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भारत
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क्या छले जाने के लिए अभिशप्त है किसान?
दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों से यह पूछा जाना चाहिए कि विश्व बैंक एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव में क्या जानबूझकर कृषि क्षेत्र को निरन्तर उपेक्षित नहीं किया जा रहा है?
डॉ. राजू पाण्डेय
14 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Janta Se Rishta

जबसे हिंदी पट्टी के तीन राज्यों-छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सत्ता परिवर्तन हुआ है और इसके लिए किसानों में व्याप्त असंतोष तथा गुस्से को एक प्रमुख कारण माना गया है तब से किसानों की समस्याओं के प्रति राजनीतिक दल न केवल गंभीर हुए हैं बल्कि पहली बार किसानों को निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम मतदाता-समूह के रूप में चिह्नित कर उन्हें लुभाने और उनके आक्रोश को शांत करने की कोशिशें होती दिख रही हैं। किसान आंदोलन में राजनीतिक दलों का प्रवेश एक आवश्यक परिघटना है और इन राजनीतिक दलों का आश्रय लेना किसानों की विवशता है। किसान आंदोलन को नियंत्रित करने की राजनीतिक दलों की लालसा स्वाभाविक है क्योंकि किसान आंदोलन में प्रवेश कर वे न केवल किसानों की सोच को तात्कालिक आर्थिक राहत प्रदान करने वाले मुद्दों तक सीमित रख सकते हैं बल्कि उनके संतोष अथवा असंतोष को अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुसार किसानेतर मुद्दों की ओर मोड़ सकते हैं। प्रमुख राष्ट्रीय दलों के नेताओं के किसानों के समर्थन में दिए जा रहे लच्छेदार भाषणों और बयानों के शोर में वे बुनियादी मुद्दे अनसुने रह जा रहे हैं जिन पर हर उस राजनीतिक दल की स्पष्ट राय जानने की जरूरत है जो आज स्वयं को सबसे बड़े किसान हितैषी दल के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। 

दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों (भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस) से यह पूछा जाना चाहिए कि विश्व बैंक एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव में क्या जानबूझकर कृषि क्षेत्र को निरन्तर उपेक्षित नहीं किया जा रहा है? जब रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं कि सबसे बड़ा सुधार तब होगा जब हम कृषि क्षेत्र से लोगों को निकाल कर शहरों में भेजेंगे क्योंकि इस तरह हम बाजार की सस्ते मजदूरों की आवश्यकता को पूर्ण कर पाएंगे तो क्या वे विश्व बैंक के इस सुझाव के क्रियान्वयन की ओर संकेत कर रहे होते हैं जिसके अनुसार40 करोड़ लोगों को कृषि क्षेत्र से निकाल कर शहरों में भेजा जाना चाहिए ताकि उद्योगों की श्रमिकों की आवश्यकता पूर्ण हो सके। इसी प्रकार जब देश के तत्कालीन प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन कहते हैं कि कृषि का मशीनीकरण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि कृषि उत्पादन में अनावश्यक रूप से बहुत लोगों के जुड़ाव के कारण उत्पादन लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तब वे विश्व बैंक के इसी एजेंडे के क्रियान्वयन की ओर संकेत दे रहे होते हैं भले ही उनका तर्क कृषि को फायदे का सौदा बनाने के लिए मानव श्रम की अनिवार्यता को कम करने का होता है। 

अर्थव्यवस्थाओं के आकलन की वर्तमान विधियों के अनुसार कृषि क्षेत्र की जीडीपी में घटती हिस्सेदारी विकसित अर्थव्यवस्था का द्योतक है। यह कहा जाता है कि ऐसा नहीं है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कृषि क्षेत्र का विकास अवरुद्ध हो जाता है बल्कि उद्योग, निर्माण और सेवा क्षेत्र में तीव्र गति से उन्नति होने के कारण कृषि क्षेत्र की भागीदारी जीडीपी में कम हो जाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी जीडीपी में 50 प्रतिशत थी जो वर्तमान में घटकर 17.32 प्रतिशत रह गई है। जबकि अब औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी29.02 प्रतिशत है। आज जीडीपी में सर्वाधिक 53.66 प्रतिशत योगदान सेवा क्षेत्र का है। आर्थिक विकास के इस मॉडल को कृषि और ग्रामीण विकास विरोधी तथा बेरोजगारी बढ़ाने वाला कहने का साहस हममें से शायद किसी के पास नहीं है।

भारत में उदारीकरण का प्रारंभ तो 1991 में हुआ लेकिन उसके पूर्व भी हरित क्रांति युग में उन्नत तकनीक के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादन में होने वाली असाधारण वृद्धि को किसानों की समृद्धि और खुशहाली के पर्याय के रूप में प्रस्तुत करने की भ्रामक चेष्टा होती रही है जबकि समय ने सिद्ध किया है कि उत्पादन में वृद्धि और किसानों की संपन्नता में व्युत्क्रमानुपाती संबंध बनता जा रहा है। हरित क्रांति के दौर से कृषि में प्रविष्ट होने वाले रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और उन्नत बीज कालांतर में कृषि पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण के साधन बने और किसानों की ऋणग्रस्तता एवं किसान आत्महत्याओं का एक बड़ा कारण भी। यह भी एक कटु सत्य है कि वह किसान ही सर्वाधिक ऋणग्रस्त हैं और आत्महत्या को तत्पर हैं जो उन नकदी फसलों के उत्पादन से जुड़े हुए हैं जिन्हें किसानों की अमीरी का निर्विवाद जरिया बताया जाता था।

वर्तमान में हम जिस आर्थिक मॉडल को अपना चुके हैं वह यूरोप, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में किसानों की बदहाली और बर्बादी के लिए उत्तरदायी रहा है किंतु इस मॉडल को बड़े जोर शोर से खेती की समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। भारत जैसे देश में जहाँ कृषि से लगभग 60 करोड़ लोग सीधे जुड़े हुए हैं यदि वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के कथित व्यापक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कृषि क्षेत्र को बलिदान कर दिया जाता है तो इसके परिणाम इन लोगों के लिए विनाशकारी होंगे। 

दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से यह पूछा जाना चाहिए कि कृषि और कृषकों के विकास का कोई अन्य वैकल्पिक मॉडल उनके पास है अथवा नहीं? क्या सत्ता में आने पर ये दल कृषि क्षेत्र में व्यापक निवेश करने को तैयार हैं? कृषि क्षेत्र से रोजगार प्राप्त करने वाली देश की आधी आबादी जब संपन्न होगी, उसकी क्रय शक्ति बढ़ेगी, उसकी जरूरतों में वृद्धि होगी तो क्या देश के आर्थिक विकास को नई गति नहीं मिलेगी? इन राजनीतिक दलों से यह प्रश्न किया जाना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता क्या है? कृषि क्षेत्र में निवेश और उसके सुधार की चर्चा उस असंतोष को विस्फोटक रूप लेने से रोकने की रणनीति तो नहीं है जो तीव्र नगरीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न होगा। अर्थव्यवस्था के वर्तमान मॉडल में कृषि और ग्रामीण विकास को क्या सौतेली संतानों का दर्जा नहीं दिया गया है जो सरकारों के भेदभाव और अत्याचार से तंग आकर औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के लिए जगह खाली कर रही हैं जिन्हें सगी संतानों का दर्जा प्राप्त है।

इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि समर्थन मूल्य के निर्धारण और फसल की उत्पादन लागत की गणना का उनका फार्मूला क्या है? क्या यह सच नहीं है फसलों के समर्थन मूल्य के निर्धारण में ग्रामीण उत्पादक के बजाय उस शहरी उपभोक्ता के हितों का ज्यादा ध्यान रखा जाता है जो अधिक सजग है और मूल्य वृद्धि से असंतुष्ट होकर सरकार बदलने का माद्दा रखता है? इन दलों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि निर्धारित समर्थन मूल्य पर भी किसानों की फसल न खरीदे जाने की सर्वव्यापी समस्या के प्रति उनकी संवेदनहीनता का कारण क्या है? यह कहा जाता है कि किसान को मिलने वाली कीमत और उपभोक्ताओं द्वारा चुकाए जाने वाले मूल्य में जमीन आसमान का अंतर होता है जिसके लिए बिचौलिये उत्तरदायी हैं। इन बिचौलियों को चिह्नित और नियंत्रित करने का प्रयास क्यों नहीं होता? किसानों को अपना उत्पाद सीधे उपभोक्ता को बेचने के मार्ग में आने वाली कानूनी अड़चनों को दूर करने के प्रयास औपचारिक ही क्यों होते हैं? इस विषय में किसानों को कानूनी अधिकार देकर उन्हें आवश्यक संरक्षण, प्रशिक्षण और सहयोग देने की कोई गंभीर कोशिश क्यों नहीं होती? किसानों की सारी समस्याओं के समाधान के रूप में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है और इसके मार्ग में आने वाली कानूनी और व्यावहारिक बाधाओं को दूर करने के लिए असाधारण तत्परता क्यों दिखाई जा रही है? कोऑपरेटिव फार्मिंग और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में से कौन सी अवधारणा इन दलों की पसंद है और क्यों? यह कहा जा रहा है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कृषि को फायदे का सौदा बना देगी, इससे किसानों को अच्छे दाम मिलेंगे, खाद्य संरक्षण और खाद्य प्रसंस्करण की बेहतरीन सुविधाओं के लिए बुनियादी ढांचा तैयार होगा और उपभोक्ता को बेहतर विकल्प और सस्ते दाम मिलेंगे। किंतु क्या यह सच नहीं है कि इससे किसान कृषि भूमि के मालिक से  बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नौकर बनने की ओर अग्रसर होंगे तथा उत्पादक और उपभोक्ता दोनों की स्वतंत्रता धीरे धीरे इनके पास गिरवी रख दी जाएगी। देश का 73प्रतिशत धन एक प्रतिशत अमीरों के पास है। क्या इन दलों की कृषि नीतियां इन उंगलियों पर गिने जा सकने वाले अमीरों हेतु तैयार की गई हैं? दोनों ही मुख्य राष्ट्रीय पार्टियां उसी पुराने तर्क और तरीके का आश्रय लेती रही हैं जो निजीकरण के लिए प्रयुक्त होता है। कुप्रबंधन को बढ़ावा देकर घाटे को आधार बनाते हुए निजी क्षेत्र को जादुई चिराग की भांति प्रस्तुत करने की रणनीति बासी और बेशर्म हो चुकी है। घाटे में चल रहे सेक्टर निजीकरण के बाद अपने मालिकों को मुनाफा देने लगते हैं। घाटा क्यों और मुनाफा किसके लिए? यह बुनियादी सवाल अनुत्तरित ही रहते हैं।

कृषि विषयक कोई भी विमर्श कृषि भूमि के स्वामित्व की चर्चा के बिना अधूरा है। कृषि ऋणग्रस्तता पर राधाकृष्ण समिति की रिपोर्ट दर्शाती है कि कृषि भूमि के वितरण में असमानता का आलम यह है कि केवल 10फीसदी लोगों के पास 54 प्रतिशत भूमि का स्वामित्व है। 60 प्रतिशत किसानों के पास 0.4 हेक्टेयर से कम कृषि भूमि है और 20 प्रतिशत ऐसे हैं जो लगभग 1.4 हेक्टेयर कृषि भूमि का स्वामित्व रखते हैं। हर राज्य के अपने लैंड सीलिंग एक्ट हैं और इनकी विभिन्नता इन्हें परिपूर्ण नहीं बनाती बल्कि उन चतुर युक्तियों की विशाल रेंज को प्रदर्शित करती है जो विधि विशेषज्ञों ने इस कानून को कमजोर कर इसका दुरुपयोग करने के लिए रची हैं। कमोबेश यही स्थिति भूमि अधिग्रहण कानून की है जिसे किसानों के बजाय उद्योगपतियों के पक्ष में ढालने और क्रियान्वित करने की कोशिशें इतनी जगजाहिर रही हैं कि अब कॉर्पोरेट मीडिया को इनमें इतनी सनसनी भी नजर नहीं आती कि ये सुर्खियां बटोर सकें। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को भूमि सुधार और भूमि के समान वितरण तथा साझा स्वामित्व के संबंध में अपनी नीतियों को सार्वजनिक विमर्श में लाना चाहिए।

सीएसडीएस की मार्च 2018 की स्टेट ऑफ इंडियन फार्मर्स शीर्षक रिपोर्ट यह दर्शाती है कि शासकीय योजनाओं से केवल ऐसे बड़े कृषक ही लाभ प्राप्त कर पाते हैं जिनके पास 10 एकड़ या उससे अधिक भूमि है। जबकि 1 से 4 एकड़ कृषि भूमि वाले 90 प्रतिशत कृषक सरकारी योजनाओं के लाभों से बिल्कुल वंचित हैं। जब हम किसान आंदोलनों की प्रकृति और किसान नेतृत्व में प्रतिनिधित्व का विश्लेषण करते हैं तब कभी कभी ऐसा लगता है कि आंदोलन को संचालित करने वाले वे बड़े किसान हैं जो कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश से चिंतित हैं। लघु और सीमांत कृषक तथा भूमिहीन कृषि मजदूर तो चर्चा के दायरे से ही बाहर हैं। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को इस निर्धन और असहाय वर्ग को सरकारी योजनाओं के दायरे में लाने और इन्हें भूमि का स्वामित्व दिलाने संबंधी अपनी कार्य योजना का खुलासा करना चाहिए।

उन परिस्थितियों को बनाए रखना जो किसानों की ऋणग्रस्तता के लिए उत्तरदायी हैं और इसके बाद चुनावी फायदे के लिए ऋण माफी करना राजनीतिक पार्टियों की निर्मम चुनावी रणनीति का एक भाग रहा है और सत्तारुढ़ तथा प्रमुख विपक्षी दल से यह पूछा जाना चाहिए कि इस समस्या का कोई स्थायी समाधान निकालने की उनकी नीयत है भी या नहीं?

पिछले चार सालों में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित और नियंत्रित अखिल भारतीय किसान सभा ने अनेक विशाल किसान आंदोलनों को नेतृत्व प्रदान किया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की दक्षिणपंथी विचारधारा का आश्रय लेने वाला भारतीय किसान संघ भी किसानों के बीच अपनी पैठ बनाता दिखता है किंतु स्वदेशी की वकालत करने वाला यह संगठन वर्तमान सरकार के कॉरपोरेट परस्त  एजेंडे के सांकेतिक विरोध तक सीमित रह जाता है क्योंकि संकीर्ण राष्ट्रवाद और हिंदुत्व वादी विचारधारा को प्रश्रय देने का लक्ष्य इसकी पहली प्राथमिकता है। किसान हित इस लक्ष्य के सामने गौण और महत्वहीन हैं। वाम दल भी धीरे धीरे इसी सांस्कृतिक युद्ध में विजय को अपना पहला लक्ष्य बना रहे हैं और किसान आंदोलन की समाप्ति विपक्षी एकता का उद्घोष करने वाले ग्रुप फोटोग्राफ के साथ होने लगी है। किंतु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि मंच से किसान हित में जोशीले भाषण देने वाले कई नेता भी उसी उदारीकरण और वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के सूत्रधार और पैरोकार रहे हैं जो बढ़ती आर्थिक असमानता और किसानों की दुर्दशा हेतु उत्तरदायी है। खेती का सवाल एक ऐसे बहुविकल्पीय प्रश्न में बदल चुका है जिसमें सभी विकल्प एक जैसे ही हैं केवल शब्दों और प्रस्तुति का हेर फेर है। अर्थव्यवस्था के वामपंथी अथवा गांधीवादी मॉडल को खारिज करने के लिए पूंजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों ने तथ्यों की मनोनुकूल व्याख्या तथा भाषालंकार के कुशल संयोजन द्वारा ऐसा समा बांधा है कि इन विचारधाराओं के समर्थक भी संशय ग्रस्त होते लगते हैं। कृषि भूमि के शासकीय करण, साझा स्वामित्व और कोऑपरेटिव फार्मिंग जैसे प्रयासों की अपनी सीमाएं हैं किंतु इन सीमाओं को दूर करने के स्थान पर इन्हें बढ़ा चढ़ा कर पेश करने की प्रवृत्ति हम सभी पर हावी होती दिखती है। जब तक हम सब एक सशक्त वैकल्पिक आर्थिक मॉडल को तैयार कर उसे क्रियान्वित करने का साहस एवं आत्मविश्वास नहीं दिखाएंगे तब तक किसानों को बदहाली से निजात नहीं मिलेगी। 

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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