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क्या बंगाल के चिकित्सा व्यवस्था का अवसान हो गया है?
टीएमसी की हालत कोलकाता के मेडिकल कॉलेजों जैसी हो गई है। यह बीजेपी के सामने तेजी से अपना राजनीतिक-चुनावी आधार खो रही है।

चन्दन नंदी
13 Jun 2019
Bengal Doctors

 

कोलकाता के निल रतन सरकार (एनआरएस) मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के जूनियर डॉक्टरों और एमबीबीएस छात्रों के एक समूह ने 16 नवंबर 2014 को एक कथित मोबाइल फोन चोर को अपने छात्रावास के एक खंभे से बांध दिया और उसे पीट-पीटकर मार डाला। यह पूरी तरह से ज्ञात नहीं है कि इस घटना ने बंगाल के डॉक्टरों या राज्य के शिक्षित बुद्धिजीवियों के विवेक को उद्वेलित किया था या नहीं।

 इस साल जनवरी महीने में इसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल की दो महिला नर्सिंग छात्रों को कुत्ते के सोलह बच्चों को मारने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। इस समय सामने आई एक वीडियो क्लिप में इन नर्सिंग छात्रों को लोहे की छड़ से बेबस कुत्ते के बच्चों को मारते हुए देखा गया था। बर्बरता का ये कुकृत्य शायद ही कोलकतावासियों के बीच सामूहिक तरीके से विकसित हुआ हो।

पिछले दिनों एनआरएस में एक युवा एमबीबीएस इंटर्न परिबाहा मुखोपाध्याय को मरीज के सहायकों द्वारा बुरी तरह से पीटने  के बाद इस मेडिकल कॉलेज के छात्रों और डॉक्टरों ने प्रदर्शन किया। इस पर आरोप है कि 75 वर्षीय मरीज मोहम्मद शाहिद (तंगरा के इमाम) की मौत इंटर्न के  लापरवाही के चलते हुई है. स्वास्थ्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य सहित दो मंत्रियों को घेर लिया गया। ओपीडी सेवाएं बंद कर दी गईं। पूरे शहर के डॉक्टरों ने सोशल मीडिया सहित विभिन्न प्लेटफार्मों पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की।

पूरे बंगाल में अभी भी चुनाव के बाद की हिंसा का सिलसिला जारी है। इसके चलते कई मौत के मामले सामने आए हैं और कई लोग घायल हुए हैं। वहीं मुखोपाध्याय पर हुए हमले ने खतरनाक और सांप्रदायिक मोड़ ले लिया है। मृतक मरीज के रिश्तेदारों और दोस्तों ने हिंसा का रास्ता अपना रखा है जिसे ममता बनर्जी सरकार द्वारा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के परिणाम के रूप में बताया जा रहा है।

यह घटना ऐसे समय हुई है जब राज्य में अपना पैर जमा रही बीजेपी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को बाहर का रास्ता दिखाने के प्रयास में है। यह कोलकाता और बंगाल का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करेगी और भड़काऊ बयानों के ज़रिए अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बीजेपी द्वारा संभवतः शोषित किया जाएगा। 'क्या हम आपको यह नहीं बताएं कि ममता बनर्जी सरकार ने मुसलमानों को इस हद तक सह दे दिया है कि उनके पास अब डॉक्टरों पर हमला करने का भी दुस्साहस है?' बंगाल बारुद की ढ़ेर पर बैठा है और इस तरह की भड़काऊ बातें शिक्षित बंगाली को मजबूर करेंगी, जिसकी निष्ठा दक्षिण पंथ की ओर निर्णायक रूप से स्थानांतरित होना शुरू हो गई है।

मुख्यमंत्री जो अब निश्चित रूप से संकट में हैं वह अपने सिर को नीचे करने और बीजेपी के जबर्दस्त जीत के कारण का विश्लेषण करने और टीएमसी को अपने पैरों पर फिर खड़ा करने का खाका खींचने के बजाय वह वही करती आ रही हैं जो वह सबसे अच्छा करती हैंः एक तरह से बिना सोचे समझे बयान दे रही हैं।

"दूध देने वाली गाय लात मार सकती है" का उदाहरण ज़्यादातर बंगाली देते हैं क्योंकि उनकी इच्छा अल्पसंख्यकों को खुश करने की है यहां तक कि उनकी अपना राजनीतिक गढ़ भी खतरे में हैं। आज लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। आयोजकों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी के कारण कोलकाता में प्रस्तावित बीफ फेस्ट को बंद कर दिया गया था। यह अपने आप में इस शहर में अकल्पनीय है जहां भोजन और विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का चलन है।

बीजेपी ने राज्य में 18 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज किया है जो यहां एक आश्चर्यजनक उपलब्धि है जिसे कुछ साल पहले तक "भगवा उत्थान" के सिद्धांत को बनर्जी ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था। कई जिलों के टीएमसी कैडर रोजाना बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। पार्टी के विधायकों में भी बेचैनी है जिसका फायदा बीजेपी उठा रही है और तोड़ने की कोशिश कर रही है। बनर्जी का किला ही अव्यवस्थित बना हुआ है। ऐसा लगता है कि वर्ष 2021 में जब विधानसभा चुनाव होने वाले हैं ऐसे में दो साल ज़्यादादूर नहीं दिखाई देता है। इस बीच अमित शाह ने राजनीतिक तख्तापलट को प्रभावित करने के लिए योजना बनाने का काम शुरू कर दिया है।

लेकिन यह अकेले बनर्जी का ढहता राजनीतिक किला नहीं है जो चिंता का कारण होना चाहिए। बंगाल की स्थिति बद से बदतर हुई है। और ये बर्बादी विभिन्न क्षेत्रों में हुई है जैसे कि अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिति, शिक्षा, और यहां तक कि मानवीय शिष्टता और नैतिक चेतना में भी हुई है। समय के साथ कोलकाता के तथाकथित विवेक रखने वाले इसके बुद्धिजीवियों ने खुद को मूक बना दिया है। ऐसा लगता है कि वे छिप गए हैं। इसका बंगाल की वर्तमान राजनीति से बहुत कुछ लेना-देना है: बुद्धिजीवियों के लिए खतरा पैदा हो गया है और वह ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के साथ उलझना नहीं चाहते हैं जो हिंसा और/या सार्वजनिक बेइज्जती का रास्ता अपना लेते हैं।

शिक्षा की स्थिति या चिकित्सा शिक्षा और सेवाएं जो कभी देश में सबसे बेहतर थी आज अचानक खराब हो गई है। एक समय था जब कोलकाता के पांच शीर्ष मेडिकल कॉलेज- एनआरएस, नेशनल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, कलकत्ता मेडिकल कॉलेज, आर जी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल और सेठ सुखलाल कर्नानी मेमोरियल हॉस्पिटल (या पीजी हॉस्पीटल) ने सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर दिया। आखिरी अस्पताल को छोड़कर बाकी सभी खंडहर स्थिति में हैं। सिर्फ इमारतें ही नहीं बल्कि उनकी सेवाओं की गुणवत्ता भी खराब हो गई हैं। वैसे स्नातकों की बात को छोड़ ही दिया जाए जिसे वे शिक्षा देते हैं। और फिर भी क्योंकि वे सस्ती हैं समाज के हाशिए पर मौजूद वर्गों जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम भी शामिल हैं वे इस दयनीय सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए तैयार हैं जिसे खुद तत्काल पुनर्जीवन की सख्त जरूरत है।

टीएमसी की हालत कोलकाता के मेडिकल कॉलेजों जैसी है। यह तेजी से बीजेपी के सामने अपना राजनीतिक-चुनावी आधार खो रही है जो खुद बंगाल के लिए रामबाण नहीं है। वास्तव में ये इससे काफी बहुत दूर है। बंगाली लोग इसे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं लेकिन जबर्दस्त आकर्षण के चलते वे भगवा को अपनाने को तैयार हैं।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी है।

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