NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
क्या इमरान ख़ान मोदी और डोभाल पर भारत के चुनाव में गेम खेल रहे हैं?
यह केवल मोदी ही हैं जो इसे स्पष्ट करने की स्थिति में हैं कि इमरान ख़ान किस आधार पर इस तरह के दुस्साहस के साथ ऐसी बात कह सकते हैं कि, "शायद अगर भाजपा – एक दक्षिणपंथी पार्टी - जीतती है, तो कश्मीर मामले में किसी तरह का समझौता हो सकता है।"
एम. के. भद्रकुमार
12 Apr 2019
Translated by महेश कुमार
क्या इमरान ख़ान मोदी और डोभाल पर भारत के चुनाव में गेम खेल रहे हैं?

शासन की कला में द्विअर्थी बात करना आम बात है। एक पहले का माना हुआ मामला है, जब 2012 में वे फिर से चुनाव का सामना कर रहे थे। रूस के प्रति उनके "नरम" होने के लिए रिपब्लिकन दावेदार मिट रोमनी ने उनकी आलोचना की जिससे वे काफ़ी आहत हुए, इस पर ओबामा ने क्रेमलिन नेतृत्व से एक निजी समझ बनाने की मांग की क्योंकि अमरीका की जनता यह बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कोई भी रुस के प्रति लचीला रुख रखे जब तक कि नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव समाप्त नहीं हो जाता है।

तब ओबामा और उनके वार्ताकार रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव इस बात से अनभिज्ञ थे कि 26 मार्च, 2012 को सियोल में जब उनकी सौदा पर बात चल रही थी तो वह खुले माइक्रोफ़ोन पर रिकॉर्ड हो गयी थी, इस वार्ता में रूस ओबामा के इस प्रस्ताव से सहमत था कि जब तक राष्ट्रपति के रूप में वे अपना दूसरा कार्यकाल हासिल नहीं कर लेते तब तक रूस को धैर्य बनाए रखना होगा।

स्पष्ट रूप से, इसकी प्रबल संभावना यह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की कथित आशावादिता सहज रूप से उस समय सामने नहीं आई जब उन्होंने मंगलवार को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को बताया कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरा कार्यकाल जीत लेते हैं, तो कश्मीर समझौता पूरी तरह से संभव है।
इमरान ख़ान ने केवल मोदी के जटिल राजनीतिक व्यक्तित्व के बारे में पूरी तरह से चेतन रूप से बात की होगी। विशेष रूप से, वे दिसंबर 2015 में लाहौर के माने हुए आश्चर्यचकित दौरे के दौरान पाकिस्तान के प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ़ और मोदी के बीच गोपनीय आदान-प्रदान के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच 'बैक चैनल' के ज़रिये बातचीत को गुप्त रखने में उन्हें बहुत फ़ायदा है। हाल के वर्षों में हमारे दुविधापूर्ण प्रणाली के विपरीत, पाकिस्तान का आईएसआई भारत के सभी उच्च-स्तरीय आदान-प्रदानों पर सावधानीपूर्वक नज़र रख रहा है।
भारतीय जनता शायद ही कुछ जानती हो कि लाहौर की बैठक में क्या हुआ –या फिर 25 दिन पहले पेरिस में हुई उनकी प्रसिद्ध "अनौपचारिक बातचीत" के दौरान क्या हुआ, जिसने शायद लाहौर की बैठक तय की थी।

लेकिन इसमें कोई ग़लती नहीं की जानी चाहिए कि आईएसआई इस पर नज़र रखे हुए थी। पाकिस्तानी पक्ष वास्तव में लाहौर में मोदी की आश्चर्यजनक यात्रा की उम्मीद कर रहा था और उसने भारतीय नेता के लिए एक रेड कार्पेट रिसेप्शन की विस्तृत तैयारी की थी। संदेह से परे, हर क़दम जो मोदी ने पाकिस्तानी धरती पर उठाया और नवाज़ से जो कहा उस हर शब्द को आईएसआई अभिलेखागार में स्मृति के रूप में संग्रहीत किया गया था।
कहने के लिए, यह केवल मोदी ही हैं जो आज इस बात को स्पष्ट करने की स्थिति में है कि इमरान ख़ान किस आधार पर इस तरह के दुस्साहस के साथ यह बात कह सकते हैं कि, “शायद अगर भाजपा – एक दक्षिणपंथी पार्टी – अगर जीतती है, तो कश्मीर पर किसी तरह का समझौता हो सकता है।"
समान रूप से, इमरान ख़ान की कांग्रेस के बारे में अप्रिय टिप्पणी अनुचित नहीं है, जब उन्होंने कहा कि उन्हें कश्मीर समझौते पर भव्य पुरानी पार्टी से कोई उम्मीद नहीं है। इमरान ख़ान इस बात से अनभिज्ञ नहीं हो सकते थे कि यद्यपि मनमोहन सिंह (या उनके एनएसए) ने भारतीय मीडिया में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़ा रुख इख़्तियार नहीं किया था, लेकिन जब वह भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की बात करते थे तो वे काफ़ी सख़्त थे और पाकिस्तान को कोई रियायत नहीं देते थे।

वास्तव में, कांग्रेस पार्टी का रिकॉर्ड लगातार पाकिस्तान के प्रति एक "सख़्त सोच" रही है, हालांकि यह मोदी की बयानबाज़ी से मेल नहीं खाती है। बांग्लादेश युद्ध, सियाचिन पर क़ब्ज़ा, सर क्रीक में समुद्री सीमा - ये भारत-पाकिस्तान संबंधों में सिर्फ़ तीन ख़ाके हैं जो अकेले कांग्रेस शासन की विरासत की गवाही दे देते हैं। यह याद रखना चाहिए कि कश्मीर की स्वायत्तता और भारत के वादों को कश्मीर के प्रति व्यवस्थित रूप से ख़त्म करने के दशकों के बाद ऐसा हुआ जब पचास के दशक से अस्सी के दशक के अंत तक केवल कांग्रेस सरकारों के तहत ऐसा हुआ था, जब भाजपा का ओर-छोर भी नहीं था।
इसलिए, बड़ा सवाल उस संकेत के बारे में है जो इमरान ख़ान दे रहे हैं जब वह कश्मीर समस्या को निपटाने के लिए मोदी में अपना विश्वास दोहराते हैं। इसके अलावा, उनके तीन उद्देश्य हैं  - एक, मोदी का चुनावी रैलियों में पाकिस्तान की अति आलोचना करने के प्रति उन्हें सावधान करना, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनकी राजनीतिक मजबूरियाँ क्या हैं; दो, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तानी नीतियों में तर्कशीलता की एक हवा पेश करना; और, तीन, अब और 23 मई के बीच आने वाले हफ़्तों में पाकिस्तान के साथ तनाव को बढ़ाने के लिए मोदी द्वारा की गई किसी भी चाल को विफ़ल करना, ख़ासकर तब अगर चुनाव में उन्हें हार का शिकार होना पड़ता है।

यह अंतिम बिंदु प्रासंगिक है यदि हम इस्लामाबाद द्वारा पिछले रविवार को उनके निर्णय के कारणों की जांच करें तो "विश्वसनीय खूफ़िया" और "प्रामाणिक जानकारी" जो कि प्रचारित करने के लिए उपलब्ध हैं जो इस बात की तसदीक़ करती हैं कि भारत अप्रैल के दूसरे छमाही में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुछ सैन्य क़दम उठा सकता है, एक बार जब भारत में चुनावों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, जिसमें से मोदी अंध राष्ट्रवाद को हवा देकर राजनीतिक फ़ायदा उठा सकते हैं।

इस सब में पेचीदा हिस्सा यह है कि इमरान ख़ान वास्तव में मोदी को एक राजनीतिज्ञ के रूप में मानते हैं। ऐतिहासिक रूप से, पाकिस्तान में यह धारणा है कि भाजपा एक "बनिए की पार्टी" है। लेकिन बीजेपी के पिछले पांच साल के शासन ने कुछ ऐसी धारणाओं को दूर कर दिया होगा। इमरान ख़ान को इस बात की जानकारी नहीं है कि मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उत्पाद हैं और जब तक वह संघ की उस गर्भनाल को नहीं तोड़ देते, वह पाकिस्तान की ओर एक विचाराधीन व्यक्ति नहीं हो सकते हैं।

अब, यह वह स्थिति है जहाँ मोदी-नवाज़ आदान-प्रदान और इस्लामाबाद में अजीत डोभाल और उनके समकक्ष, पूर्व एनएसए लेफ़्टिनेंट जनरल नासिर ख़ान जंजुआ के बीच बातचीत का सिलसिला आता है। भारतीय जनता इन आदान-प्रदान और बातचीत की सामग्री के बारे में कुछ नहीं जानती है। लेकिन आईएसआई इसे जानता है, रावलपिंडी में जीएचक्यू जानता है और इमरान ख़ान जानता है। (और, वास्तव में, मोदी और डोभाल भी जानते हैं।)
महत्वपूर्ण रूप से, इसलिए, पिछले 7 दशकों में पहली बार एक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने भारतीय आम चुनाव में हस्तक्षेप किया है और एक विशेष राजनीतिक नेता के लिए अपनी प्राथमिकता दिखाई है। यह अस्वीकार्य है। यह ब्लैकमेल है।

फिर भी, मोदी ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। भारतीय मतदाताओं के सामने इस परियोजना के लिए कुछ भी सकारात्मक नहीं है, फिर भी जान-बुझकर मोदी ने पाकिस्तान को अपने चुनाव अभियान का केंद्र बनाया और कांग्रेस को शर्मिंदा करने के लिए तथा बेरोज़गारी, कृषि संकट, रफ़ाल घोटाला, आदि जैसे ज्वलंत मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए इस कवायद को चुना। ऐसा कर, मोदी ने एक दरवाज़ा खोल दिया, और इसके माध्यम से इमरान ख़ान आसानी से अंदर घुस गए।

भारतीय आम चुनाव की पूर्व संध्या पर इमरान ख़ान ने जिस तरह की बातें कही हैं, उसे देखिए - वह मोदी (राहुल गांधी की बजाय) को उनके वार्ताकार के रूप में पसंद करते हैं; भारत में "मुस्लिममियत पर हमला किया जा रहा है"; भारत में मुसलमान दुखी हैं; मोदी इज़राइल के नेतन्याहू की तरह चुनावी रैलियाँ कर रहे हैं, "भय और राष्ट्रवादी भावना" का फ़ायदा उठा रहे हैं; जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति पर हमला किया जा रहा है; कि कश्मीरी राजनीतिक संघर्ष कर रहे हैं और क्योंकि इसका कोई सैन्य समाधान नहीं है; कि "अभी भी संभावना है कि अगर चुनाव अगले कुछ हफ्तों में मोदी के ख़िलाफ़ हो जाएँ तो भारत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुछ और सैन्य कार्रवाई कर सकता है" आदि-आदि।
किसी विदेशी देश के नेता के लिए ये इस तरह की टिप्पणी करना असाधारण बात है। लेकिन मोदी इसकी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते, क्योंकि सिर्फ़ उन्होंने ही भारत के लोकतंत्र पर इस पाकिस्तानी हमले को आमंत्रित किया है। ज़ाहिर है, पाकिस्तान मोदी और डोभाल को ब्लैकमेल कर रहा है। ऐसा लगता है कि यह 7 साल पहले सियोल में घटे मामले का मोदी का "ओबामा पल" है।

elections 2019
Narendra modi
Imran Khan
Ajit Doval
india-pakistan
Kashmir
USA
Barack Obama

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • Hijab controversy
    भाषा
    हिजाब विवाद: बेंगलुरु के कॉलेज ने सिख लड़की को पगड़ी हटाने को कहा
    24 Feb 2022
    सूत्रों के अनुसार, लड़की के परिवार का कहना है कि उनकी बेटी पगड़ी नहीं हटायेगी और वे कानूनी राय ले रहे हैं, क्योंकि उच्च न्यायालय और सरकार के आदेश में सिख पगड़ी का उल्लेख नहीं है।
  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License