NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
कश्मीर: व्यापारियों का दावा ड्यूटी-फ्री ‘ईरानी सेब’ से हो रहा भारी नुकसान, सरकार से हस्तक्षेप की अपील
एक अधिकारी ने कहा ‘यह साबित कर पाना बेहद मुश्किल है कि सेब अफगानिस्तान से नहीं आ रहा है, जिस देश के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता है।’ हालांकि, व्यापारी इस बात पर अड़े हुए हैं कि पड़ोसी देश में जितना उत्पादन हो रहा था, वह उससे कहीं अधिक का निर्यात कर रहा है।
सुहैल भट्ट
26 Apr 2021
कश्मीर: व्यापारियों का दावा ड्यूटी-फ्री ‘ईरानी सेब’ से हो रहा भारी नुकसान, सरकार से हस्तक्षेप की अपील
चित्र साभार: जेके न्यूज़लाइन 

श्रीनगर: दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौता (एसएएफटीए) के तहत अफगानिस्तान के जरिये ईरानी सेबों पर शून्य प्रतिशत आयात शुल्क पर कथित तस्करी की वजह से कश्मीर के बाजार पर असर पड़ रहा है और सेब व्यापारियों को जबरन भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सस्ते ईरानी सेब की भारी मात्रा में आवक (स्थानीय तौर पर इसे ईरानी किस्म कहा जा रहा है, लेकिन इसे साबित करने के लिए कोई सुबूत नहीं है) ने कश्मीर में बागवानी क्षेत्र को बुरी तरह से प्रभावित कर डाला है। यह एक ऐसे समय में हो रहा है जब प्राकृतिक आपदाओं और एक के बाद एक दो लॉकडाउन के कारण फल उत्पादकों को भारी नुकसान झेलने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

सेब उद्योग को पूर्व में पूर्ववर्ती राज्य जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे की समाप्ति के बाद से भारी नुकसान हुआ है, जिसके बाद इसे भारी बर्फ़बारी और कोविड-19 लॉकडाउन का सामना करना पड़ा। पिछले वर्ष स्कैब संक्रमण की वजह से भी सेब उत्पादकों को उत्पादन में लगभग 50% का भारी नुकसान हुआ है।

जम्मू-कश्मीर की जीडीपी में बागवानी का योगदान आठ प्रतिशत से अधिक का है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बागवानी उद्योग पर सात लाख परिवार प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर हैं।

घाटी में 3.38 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि में फलों की खेती होती है, जिसमें से 1.62 लाख हेक्टेयर जमीन में सेब की खेती की जाती है। जम्मू-कश्मीर में 2017-18 में जहाँ 23.30 लाख टन फल का उत्पादन किया गया था, उसकी तुलना में वर्ष 2018-19 में 24.15 लाख टन फलों का उत्पादन किया गया था। देश में होने वाले कुल सेब उत्पादन में से लगभग 77% कश्मीर का है।

हिल स्टेट्स हॉर्टिकल्चर फोरम नामक संस्था, जिसे इस प्रकार के मुद्दों से निपटने के उद्देश्य से गठित किया गया था, ने विदेशी सेबों की आवक को छोटे और सीमांत फल उत्पादकों के लिए “विनाशकारी” बताया है।

इस मंच के अध्यक्ष, हरीश चौहान ने न्यूज़क्लिक को बताया कि “मंडियों में ईरानी सेब की बिक्री के कारण इस साल घरेलू किसानों की कीमतों में 30% से लेकर 40% की गिरावट आई है। हमारा आकलन है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो किसानों के पास कोई बाजार नहीं बचने वाला है और उसके पास अपने जीवन निर्वाह का कोई सहारा नहीं रह जाने वाला है।” 

चौहान का कहना था कि इस गंभीर मसले के निवारण के लिए निकाय ने सरकार से भी संपर्क साधा था और कहा कि अगर सरकार इस पर रोक लगाने में विफल रही तो वे देश-व्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू कर देंगे। उनका कहना था “हमें उम्मीद है कि सरकार हमारी मांगों पर गौर करेगी। सेब पर आयात शुल्क को कायदे से 100% लगाया जाना चाहिए और घरेलू उत्पादकों एवं सहयोगियों के अधिकारों के संरक्षण हेतु आयात की मात्रा को तय किये जाने की जरूरत है। अन्यथा इस आयात शुल्क के अवमूल्यन की वजह से सरकार को राजस्व में नुकसान झेलना पड़ सकता है।”

उन्होंने इस ओर भी इशारा किया कि सेब का ‘आयात’ अन्य राज्यों को भी प्रभावित कर रहा होगा। उनके अनुसार “हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड भी इसकी वजह से प्रभावित होंगे”, और यदि आयात पर रोक नहीं लगाई गई तो इस सीजन के दौरान उत्पादकों को और भी अधिक कठिन दौर से गुजरना पड़ सकता है।

सेब की खपत के चलते कश्मीरी सेबों को जिन दरों पर भारतीय बाजारों में बेचा जा रहा है वह किसी जोरदार झटके से कम नहीं है। इसका इतना असरदार था कि उत्पादकों ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को इस बाबत पत्र लिखा है। इस वर्ष 28 जनवरी को संघ द्वारा सीतारमण को भेजे पत्र में कहा है कि “दिल्ली की आजादपुर मंडी में कई व्यापारी भारत और अफगानिस्तान के बीच में शून्य आयात शुल्क समझौते का फायदा उठाते हुए ‘अफगानिस्तान के मार्फत ईरानी’ आयातित सेबों की बिक्री कर रहे हैं। यह हमारे व्यवसायों को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। कर भुगतान से बचने के लिए इस प्रकार की कपटपूर्ण गतिविधि के परिणामस्वरूप उत्तर भारत में सेब और फल उद्योग और विशेषकर जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्र शासित प्रदेश पर इसका सीधा नकरात्मक असर पड़ रहा है। व्यापार में पारदर्शिता बनाये रखने के लिए उक्त कपटपूर्ण व्यापार पर समय रहते रोक लगाए जाने की जरूरत है।”

बेहतर दाम की उम्मीद में उत्पादकों ने कश्मीर में इस वर्ष 1.5 लाख मीट्रिक टन से अधिक सेब का शीत गृहों भण्डारण कर रखा है, लेकिन इस तथाकथित सेब की आवक ने भारत में उनके बाजार को प्रभावित कर रखा है। 

कश्मीर घाटी फल उत्पादक एवं वितरक संघ के प्रमुख और न्यू कश्मीर फ्रूट एसोसिएशन के अध्यक्ष ने न्यूज़क्लिक के साथ हुई अपनी बातचीत में कहा “सेब उद्योग को पिछले दो सालों से काफी कठिन दौर के बीच से गुजरना पड़ा है, जिसमें उत्पादकों को भारी नुकसान हुआ है। पिछले वर्ष व्यापक रूप से पपड़ी (स्कैब) संक्रमण की वजह से उत्पादक अपने संकट को कम नहीं कर पाए। लेकिन ईरानी सेब तो उससे भी बड़ा खतरा हैं क्योंकि वे हमारे बाजार को ही खा रहे हैं।”

जेएंडके फल उत्पादक संघ, सोपोर के अध्यक्ष फ़याज़ अहमद ने न्यूज़क्लिक को बताया कि यह कश्मीर में फल उद्योग को नुकसान पहुंचा रहा है। उनका कहना था “कश्मीरी सेब ईरानी सेब की तुलना में बेहतर है, लेकिन इसे सस्ते दामों में बेचा जा रहा है। हम चाहते हैं कि केंद्र सरकार इस बारे में तत्काल हस्तक्षेप करे।”

शोपियां के एक व्यापारी और सेब उत्पादक ने न्यूज़क्लिक  को बताया कि यह मुद्दा बहु-प्रचारित ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विचार के भी खिलाफ है। इस बारे में एक उत्पादक का कहना था कि “यह सरकार की दुरंगी मानसिकता को दर्शाता है। एक तरफ तो वह स्थानीय स्तर पर उत्पादित वस्तुओं को बढ़ावा दिए जाने की वकालत करते हैं, लेकिन वहीँ दूसरी तरफ वे इस अवैध प्रथा को जारी रखने में सहयोग करते हैं।”

बागवानी विभाग के निदेशक, एजाज़ अहमद ने न्यूज़क्लिक  को बताया कि उत्पादकों के इस दावे को साबित कर पाना कठिन है। उनका कहना था “इस बात को साबित कर पाना निहायत ही कठिन है कि यह सेब अफगानिस्तान का नहीं है, एक ऐसा देश जिसके साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता है।”

उत्पादकों ने हालाँकि सेब पर जैविक परीक्षण किये जाने की मांग की है, ताकि उनकी मूल उत्पत्ति का पता लगाया जा सके। शोपियां के फ्रूट मास्टर एग्रो प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ, इज्हान जावेद ने न्यूज़क्लिक  को बताया कि “विभिन्न जैविक एवं भौगोलिक विविधताओं का असर फलों पर भी पड़ता है और जैविक परीक्षण के जरिये इसका पता लगाया जा सकता है।”

उनका तर्क था कि सरकार को इस बारे में पता लगाने की जरूरत है कि अफगानिस्तान कैसे अपनी उत्पादन क्षमता से अधिक फल का निर्यात कर पाने में सफल है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Kashmir: Traders Claim Duty-Free 'Iranian Apples' Causing Heavy Losses, Urge Govt. to Intervene

Iranian Apples
Kashmir
Kashmiri Apples
Fruit Industry
Horticulture J&K
Kashmir Fruit Industry
Afghanistan

Related Stories

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

कश्मीर: कम मांग और युवा पीढ़ी में कम रूचि के चलते लकड़ी पर नक्काशी के काम में गिरावट

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती

जम्मू-कश्मीर: अधिकारियों ने जामिया मस्जिद में महत्वपूर्ण रमज़ान की नमाज़ को रोक दिया

कश्मीर में एक आर्मी-संचालित स्कूल की ओर से कर्मचारियों को हिजाब न पहनने के निर्देश

रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं

4 साल से जेल में बंद पत्रकार आसिफ़ सुल्तान पर ज़मानत के बाद लगाया गया पीएसए


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License