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कट्टरवादी राजनीति के दौर में प्रेम
गाँधी और अंबेडकर जैसे नेताओं ने विभिन्न जातियों के बीच विवाह को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दिया था। लेकिन हिन्दू संप्रदायवादियों ने ऐसी अनेक संस्थाएँ बनाई हैं जो अंतर्धार्मिक विवाहों और प्रेम संबंधों को हतोत्साहित कर तोड़ना चाहती हैं।
राम पुनियानी
07 Nov 2017
Translated by अमरीश हरदेनिया
Hadiya
Image Courtesy: Indian Express

केरल में इन दिनों समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की कोशिशें हो रही हैं और इसके लिए पहचान से जुड़े अनेक मुद्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें से एक है लव जिहाद। अगर कोई हिन्दू लड़की, किसी मुस्लिम या ईसाई पुरूष से विवाह कर लेती है तो कानूनी और अन्य तरीकों से भरसक यह प्रयास किया जाता है कि उसे या तो उसके माँ-बाप के पास भेज दिया जाए या ‘धर्मांतरण विरोधी क्लिनिकों’ में। हादिया के मामले में भी लव-जिहाद का हौआ खड़ा किया गया और कहानी को मसालेदार बनाने के लिए सीरिया में जिहाद की बात भी उसमें जोड़ दी गई। यह मामला तो बहुचर्चित है परंतु ऐसे अनेक अन्य मामले हैं जो मीडिया में उतनी प्रमुखता से स्थान प्राप्त नहीं कर सके हैं। श्वेता नाम की एक हिन्दू महिला को एक योग केन्द्र में बंधक बना लिया गया है और उस पर यह दबाव डाला जा रहा है कि वह एक ईसाई पुरूष से अपने विवाह को भुला दे। श्वेता के अनुसार, योग केन्द्र, दरअसल ‘धर्मांतरण-विरोधी क्लिनिक’ है, जो उन महिलाओं का ‘‘इलाज’’ करता है जिन्होंने गैर-हिन्दू पुरूषों से विवाह कर लिया है और ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लिया है। मीडिया में अकीला नामक एक लड़की की तथाकथित अपरिपक्वता की चर्चा भी हो रही है। उसने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के एक मुस्लिम कार्यकर्ता से विवाह कर इस्लाम कुबूल कर लिया है।

इस विवाह को पीएफआई से जोड़ा जा रहा है और साथ में सीरिया में आतंकी कार्यवाहियों में भाग लेने की बात कही जा रही है। इस बहाने से एनआईए ने इस मामले की जाँच शुरू कर दी है। ऐसा बताया जा रहा है कि अकीला का धर्मपरिवर्तन एक ऐसी खतरनाक योजना का भाग है, जिसके अंतर्गत हिन्दू लड़कियों को मुसलमान बनाकर उन्हें आतंकी गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। ज़ाहिर है कि जो लोग सत्ता और प्रशासन में काबिज़ हैं, उनकी कल्पना शक्ति अत्यंत उर्वर है। हादिया के मामले में अदालत ने यह तक कह दिया कि 24 साल की महिला, भोलीभाली और नासमझ होती है। संबंधित जज को शायद यह याद नहीं था कि भारत में 18 वर्ष की आयु से बड़ा कोई भी व्यक्ति वोट दे सकता है और अपने निर्णयों और कार्यों के लिए स्वयं ज़िम्मेदार होता है। हादिया ने अदालत में यह कहा कि उसने धर्मपरिवर्तन कर एक मुस्लिम युवक से अपनी मर्ज़ी से शादी की है। बाद में अदालत ने उसे अपना बयान दर्ज करवाने के लिए बुलाया ही नहीं। अदालत ने यह कहा कि वह उसकी व्यक्तिगत सुनवाई एक माह बाद करेगी। यह घटनाक्रम अत्यंत चकित कर देने वाला है। एक वयस्क महिला, जो होमियोपैथी की पढ़ाई कर रही है, क्या अपने जीवन के संबंध में निर्णय नहीं ले सकती? परंतु उसे अपने पति से दूर, अपने माँ-बाप के साथ मजबूरी में रहना पड़ रहा है। यह नैतिक और सामाजिक दृष्टि से पूरी तरह गलत है और यही अदालतों की कानून की विवेचना का आधार होना चाहिए था।

श्वेता के मामले में बताया जाता है कि एरनाकुलम का वह योग केन्द्र, जहाँ उसे रखा गया है, एक ऐसा स्थान है जहाँ धमकी देकर और भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर लड़कियों को अपने नए धर्म का परित्याग करने के लिए मजबूर किया जाता है। उनसे यह कहा जाता है कि या तो वे स्वयं अपने नए धर्म को छोड़ दें या अपने पति को हिन्दू बना लें। एक अन्य हिन्दू महिला श्रुति मेलदत्त का भी यही अनुभव था। उससे यह कहा गया कि वह अनीस एहमद नामक मुस्लिम व्यक्ति, जिससे वह विवाह करना चाहती थी, को छोड़ दे। एरनाकुलम के योग विद्याकेन्द्रम जैसे कई केन्द्र केरल में काम कर रहे हैं।

लव जिहाद का नारा, प्रेम करने वाली युवतियों के रास्ते में इतनी बड़ी बाधा बन जाएगा, इसकी एक दशक पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अत्यंत कुटिलतापूर्वक तैयार किया गया यह अभियान, पितृसत्तात्मक सोच पर आधारित है और पितृसत्तात्मक सोच, सांप्रदायिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सांप्रदायिक सोच महिलाओं को ‘हमारी’ और ‘उनकी’ में विभाजित करती है। महिला को पुरूष की सम्पत्ति माना जाता है और समुदाय के सम्मान का प्रतीक भी। ‘हमारी महिलाएँ खतरे में हैं’ के नारे का इस्तेमाल, सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए किया जाना आम है। मुज़फ्फरनगर की हिंसा इसका एक उदाहरण है। दूसरी ओर, अन्य समुदायों की महिलाओं से ज़्यादती करना गर्व की बात समझी जाती है। लव-जिहाद का मुद्दा सबसे पहले कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में उभरा, जहाँ ऐसे अंतर्धार्मिक विवाहों को निशाना बनाया गया, जिनमें पुरूष या तो मुसलमान था या ईसाई। किसी भी खुले समाज में सभी धर्मों के व्यक्ति एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं। ऐसे में उनके बीच प्रेम हो जाना अस्वाभाविक नहीं है। अंतर्धार्मिक विवाहों से समाज में सौहार्द और प्रेम बढ़ता है।

स्वाधीनता संग्राम के दौरान, गाँधी और अंबेडकर जैसे नेताओं ने विभिन्न जातियों के बीच विवाह को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दिया था। उनका कहना था कि इससे जाति प्रथा के उन्मूलन में मदद मिलेगी। उसी तरह, अंतर्धार्मिक विवाहों से सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता की नींव मजबूत होगी। किसी भी प्रजातांत्रिक समाज को इस तरह के विवाहों को प्रोत्साहन देना चाहिए। परंतु हमारे देश में इसका ठीक उलट हो रहा है। सांप्रदायिक सोच समाज पर हावी है और पितृसत्तात्मकता के चलते, पुरूष, महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करना चाहते हैं। हमारे देश में हिन्दू संप्रदायवादियों ने ऐसी अनेक संस्थाएँ बनाई हैं जो अंतर्धार्मिक विवाहों और प्रेम संबंधों को हतोत्साहित कर तोड़ना चाहती हैं।

कुख्यात बाबू बजरंगी का तो मुख्य काम ही ऐसे युगलों को निशाना बनाना था। पश्चिम बंगाल में प्रियंका तोड़ी और रिज़वान कौसर का प्रकरण इस दुखद तथ्य की ओर इंगित करता है कि इस रोग ने हमारे समाज में गहरे तक जड़ें जमा ली हैं। इसके पीछे पितृसत्तात्मक सोच तो है ही, सांप्रदायिक और कट्टरवादी विचारधाराओं का भी इसमें कम योगदान नहीं है। हिन्दू पुरूषों और महिलाओं के मुस्लिम महिलाओं और पुरूषों से सफल विवाह के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। परंतु हादिया और श्रुति जैसे मामलों में जो कुछ हो रहा है, उससे ऐसा लगता है कि इसका उद्देश्य अन्य व्यक्तियों को इस तरह के संबंध बनाने से खबरदार करना है। यह दुखद है कि योग केन्द्र के नाम पर ऐसी संस्थाएँ चलाई जा रही हैं जो महिलाओं के उनके जीवनसाथी चुनने के अधिकार को सीमित करना चाहती हैं। प्रेम, जाति, वर्ग, धर्म और राष्ट्र की सीमाएँ नहीं पहचानता। हम बिना किसी संदेह के यह कह सकते हैं कि किसी समाज में होने वाले अंतर्धार्मिक विवाह, उस समाज में सांप्रदायिक सौहार्द और प्रेम की स्थिति को बयान करते है और यह भी बताते हैं कि वह समाज लैंगिक समानता का पक्षधर है।

श्रुति और हादिया के प्रकरणों से यह साफ है कि केरल में सांप्रदायिक शक्तियाँ, आरएसएस कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों के अतिरिक्त, लव जिहाद को भी एक बड़ा मुद्दा बनाने के फेर में हैं।

 

 

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