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भारत
राजनीति
क्या गोलियों से दबेगा आक्रोष
अगर किसान सत्ताधीशों की गरदन पकड़ने तक पहुंच गया, तो तय. मानिए, देश के हालात बदल जाएंगे, जिसके आसार नजर आ रहे हैं।...
भारत शर्मा
12 Jan 2018
kisan andolan

१२ जनवरी १९९८, आज से ठीक २० साल पहले, मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई में तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार किसानों पर कहर बनकर टूटी। लगातार ४ साल के सूखे से बेहाल राहत की मांग कर रहे इन किसानों पर पुलिस ने गोलियां बरसाईं, जिसमें २४ किसान शहीद हो गए। इस किसान आंदोलन के नेता डा. सुनीलम का भी एनकाउंटर करने की पूरी तैयारी सरकार ने कर ली थी, बाद में उन पर कई केस लादे गए, जिनमें उन्हें ५४ साल की जेल भी हुई।

उस वक्त भाजपा विपक्ष में थी, उसके लिए राजनीति करने का यह बेहतर मौका था, जिसे उसने भुनाया। प्रदेश में सत्ता में आने के पहले भाजपा के लिए मुलताई गोली चालन जलियांवाला बाग था, जिसे सत्ता में आने के बाद वह भूल गई और साल २०१७ में उसी तरह सही दाम मांग रहे मंदसौर के किसानों को उसने भी उसी तरह घेरकर मारा, जैसा पिछली सरकार ने किया था।

पिछले २० साल में काफी कुछ बदल गया है। मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के बाद जब १९९१ में नई आर्थिक नीतियों को लागू किया गया, तब देश के कुछ हिस्से को लाभ भी मिलना शुरु हुआ। किसान भी कैश क्राप की तरफ गया, जिससे उसे आर्थिक लाभ भी मिला। मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए जो समझौते उस समय किए थे, उसका असर उस समय तक देखने को नहीं मिला था, फिर भी किसानों को दी जाने वाली राहत में कटौती शुरु हो गई थी। किसानों में आत्महत्या का दौर उस समय उतना आम नहीं था। अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं। सरकारों ने किसानों को उनके हालातों पर छोड़ दिया है। खाद, बीज, बिजली पर जो राहत दी जाती थी, लगभग खत्म कर दी गई है। किसान लागत पूरी करने के लिए नगद फसल की तरफ जा रहा है और कर्ज के दलदल में फंस रहा है। नतीजन आत्महत्या का दौर चल पड़ा है, गांव में भयानक पलायन है, जो अन्नदाता पूरे देश का पेट भरने का दम रखता था, वह भूखे मरने के कगार पर आ गया है।

भारतीय जनता पार्टी उत्सवधर्मी पार्टी है। भाजपा सरकारें हर वक्त उत्सव मनाती रहती हैं, उन्हें लगता है, इससे लोगों के गम दूर हो जाएंगे। मध्य प्रदेश की ही बात करें, तो इस प्रदेश की सरकार लगातार कृषि कर्मण पुरस्कार ले रही थी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह यह दावा करते थे, कि किसान की आय दो गुनी कर चुके हैं। यहां तक कि साल २०१७ में नीति आयोग में वे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई मुख्यमंत्रियों की एक बैठक में यह बता चुके थे, कि किसानों की आय दोगुनी कैसे की जाती है। मंदसौर ने उनकी पोल खोल दी। हालात उसके बाद भी नहीं सुधरे हैं, शिवराज सरकार द्वारा भावांतर योजना ने किसानों की स्थिति को और बिगाड़ दिया है। गेहूं और धान छोड़कर सरकार कोई भी सामान समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदती, अब भावांतर योजना में सरकार यह भी तय करेगी, कि किस खेत में कितना उत्पादन होगा। अगर मौसम ने साथ दिया और फसल बम्पर हो गई, तो उसका लाभ किसान को नहीं मिलेगा, क्योंकि यह माना जाएगा, कि यह उत्पादन उसके खेत में नहीं हुआ है, मतलब किसान सरकार के साथ धोखा कर रहा है।

भावांतर का सीधा लाभ व्यापारियों को मिला, ठीक उसी तरह जैसे नोटबंदी का मिला था।शिवराज सरकार के भावांतर योजना के बाद व्यापारियों ने फसल के दाम और गिरा दिए, क्योंकि किसानों को भाव का अंतर सरकार से मिलने वाला था। उत्तर भारत के कई इलाकों में सूखे के बाद भी किसानों को अगर फसल का दाम नहीं मिल पा रहा है या फिर नोटबंदी के बाद जिस तरह अचानक दाम गिरे, उसका एक बड़ा कारण यह भी है, कि मोदी सरकार ने तमाम कृषि उत्पादों को विदेशों से आयात करने की छूट दे रखी है।

मध्य प्रदेश एक बार फिर उदाहरण के तौर पर सामने आता है, जबकि आंदोलन कर रहे किसानों से सरकार ने सरकारी खजाने के प्याज खरीदी और उसे सड़ा कर फैंक दी। आज आम उपभोक्ता ऊंची कीमत पर प्याज खरीद रहा है। जो करदाता जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थानों को लेकर यह कहता नजर आता है, कि वहां उसके टैक्स के पैसे का दुरुपयोग हो रहा है, वह शिवराज सरकार से सवाल नहीं करता।

मुलताई के बाद मंदसौर में हुई गोलीचालान ने किसान आंदोलन को नई दिशा दी है। किसानों को यह बात समझ में आ गई है, कि सरकारें बदल जाने से चरित्र नहीं बदलता, उसके सामने संघर्ष ही रास्ता है। महाराष्ट्र फिर मध्य प्रदेश और उसके बाद राजस्थान, आसाम, एक के बाद एक राज्य में किसानों ने आंदोलन किए और सरकार को झुकने पर मजबूर किया। इस किसान आंदोलन ने तमाम किसान संगठनों को भी एक मंच पर लाने को मजबूर किया। हालांकि इसकी पहली शुरुआत भूमि अधिकार आंदोलन के रुप में हुई थी, जब मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की फिराक में थी। इस नए आंदोलन के बाद पहली बार देश के तमाम बड़े १८६ किसान संगठन एक साथ आए और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का गठन किया गया। कई राज्यों में किसान मुक्ति यात्रा निकाली गई और संसद पर दो बार किसान संसद का आयोजन भी किया गया। इस पूरे आंदोलन में दो मांग हैं, पहला फसल का लाभकारी मूल्य, स्वामीनाथन रिपोर्ट के आधार पर, दूसरा किसानों की कर्ज माफी। इसके लिए किसान संसद ने दो बिल भी पास किए हैं, जिसे देशभर के किसानों के पास लेकर जाया जा रहा है।

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