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भारत
राजनीति
क्या दक्षिणपंथी मुर्ख हैं?
प्रबीर पुरुकायास्थ
27 Mar 2015

 

क्या दक्षिणपंथी दूसरों के मुकाबले में मुर्ख हैं? हम इसे और कैसे समझा सकते हैं कि इनमें से कुछ लोग यह विश्वास करते हैं कि 7,000 वर्ष पहले उड़ने वाली मशीन और जेनेटिक विज्ञान पाया जाता था, या फिर वे क्यों उत्पत्ति और पर्यावरण में बदलाव को मानने से इनकार करते हैं? दक्षिणपंथ क्यों उन सबूतों के विरुद्ध है जो उनके विश्वास के विपरीत है, और वे अपने झूठे तथ्यों को थोपना चाहते हैं। क्यों असंख्य अध्यन महत्त्वपूर्ण आंकड़ों सहित ये बताते हैं कि जो लोग कम समझदार होते हैं वे नस्लभेद पर विश्वास करते हैं और या पूर्वाग्रहों से ग्रसित होते हैं।

ऐसा लगता है कि इसमें सच्चाई है कि रूढ़िवादी लोग मुर्ख होते हैं। ऐसा नहीं है कि वे जन्म से कम बुद्धिमान होते हैं, लेकिन उसका कारण यह है कि वे लोग अपने दिमाग का इस्तेमाल अलग ढंग से करते हैं। मनोविज्ञान का अध्ययन यह बताता है कि कुछ तरह के लोग अपने मस्तिष्क की पूर्वकाल सिंगुलेट प्रांतस्था (एसीसी),के मुकाबले उपरी सतह का इस्तेमाल करते हैं जो कि भावुकता और डर की प्रक्रिया को बढाता है, ए.सी.सी मस्तिष्क का वह हिस्सा जो अनिश्चितता और टकराव की प्रक्रिया को बढाता है। यहाँ इसका एक संबंध है: जो लोग पूर्वाग्रहों में जीते हैं उनके मस्तिष्क की उपरी सतह (amygdale) बड़ी होती है, और वे लोग जो काफी खुले होते हैं उनके मस्तिषक में ए।सी।सी। का क्षेत्र बड़ा होता है। यह कोई कारण के प्रभाव वाला मुद्दा नहीं है, ऐसा भी नहीं है कि वे लोग ज्यादा रुढ़िवादी होते हैं कि उनके मस्तिष्क की उपरी सतह ज्यादा सक्रीय होती है। यह भी संभव है कि उन लोगों में बदलाव के डर की वजह से उनकी उपरी सतह बड़ी हो जाती हो, और अगर लोग अनिश्चितता के साथ दो-चार होने की क्षमता रखते हैं तो हो सकता है उनकी ए.सी.सी. ज्यादा बढ़ जाती हो। मस्तिष्क अपने अप्प में विकसित नहीं होता है; यह हमारे सोच पर भी निर्भर करता है।

अगर अनिश्चितता का ठीक से मुकाबला नहीं किया जाता तो उसके क्या परिणाम होंगे? यह कम कोशिश के विचार को आगे बढ़ाएगा। सोचने का तरीका अनजानी चीज़ के डर से ग्रसित रहेगा, या फिर वह अनिश्चित सीमाओं अपने आपको डाल देगा, और उसके परिणामस्वरूप वह मौजूदा विश्वास व्यवस्था के घेरे में घिर जाएगा। टकराव और अनिश्चितता से मुकाबला करना बड़ी कोशिशों को जन्म देता है और अंतर्विरोध को समझने में सहायता प्रदान करता है। खुला होने के लिए अधिक मानसिक या संज्ञानात्मक प्रयास की आवश्यकता है।

इस तरह की नीची सोच न केवल उन लोगो को होती है जो अपने व्यवहार को दर से ग्रसित रखते हैं। यह उस स्थिति में भी काम करती है जब हमारी सोचने की शक्ति कम हो जाती है। विभिन्न स्तर के एल्कोहल पर जब अध्यन किया गया, तो यह पाया गया कि लोग ज्यादा रुढ़िवादी बन जाते हैं जब उनके रक्त में एल्कोहल की मात्रा ज्यादा पायी जाती है। इसी तरह, अगर उन्हें कोई अन्य संज्ञानात्मक कार्य दिया जाता है, या फिर उन्हें कम समय में जवाब देने के लिए कहा जाता है, वे फिर ज्यादा रुढ़िवादी ‘बन’ जाते हैं। सोचने में कम कोशिश रुढ़िवादी व्यवहार से जुड़ी हुयी है।

हम केवल राजनैतिक विचारों में ही इस तरह की घटना देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए हम इस तरह की घटना टीकाकरण को मना करने वालों में भी पाते हैं, अमरिका में एक ऐसा समूह जो सभी राजनैतिक ताकतों से जुदा है। एक अध्यन बताता है कि टीकाकरण को मना करने को जिस तरह से संपर्क किया गया, उनकी बच्चों को टीकाकरण करवाने की इच्छा में कोई बढ़ोतरी नहीं हुयी है। यहाँ तक कि जब उन लोगो ने अपने इस विश्वास को ठीक किया कि टीकाकरण करने से न तो कोई बिमारी फैलती है और न ही दिमागी संतुलन पर कोई फर्क पड़ता है, जैसाकि टीकाकरण का विरोध करने वाले विश्वास करते हैं – से भी उनकी सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ा कि बच्चों का टीकाकरण कितना जरूरी है। टीकाकरण के तरीकों और उससे फायदों के बारे में जो भी उन्हें बताया गया, उसमें भी उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली। जब उन्हें बीमारियों की तस्वीरें दिखाई गयीं और जिनसे टीकाकरण के जरिए निजात पायी जा सकती थी, उलटे अभिभावकों ने टीकाकरण को उन बीमारियों से जोड़ दिया।

यही वह वजह है जहाँ से दर की शुरुवात होती है। यहाँ तक कि जब संज्ञान की प्रक्रिया शुरू होती है, डर का केंद्र ‘नए’ आंकड़ों को विकसित करना शुरू कर देता है। अगर वह इससे टकराव करता है, पहले से मौजूद विश्वास व्यवस्था नए आंकड़ों को एक डर के रूप में देखता है, रुढ़िवादी व्यक्ति का इसके प्रति रुख उन तथ्यों को बदलने पर लग जाएगा। अनिश्चिताओं के बारे में व्यक्ति जितना कम सोचेने की कोशिश करेगा, और ज्यादा वे व्यक्ति पहले मौजूद संकीर्ण ढांचे में सोचेंगे। इसलिए चाहे फिर पर्यावरण बदलाव का मामला हो, उत्पत्ति का सवाल हो या बंद घर का, चाहे फिर प्राचीन भारतीय विज्ञान के पौराणिक उपलब्धियों का, दक्षिणपंथी इन सवालों पर अपने ‘वैकल्पिक’ उदाहरण को पेश करते हैं, यहाँ तक कि वैकल्पिक कायनात तक को वे ले आते हैं।

रुढ़िवादी और दक्षिणपंथी पूर्वाग्रहों के आधार पर काफी साधारण विश्वास व्यवस्था के आधार पर सोचते हैं। अगर समाज में नस्लवाद है, वे इसे ज़्यादातर आईना दिखाने की कोशिश करते हैं। अगर समुदायों के लिए नफरत है, वे इसे भी सही ठहराने की कोशिश करेंगे। सोच में बदलाव ज्यादा कोशिशों की मांग करता है। इसको दोहराना कि माता-पिता व ने विभूतियाँ क्या कहती हैं, उसके लिए आपको कम मेहनत करनी पड़ती है। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि अधिकारवादी हस्तियाँ जिस ‘कानून’ या ‘सिद्धांत’ की स्थापना करती हैं वे ज्यादातर दक्षिणपंथी विचारधारा से होती हैं।

                                                                                                                                     

जो लोग कम मेहनत वाली सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं वे कभी भी आसानी से अपने से बाहर के समूह से चर्चा नहीं कर पाते हैं – फिर चाहे नस्ल, धर्म या भाषा का सवाल हो। जो लोग विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आते हैं उन्हें उच्च स्तरीय कोशिशों करने की जरूरत है; क्योंकि यह सच है, यह समझने के लिए कि अन्य लोग क्या कह रहे हैं। यह एक अतिरिक्त संज्ञावादी बोझ है, जिसके लिए अतिरिक्त प्रयास की जरूरत है। दक्षिणपंथी अन्य समूहों से मेल-मिलाप से बचते हैं, और इन समूहों के प्रति वे शत्रुता का भी इज़हार करते हैं। आप्रवासी का विरोधी होने के साथ या ये विश्वास करने कि अन्य समुदाय अलग हैं, इसका ही नतीजा है वे उनसे दूर रहते हैं, और इसका साफ़ कारण है कि वे मौजूदा पूर्वाग्रहों को ही धोते रहते हैं।

इसके न केवल प्रयोगसिद्ध सबूत मौजूद हैं कि दक्षिणपंथी वामपंथियों के मुकाबले मुर्ख होते हैं बल्कि इसके लिए एक विश्लेषण भी है कि ऐसा क्यों है। यह सही है कि इस तरह के अध्यन विवादास्पद आधार पर हैं कि बुद्धि को मापने के भी कोई तरीके हैं। ये पैमाने औसत पर आधारित है, कम बुद्धिमान लोग के तर्क और भी ज्यादा पूर्वाग्रहों पर आधारित होंगे।

ये अध्यन इस बात का भी खुलासा करते हैं कि दक्षिणपंथी क्यों लगातार डर को बढाने में लगे रहते हैं। भारत में उदाहरण के लिए दक्षिणपंथी इस मित्थ्या को क्यों बढ़ावा देते हैं कि “मुसलमान हिन्दुओं से जायदा तेज़ी से बढ़ रहे हैं” जब आर्थिक स्थिति के सम्बन्ध में आंकड़े दर्शाते हैं तो पता चलता है कि दोनों ही समुदायों में आबादी की बढ़ोतरी में कोई अंतर नहीं है? अमरिका में ‘स्वेत’ लोगों को लेकर यह डर था जो अब मुसलामानों को लेकर है, जिनकी तुलना अब आतंकवादियों के साथ की जाती है। इसलिए पश्चिम में “आतंक” के खिलाफ युद्ध, खासतौर पर दक्षिणपंथी रिपब्लिक की नज़रों में काफी महत्त्वपूर्ण हो गया है। इसलिए इजराइल में नेतान्याहू एक शैतान के बारे में कहते हैं कि उन्हें हराने के लिए वामपंथ वैश्विक साज़िश रच रहा है। डर दक्षिणपंथी आधार को जकड़े हुए है। वे अपनी धमकी भरी कहानियों को जितना बेच सकते हैं या फैला सकते हैं , उतनी ही जल्दी डरे हुए लोग अपनी सोच बदल लेंगे। यह वह तरीका है जिसके जरिए साम्प्रदायिक दंगों की आड़ में दक्षिणपंथी ताकतों की ज़मीन तैयार होती है।

तो वामपंथ लोगो से कैसे संपर्क साधता है? क्या हम वैसे ही लोगो से संपर्क साधते हैं जैसे कि दक्षिणपंथ? क्या हम उन्हें डराते हैं कि दक्षिणपंथ बढ़ रहा है? क्या हम यह कह कर डराते हैं कि इन नीतियों के चलते हमारा भविष्य कितना खतरे में है? क्या हम भी डर को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं?

इसी तरह की सोच वामपंथ के लिए कामयाम नहीं होगी। डर को बढाने की रणनीति – यहाँ तक कि लोगो को असल खतरा हो – इस तरह की सोच लोगो में रुढ़िवादी व्यवाहार को बढ़ाएगी और उनके दक्षिणपंथ की ओर जाने के भी चांस भी बढ़ जायेंगे। डर रूढ़ीवाद को बढ़ावा देता है न की क्रांतिकारी सोच को।

जोर्ज लाकोफ्फ़, भाषाज्ञान के प्रोफेसर इस बहस को आगे बढाते हैं कि वामपंथ को दक्षिणपंथ के लिए रूपकों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उनके विचारों में लोग रूपकों के बारे में सोचते हैं और सभी चीजें जैसे कि ‘कर कटौती’ और ‘राहत’ को वे ‘सहायता’ के रूपकों से जोड़ लेते हैं। अगर वामपंथ कर राहत के बारे में निंदनीय तरीकों से बात करता है, वे इस बात को ही साबित कर रहे होते हैं कि कर में कटौती वास्तव में ‘राहत’ है। राहत एक सकारात्मक रूपक है – दर्द या अन्य वेदनाओं से राहत। जब भी हम राहत शब्द का इस्तेमाल करते हैं, राहत के साथ जुड़ा सकारातमक रूपक उसके निंदनीय पहलु को उड़ा देता है।

दुर्भाग्यवश, यह कोई साधारण मुद्दा नहीं है। हम कैसा सोचते हैं इन पर किये गए शोध से पता चलता है लोग केवल सकारात्मक और नकारात्मक रूपकों के आधार पर ही नहीं सोचते हैं। उनका अपनी एक विश्वास व्यवस्था है न कि केवल रूपकों का समागम। इस तरह के विश्वास के सामने किसी भी तरह की बहस जो तर्थ्यों पर आधारित हो, या तो वे बहस को नहीं मानेगे या फिर तथ्यों को नकार देंगे, लेकिन अपने सोचने की व्यवस्था को नहीं बदलेंगे। हमें अपने तरीके में बदलाव लाना पड़ेगा कि लोग कैसे सोचते हैं या फिर अपने तथ्यों को रखने के कोई और तरीके ढूँढने पड़ेंगे। हमें निश्चित तौर पर कुछ शब्दों, मुहावरों के इस्तेमाल को रोकना पड़ेगा, जैसाकि प्रोफेसर लाकोफ्फ़ सिफारिश करते हैं; लेकिन यह काफी नहीं है, मुद्दे का सार यह है कि मौजूदा विश्वास तंत्र पर सवाल यह खड़ा होता है कि क्या हम उन्हें गहराई तक सोचने पर मजबूर कर सकते हैं?

फिर हम कैसे विश्वास व्यवस्था को बदलेंगे? अगर पहले मैं पांडित्‍यपूर्वक बोलूं, यह एक सक्रीय अध्यन है जो ज्ञान की व्यवस्था को बनाता है। व्यवस्थित समझ तब बढ़ती है जब हम दुनिया के साथ संपर्क करते हैं। विज्ञान के प्रयोगों करने से हमें प्राकृतिक दुनिया के बारे में पता चलता है। रटने से सीखना – ‘ज्ञान’ को याद करना – या सीखने के निष्क्रिय तरीके का इस्तेमाल, करना आदि इसमें भेद करने में मुश्किल पैदा करती है कि क्या “प्राप्त” बुद्धिमत्ता है या वैज्ञानिक ज्ञान। एक सक्रीय सीखने के तरीके से अंतर्विरोध को समझने में सहायता मिलती है और जिसकी वजह से एक वैज्ञानिक विचार तैयार किया जा सकता है। एक निष्क्रिय तरीका रुढ़िवादी विचार को आगे बढाता है।

एक समाज को समझने की समझ भी कोई अलग नहीं है। विज्ञान के लिए क्लासरूम में प्रयोग करने के बजाय समाज में कुछ ऐसे आन्दोलन होते हैं जो हमारी प्रयोगशाला बन सकते हैं। यहाँ हम उस सामाजिक व्यवस्था के बारे में समझते हैं जिसका हम हिस्सा हैं। समाज को बदलने की कोशिश में हमें इसे सही अर्थों में समझना भी जरूरी है।

असंख्य सही सोच वाले लोग अक्सर कहते हैं कि वामपंथ प्रभावशाली प्रवक्ता नहीं है। वे यहाँ भूल जाते हैं कि लोगो से बात केवल एक समस्या है। दक्षिणपंथ की आवाज़ में गर्माहट है वह नव-उदारवाद के बढ़ने, मीडिया के बदलाव, विज्ञापन और विज्ञापनदाताओं की भूमिका, डिजिटल तकनीक की एकाधिकारवादी शक्तियों के उभरने की वजह से है। ये एकाधिकारवादी मीडिया और उसका दक्षिणपंथ को समर्थन देना तथा परम्परावादी वामपंथ के कमजोर का कमज़ोर होना एक बड़ी चुनौती को पैदा करता है।

नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था ने  काम के स्थान को उजाड़ कर रख दिया है। इसने यूनियनों और मजदूर वर्ग के आन्दोलनों को तबाह कर दिया है, केवल भारत में ही नहीं लेकिन पूरी दुनिया में। हम मजदूर वर्ग आन्दोलन को नव उदारवादी पूंजीवाद के तहत हो रहे ढांचागत बदलाव के चलते कैसे संगठित करेंगे? केवल इस केन्द्रीय समस्या को संबोधित करते हुए क्या हम वामपंथ के संचार की समस्या को संबोधित कर सकते हैं?

(अनुवाद:महेश कुमार)

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

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