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भारत
राजनीति
क्या राहुल की चिट्ठी को गंभीरता से लेंगे कांग्रेस शासित राज्य?
राहुल गांधी ने कांग्रेस शसित तीन राज्यों को चिट्ठी लिखी है। चिट्ठी में राहुल राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सरकार को यह कह रहे हैं कि वह अपने राज्य में मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून को संशोधित कर मूल रूप में जारी हुए भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करें।
अजय कुमार
20 Feb 2019
कमलनाथ, अशोक गहलोत और भूपेश बघेल (बाएं से दाएं)
Image Courtesy: Hindustan

आम चुनाव नजदीक आ गए हैं। जनता और नेता की बीच नजदीकी भी बढ़ रही  है। और भारतीय राजनीति में इसी नजदीकी से जनता का सबसे अधिक भला होता  है। राहुल गांधी भी जनता से नजदीकी बढ़ाने की कोशिश कर हैं। इसी क्रम में राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते कांग्रेस शसित तीन राज्यों को चिट्ठी लिखी है।  चिट्ठी में राहुल गांधी राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सरकार को यह कह रहे हैं कि वह अपने राज्य में मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून को संशोधित कर मूल रूप में जारी हुए भूमि अधिग्रहण कानून को  लागू करें। अपने राज्य में वन अधिकार कानून  को  ताक में रखकर आदिवासियों से हो रही बदसलूकियों को रोकें। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट में लंबित उन याचिकाओं पर जोरदार दखल दें जिसके याचिकर्ताओं  ने वन अधिकार कानून के वैधता पर सवाल उठाते हुए आदिवासी वन जमीन खाली करने को कहा है।  

साल 2013 में यूपीए द्वारा अपनाए हुए भूमि अधिग्रहण कानून  में मोदी सरकार ने कुछ बदलाव  करना चाहा। साल 2015 में मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून को काफी कमजोर कर दिया लेकिन किसानों द्वारा बड़े स्तर किये गए विरोध प्रदर्शन की वजह से मोदी सरकार को संशोधनों से पीछे हटना पड़ा।  जमीन का मुद्दा राज्य सरकार के अंतर्गत आता है। इसलिए केंद्र के कानून में भले ही कम बदलाव हुए लेकिन भाजपा समर्थित राज्य सरकारों ने उसे अपने हिसाब से बदल दिया।  जिसकी पीछे केंद्र सरकार पूरी तरह से खड़ी थी। 

पिछले कई सालों से मुख्यतया मोदी सरकार के दौर से  वन अधिकार कानून का भी खूब उल्लंघन  किया जा रहा है। वन अधिकार कानून के तहत  वनों पर आश्रित लोगों को कुछ अधिकार दिया गया है जिसके तहत  वे वनों पर अपने निर्भरता को आसानी से न गवां दें।  इस कानून का सबसे प्रमुख प्रावधान है कि बिना ग्राम सभा की सामूहिक अनुमति के किसी भी तरह के वन जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। मोदी सरकार के दौरान इस प्रावधान का खूब उल्लंघन किया गया है। बिना ग्राम सभा के अनुमति के बहुत सारे जमीनों की अधिग्रहण किया गया है। वन अधिकार कानून के उल्लंघन और अपने साथ किये जाने वाले बदसलूकियों से  परेशान होकर पिछले साल तकरीबन 50 हजार किसानों ने महाराष्ट्र में पैदल मार्च किया था। उस समय तो महाराष्ट्र सरकार ने किसानों के प्रस्ताव को मान लिया था।  लेकिन अभी तक उन प्रस्तावों पर कुछ भी नहीं हुआ है। इसे लेकर किसान एक बार फिर आंदोलित हैं।

राहुल गांधी के पत्र पर हमने मध्यप्रदेश में विकास पत्रकारिता से क्षेत्र से जुड़े राजु कुमार से बात की। राजु कुमार कहते हैं कि राहुल गांधी की चिट्ठी कांग्रेस के लिए एक बहुत जरूरी चिट्ठी है। इस चिट्ठी में लिखे विषयों को अनदेखा करने की वजह से ही मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार को हार का सामना करना पड़ा। मध्य प्रदेश में आदिवासियों की संख्या देश के सभी राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है। मध्य प्रदेश में तकरीबन 21 फीसदी  यानी 1 करोड़ 50 लाख आदिवासी रहते हैं। वन अधिकार कानून 2008 के तहत संरक्षित वनों पर रहने वाले आदिवासियों को मालिकाना हक दिए जाने का नियम है। यह मालिकाना हक उन्हें दिए जाएंगे जिन्हें 13 दिसम्बर 2006 से पहले वन भूमि पर रहने का वन अधिकारी समिति से प्रमाण पत्र मिला हो। इसके बाद यह प्रमाण पत्र ब्लॉक स्तर से जाते हुए जिला स्तर पर जाकर वन भूमि अधिकार पत्र में बदलता है।  यहां पर जाकर किसी आदिवासी को वन भूमि का मालिकाना हक मिलता है।  लेकिन इन पत्रों को अर्जी दाखिल करने में  बहुत अधिक तकनीकी और नौरशाही लूट का सामना करना पड़ता है। यह बाधाएं इतनी भारी है कि तकरीबन 15  लाख आदिवासियों ने वन भूमिका अधिकार पत्र की अर्जी लगाई लेकिन केवल 35 फीसदी किसानों की ही अर्जी पूरी हो पायी। इस तरह से इसे लेकर आदिवासियों में सरकार के खिलाफ बहुत अधिक गुस्सा था। जिसकी वजह से शिवराज सरकार को जाना पड़ा। जहाँ तक भूमि अधिग्रहण का मामला है तो स्पेशल इकोनॉमिक जोन के नाम पर  मध्य प्रदेश में बहुत अधिक जमीनें ली गयी।  लेकिन इनका इस्तेमाल नहीं किया गया।  भूमि अधिग्रहण कानून के  तहत होना यह चाहिए कि किसानों को उनकी भूमि लौटा दी जाए। लेकिन अब तक भूमि नहीं लौटाई गयी। इन सारे मसलों को अच्छे से निपटाते हुए  किसानों का मन जीता जा सकता है।  अब कांग्रेस सरकार पर निर्भर करता है कि वह इन मसलों को किस तरह निपटती है।  

छत्तीसगढ़ से हमने राजनैतिक विश्लेषक डॉक्टर राजू पांडेय से बात की। डॉ. राजू पांडेय कहते हैं वन अधिकार कानून के तहत वही समस्या छत्तीसगढ़ में भी है,  जो पूरी देश में है। प्रक्रियाओं को धड़ल्ले से बेकार कर दिया जाता है। कोयला खनन के नाम पर यहां वन अधिकार कानून बस किताबी बात बनकर रह गया  है। वन अधिकार कानूनों का धड़ल्ले से उल्लंघन होता है। हमारे यहाँ  विकास  मतलब उद्योग धंधों की मौजूदगी समझी जाती है। यहाँ भी  उद्योग धंधों के नाम पर जमीनों का जमकर अधिग्रहण होता है। और इसमें भूमि अधिग्रहण कानून का पालन किया ही जाए, यह कोई जरूरी नहीं है। भूमि अधिग्रहण कानून में एक प्रावधान  एनवायरनमेंट इम्पैक्ट  अससेमेंट  का है। जिसके तहत यह मूल्यांकन किया जाता है कि क्या अमुक भूमि का उपयोग किये जाने पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा या नहीं। यह प्रक्रिया सबसे भ्रष्ट तरीके से बर्बाद की जाती है। न तो अससेमेंट रिपोर्ट करने वाली एजेंसियां सही से अससेमेंट करती है और न ही इस नियम का पालन होता है कि रिपोर्ट की स्थानीय भाषा में भी जारी की जाए। इसके बाद किसी भी तरह की रिपोर्ट को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। उद्योग धंधे के लिए भूमि अधिगृहीत करने वाले लोग भूमि अधिग्रहण से जुडी ग्राम सभा की मीटिंगों में लोगों को खरीद लेते हैं।  और लोगों का मत उनके पक्ष में चला जाता है। इस तरह से संरचनागत कमियां बहुत अधिक है।  और कोंग्रस इसे ठीक कर पाएगी।  ऐसा दूर-दूर तक आसार नहीं दिखता। 

राजस्थान के स्थानीय पत्रकार जितेंद्र चाहर कहते है कि राजस्थान में भूमि अधिग्रहण को लेकर पिछले छह सालों से नवलगढ़ इलाके में आंदोलन चल रहा है।  नवलगढ़ इलाके में 3 सीमेंट प्लांट के लिए तकरीबन 72 हजार उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है। जिसकी वजह से तकरीबन 18 गाँवों से लोगों का विस्थापन भी तय है।  अगर राज्य सरकारें राहुल गाँधी की बातों को गंभीरता से लेती होंगी तो जरूर मानेंगी। लेकिन ऐसा लगता नहीं है। वन अधिकार कानून के तहत राजस्थान में भी वन भूमि अधिकार पत्र के वायदे कई सालों से लंबित पड़े हैं। इसके साथ अरावली  में गैरक़ानूनी खनन जारी है। जिस पर कोई ध्यान नहीं  देता है। 

इस तरह राहुल गांधी की चिठ्ठी भले ही जनता से जुड़ती दिखती हो लेकिन जिन तीन बड़े राज्यों के नाम यह चिट्ठी लिखी गयी है, वहां वन अधिकार और भूमि अधिग्रहण को लेकर काफी गंभीर परेशानियां है। जिनका जवाब मिल जाए तो राहुल गांधी अगले चुनाव के लिए मजबूत दावेदारी पेश कर सकते हैं।

 

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