NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या हर साल आने वाली बाढ़ बिहार का प्रमुख चुनावी मुद्दा नहीं होना चाहिए?
नई सरकार बनने को अब सिर्फ दो महीने बाकी हैं और बिहार के लोगों के पास भी बाढ़ की आपदा से जूझने के लिए सिर्फ दो ही महीने बचे हैं।
देवपालिक कुमार गुप्ता
31 Mar 2019
सांकेतिक तस्वीर
फाइल फोटो : साभार

बिहार लगभग हर साल बाढ़ और सूखा जैसी आपदाओं से जूझता है। गंगा , गंडक , कोसी नदी की बाढ़ से लोग हर साल तबाह रहते हैं। जानकारों की माने तो बाढ़ का मुख्य कारण नदी में जमा गद (बालू) है। गाद की वजह से वर्षा का पानी नदियों में उफान लाता है जिसके कारण से आस-पास का इलाका   तबाह हो जाता है। गाद के समस्या से स्थायी समाधान के बजाय गाद को नदी से निकालकर फिर नदी में ही डाल दिया जाता है। 

बिहार में लोकसभा की कुल वस्तुएं हैं। जो केंद्र की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं, लेकिन बिहार की बाढ़ की समस्या कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनती। देश में पहले दौर के मुकाबले नज़दीक है और नई सरकार बनने को अब सिर्फ कुछ महीने बाकी हैं। बिहार के लोगों के पास भी इस आपदा से जूझने के लिए सिर्फ कुछ ही महीने हैं।

मौजूदा सरकार में किसान , छात्र और शिक्षक कई बार सड़क पर उतरे। इससे साफ जाहिर है कि सरकार खेती-किसानी , शिक्षा , बेरोजगारी और बुनियादी सुविधा दे पाने में विफल रही है। जैसा कि 2014 में वादे किए गए थे। जब सफलता हाथ नहीं लगती है तो दूसरे की असफलताओं को आगे लाया जाता है। इस चुनाव में भी यही हो रहा है। पुरानी सरकारों के विफलताओं को गिनाया जा रहा है। बिहार के लिए पार्टियाँ अपने-अपने घोषणा पत्र में इन आपदाओं के लिए कोई जगह देंगी ?

चुनाव में नेता इस प्रकार की बात क्यों नहीं करते ? देश में मंदिर-मस्जिद सब पर बात होती है, लेकिन बुनियादी मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है ? 

जाहिर है बिहार में भी लोगों को उनके मूल मुद्दों से भटकाने की कोशिश की जाएगी।

आज की राजनीति का हाल यह है कि बिना पैसे के चुनाव लड़ पाना असंभव सा है। बाढ़ से प्रभावित लोग कौन हैं ? जिनके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे कहीं और बस जाएं। कहीं नहीं और ज़मीन नहीं है। ये सभी लोग संसाधनविहीन लोग हैं। चुनाव लड़ने जैसी बात तो इनसे कोसों दूर है। जो भी राज्य और केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व चुनकर आता है उनके बीच का नहीं होता है। शायद यही कारण है कि जिस तरह की सवेंदशीलता दिखना चाहिए, अधिकारियों में उस तरह की नहीं दिखती। 

बिहार के लोगों को अपनी समस्याओं के प्रति सजग होते हुए अन्य सभी मुद्दों को भूल जाना चाहिए। सरकार बदलने की बारी तो पांच साल बाद आएगी। 

वैसे तो बिहार में कई समस्याएं हैं लेकिन सबसे बड़ी समस्या बाढ़ और सूखा है। एक ओर राज्य की 50 फ़ीसदी आबादी हर साल बाढ़ के ख़तरे में रहती है तो दूसरी ओर सूखे की समस्या से जूझती है। यहां गरमियां शुरू होते ही सूखे की समस्या शुरू हो जाती है और बरसात आते ही बाढ़ का सामना करना पड़ता है। सालों से चली आ रही इन समस्याओं पर सरकार के तमाम दावों के बावजूद हालात जस के तस हैं। 2017 में बाढ़ के कारण बिहार में 400 से भी अधिक लोगों की मौत हुई थी। उधर, कम बारिश के कारण बिहार के 23 जिले तथा 203 ब्लाक के किसान सबसे अधिक प्रभावित हुए थे, जिनकी अनुमानित संख्या 10 लाख थी। साल 2016 में 250 लोगों की मौत हुई। यह आंकड़ा साल दर साल जस का तस है।

बिहार आपदा प्रबंधन विभाग के आकड़ों के मुताबिक बिहार राज्य के 15 जिले अति बाढ़ प्रवण जिलों की सूची में हैं जबकि 28 जिलें बाढ़ प्रवण से प्रभावित हैं। अमूमन हर साल बिहार बाढ़ जैसी भयंकर आपदा से जूझता है। 

बाढ़ की वजह से दो से तीन महीना आम जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।खासकर उत्तर बिहार के लोगों का। लोग आम दिनों में तीन समय भोजन करते हैं। बाढ़ में सिर्फ एक समय भोजन के नाम पर चूड़ा और गुड़ (मीठा) मिल पाता है। कई लोग ऐसे हैं जो पानी में चावल डाल मठ्ठा बनाकर पेट पालने को मजबूर होते हैं। बाढ़ की वजह से लोगों को शौच करने तक की जगह नहीं मिल पाती। पानी में खड़े-खड़े शौच करना पड़ता है। करोड़ों की फ़सल बर्बाद हो जाती है। 2008 में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, बाढ़ की वजह से 34 करोड़ की फसलें तबाह हुईं थी। बाढ़ के पानी से रखा अनाज सड़ जाता है। बच्चों के स्कूल बंद हो जातें हैं। महीनों तक उनकी पढ़ाई बाधित हो जाती है। बाढ़ के समय बीमारियाँ बहुत तेजी से फैलती हैं जैसे- सर्दी, खांसी, जुकाम, बुखार, उल्टी-दस्त, मलेरिया, डायरिया। पीने का शुद्ध पानी नसीब नहीं होता। 

स्वास्थ्य व्यवस्था ठप हो जाती है। दवाई तक नहीं मिल पाती। कोई अकस्मात बीमार पड़ जाए तो अस्पताल जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल पाता। सड़के नदी में तब्दील हो जाती हैं। नाव और खाट पर सुलाकर लोग अस्पताल ले जाते हैं। देरी की वजह से कई बार मरीज़ रास्ते मे ही दम तोड़ देता हैं। पानी में मवेशी बह जाते हैं। चारे के आभाव में मवेशी दम तोड़ देते हैं। बाढ़ खत्महो जाने के बाद भी लोगों की परेशानियां कम नहीं होती। चारो तरफ कीचड़ ही कीचड़। गन्दगी में जन्में कीड़े-मकोड़े लोगो के लिए अनेको बीमारियाँ लेकर आते हैं। पानी का लेबल इतना ऊपर आ जाता है कि नलों से गंदा पानी आने लगता हैं। कई बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पुल न होने से लोगों को दूसरी तरफ जाने में नाव का सहारा लेना पड़ता है। नाव पलटने से कई लोगो की जान तक चली जाती हैं। उलटे सरकार के उदासीन रवैये से ज्यादातर लोगों को निराशा ही हाथ लगती है।

सरकार बाढ़ आने पर आनन-फानन में अस्थायी समाधान तो कर देती है लेकिन कभी ठोस कदम नहीं उठाया गया है। हर साल बाढ़ से लाखों का जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है। सरकार जागती तभी है जब काफी क्षति पहुंच चुकी होती है। सवाल पूछने पर कभी नेपाल को दोष देते हैं तो कभी चूहे को देते हैं कि चूहे ने बांध काट दिया। वही हाल कमोबेश दूसरे प्राकृतिक आपदा सूखा के साथ है। सरकार मुआवजा देना ही अपना काम समझती है।

पर्यावरण के जानकार और “आज भी खरे हैं तालाब” किताब लिखने वाले अनुपम मिश्र कहते हैं,“बाढ़ अतिथि नहीं है। यह अचानक नहीं आती। इसके आने की तिथियाँ बिल्कुल पक्की हैं। लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते है कि यह अचानक आई विपत्ति है। इसके पहले जो तैयारियां करना चाहिए, वे बिल्कुल नहीं कर पाते” 

बिहार की मौजूदा सरकार और केंद्र के मोदी सरकार में गठबंधन है इसलिए बिहार को चाहिए कि वे सिर्फ उन्ही मुद्दों को तवज्जो दे जिससे वे वर्षों से जूझ रहे हैं।

ऐसे समय में जब चुनाव नजदीक है तो बिहार के लोगों के पास अच्छा मौका है जब वे अपना वोट बाढ़ , सूखा जैसे बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए अनुमति दें। 

बिहार के लोगों के लिए नदियों के बाँधों की बेहतर मरम्मत की ज़रूरत हैं न कि मंदिर और मस्जिद की। जब मनुष्य ही नहीं रहेगा तो मंदिर का घंटा कौन बजाएगा और मस्जिद में इबादत कौन करेगा ? बिहार के लोगों को वोट देने से पहले अपने जीवन के बारे में जरूर सोच लेना चाहिए। अपने बच्चों के बारे में जरूर सोच लेना चाहिए जो बाढ़ और सूखे में भूखों मरते हैं। मंदिर और मस्जिद के बारे में सोचने का अभी बहुत वक़्त है। 

(लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं।)

 

Bihar flood
floods
disaster
General elections2019
2019 Lok Sabha elections
bjp-jdu
Narendra modi
Nitish Kumar

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

बिहारः नदी के कटाव के डर से मानसून से पहले ही घर तोड़कर भागने लगे गांव के लोग

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?


बाकी खबरें

  • prashant kishor
    अनिल सिन्हा
    नज़रिया: प्रशांत किशोर; कांग्रेस और लोकतंत्र के सफ़ाए की रणनीति!
    04 Dec 2021
    ग़ौर से देखेंगे तो किशोर भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने में लगे हैं। वह देश को कारपोरेट लोकतंत्र में बदलना चाहते हैं और संसदीय लोकतंत्र की जगह टेक्नोक्रेट संचालित लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं…
  • All five accused arrested in the murder case
    भाषा
    माकपा के स्थानीय नेता की हत्या के मामले में सभी पांच आरोपी गिरफ्तार
    04 Dec 2021
    घटना पर माकपा प्रदेश सचिवालय ने एक बयान जारी कर आरएसएस को हत्या का जिम्मेदार बताया है और मामले की गहराई से जांच करने की मांग की है.पुलिस के अनुसार, घटना बृहस्पतिवार रात साढ़े आठ बजे हुई थी और संदीप…
  • kisan andolan
    लाल बहादुर सिंह
    MSP की कानूनी गारंटी ही यूपी के किसानों के लिए ठोस उपलब्धि हो सकती है
    04 Dec 2021
    पंजाब-हरियाणा के बाहर के, विशेषकर UP के किसानों और उनके नेताओं की स्थिति वस्तुगत रूप से भिन्न है। MSP की कानूनी गारंटी ही उनके लिए इस आंदोलन की एक ठोस उपलब्धि हो सकती है, जो अभी अधर में है। इसलिए वे…
  • covid
    भाषा
    कोरोना अपडेट: देशभर में 8,603 नए मामले सामने आए, उपचाराधीन मरीजों की संख्या एक लाख से कम हुई
    04 Dec 2021
    देश में कोविड-19 के 8,603 नए मामले सामने आए हैं, जिसके बाद कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 3,46,24,360 हो गई है।  
  • uttarkhand
    सत्यम कुमार
    देहरादून: प्रधानमंत्री के स्वागत में, आमरण अनशन पर बैठे बेरोज़गारों को पुलिस ने जबरन उठाया
    04 Dec 2021
    4 दिसंबर 2021 को उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ रहे हैं। लेकिन इससे पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत के लिए आमरण अनशन पर बैठे बेरोजगार युवाओं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License