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अपराध
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राजनीति
क्या दो साल से कम सज़ा पाए नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए?
हाईकोर्ट ने इस मामले पर केंद्र सरकार को नोटिस भेजकर उसकी प्रतिक्रिया मांगी है कि दो साल से कम सजा पाए नेताओं को चुनाव लड़ने से क्यों नहीं रोका जाना चाहिए?
सोनिया यादव
26 Aug 2019
haryana punjab high court
Image courtesy: India.com

देश की सियासत में राजनीतिक पार्टियां ऐसे कई उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारती हैं जिनका दाग़दार इतिहास होता है। दाग़ी होने के बावजूद मतदाता उन्हें वोट देते हैं और वो जीत भी जाते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में उन नेताओं के भी संसद या विधानसभा का चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग की गई है जिन्हें किसी आपराधिक मामले में दो साल से कम की सजा मिली हो।

सुप्रीम कोर्ट के ज्यूडिशियल क्लर्क गणेश खेमका ने यह याचिका दायर की है। उन्होंने अपनी दलील में संविधान के अनुच्छेद14 (समानता का अधिकार) का जिक्र किया है। इस याचिका पर हाईकोर्ट की डिविजन बेंच के चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस अरुण पल्ली ने टिप्पणी करते हुए कहा, 'जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8(3) के तहत दो साल से कम की सज़ा में चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने का प्रावधान नहीं है। यह वास्तव में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के प्रावधान का उल्लंघन है क्योंकि जनप्रतिनिधि कानून की यह धारा, एक ही समूह को अलग-अलग वर्गों में बांटती प्रतीत होती है। ऐसे में इस तथ्य की जांच किए जाने की आवश्यकता है।'

क्या कहता है भारतीय जनप्रतिनिधित्‍व कानून ?

जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 दोषी राजनेताओं को चुनाव लड़ने से रोकती है। लेकिन ऐसे नेता जिन पर केवल मुक़दमा चल रहा है, वे चुनाव लड़ने के लिये स्वतंत्र हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन पर लगा आरोप कितना गंभीर है।

इस अधिनियम की धारा 8(1) और (2) के अंतर्गत प्रावधान है कि यदि कोई विधायिका सदस्य (सांसद अथवा विधायक) हत्या, बलात्कार, अस्पृश्यता, विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम के उल्लंघन; धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर शत्रुता पैदा करना, भारतीय संविधान का अपमान करना, प्रतिबंधित वस्तुओं का आयात या निर्यात करना, आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होना जैसे अपराधों में लिप्त होता है, तो उसे इस धारा के अंतर्गत अयोग्य माना जाएगा एवं 6 वर्ष की अवधि के लिये अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

वहीं, इस अधिनियम की धारा 8(3) में प्रावधान है कि उपर्युक्त अपराधों के अलावा किसी भी अन्य अपराध के लिये दोषी ठहराए जाने वाले किसी भी विधायिका सदस्य को यदि दो वर्ष से अधिक के कारावास की सज़ा सुनाई जाती है तो उसे दोषी ठहराए जाने की तिथि से आयोग्य माना जाएगा। ऐसे व्यक्ति को सज़ा पूरी किये जाने की तिथि से 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य माना जाएगा। 

हालाँकि, धारा 8(4) में यह भी प्रावधान है कि यदि दोषी सदस्य निचली अदालत के इस आदेश के खिलाफ तीन महीने के भीतर उच्च न्यायालय में अपील दायर कर देता है तो वह अपनी सीट पर बना रह सकता है। किंतु, 2013 में ‘लिली थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा को असंवैधानिक ठहरा कर निरस्त कर दिया।

 बेंच ने इस मामले पर केंद्र सरकार को नोटिस भेजकर उसकी प्रतिक्रिया मांगी। मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर को होगी। गौरतलब है कि अगर केंद्र सरकार ने अदालत की इस सलाह पर अमल किया तो देशभर के विभिन्न दलों के नेता इसके चपेट में आ जाएंगे।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि सत्तारूढ़ बीजेपी और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस समेत लगभग सभी दल दाग़ी उम्मीदवारों को मैदान में उतारते ही क्यों हैं? 

इस सवाल का जवाब मिलता है राजनीतिशास्त्र के जानकार मिलन वैष्णव की किताब 'When Crime Pays' में...वे लिखते हैं कि, "एक मुख्य वजह जो गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीवदारों का चयन करने के लिए पार्टियों को प्रेरित करता है वह है विशुद्ध नगद। चुनावों की बढ़ती लागत और इसमें पैसों की संदिग्ध व्यवस्था होती है जहां पार्टियां और उम्मीदावार अपने चंदे और ख़र्चों को कम करके दिखाते हैं। पार्टियां स्व-वित्तपोषित उम्मीदवारों में दिलचस्पी दिखाती हैं जो पार्टी के सीमित खज़ाने से धन लुटाने की बजाय उल्टा पार्टी को ही 'किराया' देने में योगदान करते हैं।"

भारत के लोकतंत्र में बड़ी संख्या में राजनीतिक पद हैं। हर चुनाव में काफी संसाधनों की ज़रूरत पड़ती है। कई पार्टियां निजी मिल्कियत की तरह हैं जिसे प्रभावी हस्तियां या ख़ानदान चला रहे हैं और जिनमें आंतरिक-लोकतंत्र की कमी है। ये परिस्थितियां "मोटी जेब वाले अवसरवादी उम्मीदवारों" की मदद करती हैं।

मामला पेचीदा है

इस संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट की वकील आर्षी जैन ने न्यू़ज़क्लिक को बताया कि, ये मामला थोड़ा पेचीदा है। कोर्ट इस याचिका को जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के प्रावधानों के तहत ही देखेगा। लेकिन अगर केंद्र सरकार अपने जवाब में अनुच्छेद 14 को लेकर कोई ठोस स्पष्टीकरण देती है, तो मामला कुछ अलग रूख ले सकता है। मगर इसकी कम ही संभावना है कि केंद्र अयोग्यता के पक्ष में अपना जवाब दे, क्योंकि केंद्र हमेशा से नेताओं के अयोग्यता का फैसला कोर्ट द्वारा नहीं चाहता। इसका उदाहरण हम पहले भी पांच साल की सज़ा पर नेताओं को राजनीति से हमेशा के लिए अयोग्य ठहराने वाले फैसले में केंद्र के जवाब को ले सकते हैं।

व्यापक परिपेक्ष्य में देखने की ज़रूरत

पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र की प्रोफेसर गीता श्रीवास्तव बताती हैं कि, इस मामले को व्यापक परिपेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है। ये सुनने में अच्छा लगता है की हमारी राजनीति साफ-सुथरी होनी चाहिए। लेकिन इसके कई मायने हैं कई बार आरोप और सजा राजनीति से प्रेरित होते हैं, कई बार लोकप्रिय चेहरों को झूठे केस में फंसाया जाता है। अगर ऐसा किया गया तो राजनीतिक दलों में विरोधी एक-दूसरे पर आपराधिक केस करेंगे और हो सकता है की कुछ मामलों में सज़ा भी हो जाए। 

ऐसे में हमें ये भी समझने की जरूरत है कि क्या हम सही निर्णय ले पा रहे हैं। आज भी हमारी संसद और विधान सभाओं में कई ऐसे दागी नेता हैं जिन पर गंभीर आरोप थे और वो साबित नहीं हो पाए, तो वहीं कई ऐसे भी नेता हैं जो जेल की सज़ा काटने के बाद भी योग्य हैं।
प्रोफेसर श्रीवास्तव मानती हैं कि हमें कानून से ज्यादा लोगों के अंदर इस भावना को जगाने की जरूरत है कि वो सही और साफ-सुथरे उम्मीदवार को ही वोट दें।

इस सवाल पर कि आखिर मतदाता अपराधी उम्मीवदारों को वोट ही क्यों देते हैं, गीता बताती हैं कि ऐसा इसलिए नहीं है की मतदाता अनपढ़ या अज्ञानी हैं या फिर उसे जानकारी का अभाव है। हमारे यहां अच्छे ख़ासे जानकार मतदाता भी अपराधी उम्मीदवारों का समर्थन करते हैं, उन निर्वाचन क्षेत्रों में जहां जाति या धर्म के नाम पर सामाजिक विभाजन गहरे हैं और सरकार अपने कार्यों को बिना भेदभाव के पूरा करने में असफल है, जहां सरकार सेवाएं मुहैया करने, न्याय दिलाने या सुरक्षा देने में असफल है।

चुने गए जनप्रतिनिधियों के चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे इस बात की पुष्टि करते हैं कि आपराधिक रिकॉर्ड रखना उनके लिए किसी तमगे की तरह है। वे भारी मतों से जीतते भी हैं, जो इस खतरनाक रुझान का स्पष्ट संदेश है कि राजनीतिक दलों के साथ-साथ मतदाताओं को भी उनकी आपराधिक छवि स्वीकार्य है। आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने की अभियुक्त प्रज्ञा ठाकुर मजे से चुनाव जीतती हैं और कानून बनाने संसद पहुंच जाती हैं।

क्या कहती है एडीआर की रिपोर्ट?

चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी शोध संस्था ‘एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक अलायंस’ (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक आपराधिक मामलों में फंसे सांसदों की संख्या बीते दस साल में 44 प्रतिशत बढ़ी है। 17वीं लोकसभा के लिए चुनकर आए 542 में से 233 (43 प्रतिशत) सांसदों के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक मुकदमा चल रहा है। 2004 में जहां आपराधिक मुकदमे झेलने वाले सांसदों का प्रतिशत 24 था वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव में ऐसे 162 सांसद (30 प्रतिशत) चुनकर आए थे, जबकि 2014 के चुनाव में निर्वाचित इन सांसदों की संख्या 185 (34 प्रतिशत) थी। निर्वाचित जनप्रतिनिधि अक्सर हवाला देते हैं कि उनके खिलाफ सारे मुकदमे राजनीति से प्रेरित हैं अथवा विरोध प्रदर्शन वगैरह के लिए दर्ज कर लिए जाते हैं, जबकि एडीआर ने नवनिर्वाचित 542 सांसदों में 539 सांसदों के हलफनामों के विश्लेषण के आधार पर बताया कि इनमें से 159 सांसदों (29 प्रतिशत) के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर किस्म के आपराधिक मामले लंबित हैं।

इन आंकड़ों से संसद की जो तस्वीर बनती है, वह एक भारतीय होने के नाते हमें शर्मसार करने के लिए काफी है। लेकिन हमारे राजनीतिक दल शर्मिंदा नहीं हैं। वे तो अपनी विचारधारा में कहीं से न खपने वाले व्यक्ति को थाली में सजा कर टिकट दे देते हैं, एकमात्र शर्त यह होती है कि उम्मीदवार चुनाव जिताऊ होना चाहिए।

राजनेताओं और अपराध का 'चोली-दामन' का साथ रहा है। देश में आमतौर पर ऐसी कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं, जो पूरी तरह से अपराध मुक्त छवि की हो। एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट माने तो जिस संसद को देश का क़ानून बनाने का अधिकार है, उसी के भीतर लोकसभा में 185 और राज्यसभा में 40 सांसद दाग़ी हैं। तो ये सवाल हो सकता है कि आखिर कैसे वे नेता देश में भ्रष्टाचार या राजनीति में अपराध को लेकर चिंतन-मनन भी कर सकते हैं जो ख़ुद दाग़दार हैं। ऐसे में राजनीति को अपराध मुक्त कैसे बनाए, ये एक बड़ी चुनौती है।

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