होगी; तो बस ज़मीन की बिक्री के माध्यम से नकद हासिल करके उत्पादन बढ़ाने में किसी निवेश को बढ़ावा नहीं मिलेगा। इसलिए सबसे अधिक संभावना है कि ये नक़दी बैंकों में ही जमा की जाएगी।

जब इस तरह की नक़दी बैंकों में जमा हो जाएगी तो लगभग यह निश्चित रूप से स्थानीय तौर पर ऋण नहीं दी जाएगी। या तो इसे देश के बाकी हिस्सों में ऋण देने के लिए कश्मीर से बाहर कर दिया जाएगा या फिर बैंक स्थानीय मामले में अधिक निष्क्रिय रहेगा। इस प्रकार यह एकमात्र परिवर्तन जिसके होने की संभावना है, नकद के लिए बाहरी के हाथों घाटी में ज़मीन का नुकसान होगा। ये नक़दी घाटी से बाहर भी चला जाएगा। इस भूमि पर अब तक घाटी के लोगों का स्वामित्व है। "विकास" या रोज़गार में वृद्धि इसके कारण होने वाले नहीं है।

हालांकि दूसरी तरफ इस हद तक कि दूसरे के हाथों हाथों में जाने वाली इस भूमि का इस्तेमाल पहले किसी और गतिविधि के लिए किया जा रहा था। यह गतिविधि दूसरे के हाथों में जाने के कारण बंद हो जाएगी, जबकि कोई दूसरी गतिविधि इसे विस्थापित नहीं करेगी। यह घाटी में गतिविधि के सिमटने के चलते रोज़गार में कमी का कारण होगा।

इस प्रकार जिस तरह से भी हम इसे देखें, विशेष दर्जा और बाहरी लोगों द्वारा ज़मीन ख़रीदने की बाधा को हटाने से रोज़गार में रत्ती बराबर भी वृद्धि नहीं होगी; इसके विपरीत सबसे अधिक संभावना है कि घाटी में यह रोज़गार में यह कमी का कारण बनेगा भले ही दिल्ली या मुंबई से अमीर लोगों के हाथों में ज़मीन चली जाए।

वास्तव में यदि यह इतना स्पष्ट था कि विशेष दर्जा हटाने से राज्य का विकास बेहतर होगा तो केंद्र सरकार विशेष दर्जा समाप्त करते हुए दो पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित राज्य के नेताओं को क़ैद करना जरूरी नहीं समझा होता। और विशेष दर्जा को समाप्त करने के बाद निस्संदेह राज्य में हिंसा के स्तर में वृद्धि होगी, यहां तक कि पर्यटक उद्योग जो राज्य का मूल उद्योग है वह हमेशा के लिए पंगु हो जाएगा जिससे कश्मीरी युवाओं की रोज़गार की संभावनाएं भी धूमिल हो जाएंगी।

संक्षेप में "विकास" का नारा ध्यान भटकाने वाला है। फिर केंद्र सरकार ने ऐसा क्यों किया है? सामान्य जवाब यह है कि यह हिंदुत्ववादी तत्वों की लंबे समय से चली आ रही मांग है। इसको ध्यान में रखते हुए देश में एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना को बदलने में कोई संदेह नहीं है।

हालांकि ऐसा हो पाए, हमें इसके अन्य संभावित उद्देश्य से नज़र नहीं हटाना चाहिए। वास्तव में यह सरकार हिंदुत्व-कॉरपोरेट गठजोड़ का उत्पाद होने के नाते हिंदुत्व को बढ़ावा देने के अलावा जो भी कुछ यह करती है उसमें कॉर्पोरेट एजेंडा शामिल रहता है। कश्मीर घाटी को अपने कॉरपोरेट संरक्षकों के लिए खोलना, उत्पादक आर्थिक गतिविधियों की मात्रा बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि रियल एस्टेट के विकास के लिए भूमि अधिग्रहण या भूमि की क़ीमत पर भारी अटकलों भी एक अतिरिक्त प्रलोभन है। इस तरह का रियल एस्टेट विकास रोज़गार के स्तर में बहुत कम वृद्धि करता है; बल्कि यह रोज़गार को कम करता है यदि पहले कुछ उत्पादक गतिविधियों के लिए भूमि का उपयोग किया जा रहा था।

इस प्रकार हानिकारक पारिस्थितिक परिणामों के अलावा जो स्पष्ट है और इसके किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है, घाटी को भूमि सट्टेबाजों और रियल एस्टेट डेवलपर्स के एक समूह के लिए खोल रहा जो कश्मीर के चेहरे को हमेशा के लिए ख़राब कर देगा, ख़ासकर इसकी सुंदरता को। उत्पादक गतिविधियों के एक समूह से जुड़ी अर्थव्यवस्था को सट्टेबाजों और भूमाफियाओं के लिए एक शिकार के मैदान में बदल दिया जाएगा, साथ ही अपराध में वृद्धि होगी जो भूमि के खरीद फरोख्त के कारण होता है। अपराध में ये वृद्धि उग्रवाद की तरह बढ़ेगी। वास्तव में इन दोनों में वृद्धि एक-दूसरे को पोषित करेंगे, जैसे कि दूसरे संदर्भ में ड्रग्स और आतंकवाद एक दूसरे को पोषित करते हैं।

वास्तव में यह राज्य के लिए बदक़िस्मती है जिसने देश में सामंती-विरोधी भूमि सुधारों को लागू करने को मजबूर किया। लेकिन निस्संदेह अमित शाह इसे भावी "विकास" कहेंगे

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