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कश्मीर: सेब के उत्पादक अपनी फसल की 'क़ुर्बानी' देने को तैयार!
पिछले साल अगस्त के महीने में देश भर के 90 विभिन्न बाज़ारों के लिए 100 से ज़्यादा ट्रक रोज़ाना यहां की मंडी से सेब की खेप लेकर गए लेकिन इस साल अगस्त महीने में केवल नौ बाज़ारों के लिए सिर्फ़ 45 ट्रक ही गए हैं।
अनीस ज़रगर
14 Sep 2019
कश्मीर: सेब के उत्पादक अपनी फसल की 'क़ुर्बानी' देने को तैयार!

सेब-उद्योग पर निर्भर तीन मिलियन से ज़्यादा लोग ऐसे समय में सरकार और आतंकवादी समूहों के बीच रस्साकशी में फंसे हुए हैं जब जम्मू-कश्मीर में सेब के फसल का अहम वक़्त शुरु हो चुका है।

इस क्षेत्र में सबसे ज़्यादा सेब का उत्पादन करने वाले उत्तरी कश्मीर के सोपोर शहर में उत्पादनकर्ता और व्यापारी मुश्किलों में हैं। सोपोर श्रीनगर से लगभग 50 किमी की दूरी पर है और इस उपमहाद्वीप में दूसरी सबसे बड़ी फल मंडी है। ये मंडी घाटी में जारी संकट के चलते चुनौतियों का सामना कर रही है।

1,200 से अधिक व्यापारी सोपोर फल मंडी से काम करते हैं और इस इलाक़े में उथल-पुथल के बावजूद हमेशा काम करते रहे हैं। सेब के व्यापारी मोहम्मद लतीफ़ कहते हैं, “चाहे 1990 के दशक में सशस्त्र विद्रोह हुआ हो या 2008, 2010 या 2016 में बड़े पैमाने पर विद्रोह, व्यवसाय कभी बंद नहीं हुआ। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है।"

व्यापारियों के अनुसार धारा 370 के निरस्त होने के कारण 5 अगस्त से लागू मौजूदा प्रतिबंध ने काम ख़राब कर दिया है। संपर्क का साधन न होने के कारण व्यापारियों की परेशानी बढ़ गई है।

एक अन्य व्यापारी कहते हैं, "हम ख़रीदारों और विक्रेताओं से संपर्क नहीं कर सकते हैं क्योंकि स्थिति ख़राब हो गई है। हमारे पास अन्य बाज़ारों के कीमतों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।"

कश्मीर डिवीज़न में सोपोर, श्रीनगर और शोपियां तीन मुख्य फल बाज़ार हैं।

सरकारी प्रतिबंध और नागरिकों की तरफ़ से बंद के दरमियान

कुछ समय के लिए सोपोर के फल बाज़ार में रात में काम हुआ। लेकिन अब ये ज़्यादातर बंद रहता है। इस इलाक़े में तनाव बढ़ने के बाद बाज़ार में काम रोक दिया गया। सरकार द्वारा लागू किए गए प्रतिबंध के अलावा अन्य कारणों में आतंकवादी समूहों की तरफ़ से किया गया बंद और सख़्ती भी शामिल हैं।

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6 सितंबर को डंगरपोरा में फल व्यापारी अब्दुल हमीद राथर के घर में अज्ञात बंदूकधारी जबरन घुस गए और राथर के परिवार वालों पर गोलियां चलाई जिससे चार लोग घायल हो गए। घटना के वक्त हमीद घर पर नहीं थे। पुलिस के अनुसार हमले का उद्देश्य व्यापारियों में भय पैदा करना था।

शोपियां के मुख्य बाजार, ट्रेंज़ और तुर्कवांगम और आस-पास के गांवों के कई उत्पादकों का कहना था कि हिज़बुल मुजाहिदीन के ज़िला कमांडर नावेद बाबू ने लोगों से इस साल सेब के उत्पादन से बचने को कहा है। एक अफ़वाह है जिसमें दावा किया गया है कि आतंकवादी जो सेब उत्पादकों के परिवार से संबंधित है उसने इस वर्ष की फसल को बर्बाद करने का आह्वान किया है।

तुर्कवांगम के एक सेब उत्पादक ने न्यूज़क्लिक को बताया, ''जब तक कोई विकल्प नहीं होगा हम उसका पालन करेंगे।"

दक्षिण कश्मीर में स्थानीय लोगों का कहना है कि आतंकवादी समूह पोस्टरों के माध्यम से और कभी-कभी ख़ुद बाग़ों में जाकर जानकारी देते हैं।

अर्थव्यवस्था की टूटी कमर

जम्मू-कश्मीर के बाग़वानी विभाग के अंतर्गत काम करने वाले सोपोर के बाज़ार में मौजूद एरिया मार्केटिंग ऑफ़िस के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल अगस्त में देश भर के 90 अलग-अलग बाज़ारों में सेब लेकर 100 से ज़्यादा ट्रक इस मंडी से रोज़ाना गए थे। इस साल के आंकड़ों से पता चलता है कि अगस्त में नौ बाज़ारों के लिए सिर्फ़ 45 ट्रक ही गए।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इलाक़े की अर्थव्यवस्था की 'रीढ़' के रूप में कहे जाने वाले सेब उद्योग जम्मू-कश्मीर के कुल सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 8% का योगदान देता है। 8,000 करोड़ रुपये वाला ये उद्योग सबसे बड़े रोज़गार सृजन करने वाले क्षेत्रों में से एक माना जाता है जिससे सात लाख से अधिक परिवारों प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर ने वर्ष 2018 में 24.3 लाख टन फलों का उत्पादन किया है जिसमें से 21.61 लाख टन अकेले कश्मीर डिवीज़न से आता है।

श्रीनगर में मुख्य बाग़वानी अधिकारी जाविद अहमद के अनुसार अब तक इस समय इस सीज़न के केवल 30% फलों को तोड़ा जा रहा है। जाविद कहते हैं, "शेष 70% जिसमें डिलिसियस नाम के प्रमुख ब्रांड के सेब शामिल है उसे अभी तक तोड़ा नहीं गया है।"

उत्तरी कश्मीर में ज़िला बारामूला जिसमें सोपोर से उत्पादन शामिल है वह कुपवाड़ा, अनंतनाग और शोपियां के बाद कुल सेब उत्पादन का 40% हिस्सा है।

लेकिन अब सबकुछ रुक सा गया है।

सरकारी हस्तक्षेप

जारी संकट के कारण, जम्मू-कश्मीर के गवर्नर सत्य पाल मलिक ने गुरुवार को क्षेत्र में सेब उत्पादकों को सुरक्षा कवच प्रदान करने के उपाय के रूप में सेब के लिए "मार्केट इंटरवेंशन स्कीम" शुरू किया है। इस योजना के तहत सरकार ने कहा कि पैकेजिंग प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद यह सेब उत्पादकों को सुरक्षा कवच प्रदान करेगी।

सरकार ने नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनएएफ़ईडी) को इसमें शामिल किया है जो सेब की छंटनी, ख़रीद व भंडारण तथा फलों के विपणन से संबंधित मामलों पर ध्यान देगा।

हालांकि, कई उत्पादकों का मानना है कि एनएएफ़ईडी जैसे मध्यस्थ को शामिल करना उनके लिए नया नहीं है।

श्रीनगर के एक उत्पादक ने कहा, "उनके पास ग्रेडिंग और मार्केटिंग के अपने पैरामीटर हैं जो ज़रूरी नहीं कि कश्मीर में स्थानीय उत्पादकों को फ़ायदा पहुंचाएँ।"

उन्होंने कहा: "बाहरी मध्यस्थ को शामिल करने वाली सरकार द्वारा इस तरह का हस्तक्षेप स्थानीय प्रणाली को बदलने का एक अन्य कार्य है।"

फसल की क़ुर्बानी

उत्पादकों में चिंता का विषय सिर्फ ग्रेडिंग या मार्केटिंग नहीं है बल्कि विरोध और प्रतिबंध बड़ा मुद्दा है।

दक्षिण कश्मीर के शोपियां में जहां सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला कश्मीरी सेब उगाया जाती है यहां की फल मंडी भी वीरान है। कोई उत्पादक, ख़रीदार, व्यापारी, विक्रेता या किसी प्रकार की गतिविधि दिखाई नहीं देती है।

बाग़ों के अंदर आने का कोई साहस नहीं करता है। उत्पादकों ने इस साल फसल नहीं तोड़ने का फ़ैसला किया है।

ओवैस कहते हैं, "सेब पेड़ों पर ही रहेगा।" शोपियां शहर के निवासी ओवैस का कहना है कि सभी का मानना है कि सेब की फसल का मौसम विरोध प्रदर्शन के चलते समाप्त हो सकता है।

वह कहते हैं, “यह पहले हुआ है कि घाटी महीनों तक बंद रही और फिर सेब की फसल के चलते शटडाउन धीरे-धीरे ख़त्म हो गया।“

सेब की फसल का मौसम उत्पादकों के लिए एक महत्वपूर्ण समय है जो साल भर की कड़ी मेहनत और 3-5 लाख रुपये के औसत ख़र्च के बाद आता है।

शोपियां के एक सूमो ड्राइवर आदिल अहमद के अपने परिवार के लिए वित्तीय सुरक्षा का एकमात्र साधन बाग़ है। उनके बाग़ों में 3,000 से अधिक फलों के कार्टन होते हैं, एक कार्टन में आमतौर पर लगभग 19 किलो वज़न होता है जो दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में लगभग 1,200 रुपये में बेचा जा रहा है।

लेकिन वह अपने बाग़ों में जाने से डरते हैं।

आदिल कहते हैं, “हमने एक सप्ताह पहले रात में एक ट्रक लोड करने की कोशिश की लेकिन कुछ समय बाद हमने ट्रक पर लाल रंग में एक क्रॉस का निशान देखा हम वहीं पर रुक गए।”

आदिल कहते हैं, "उत्पादकों ने इस साल फसल के बारे में सामूहिक निर्णय लिया है। एक उत्पादक के साथ जो होता है वही सभी उत्पादकों के साथ होगा।"

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