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भारत
राजनीति
क्या राज्यपाल साधारण भाजपा प्रवक्ता के रूप में योगी सरकार का वचाव कर रहे है ?
यूपी के माननीय राज्यपाल लोकतान्त्रिक सुचिता ,संवैधानिक मर्यादा और संवैधानिक नैतिकता सरकार में कौन सी पार्टी है उस हिसाब से तय करते है |
मुकुंद झा
14 Apr 2018
UP
image courtesy : catchnews.com

यूपी के माननीय राज्यपाल लोकतान्त्रिक सुचिता ,संवैधानिक मर्यादा और संवैधानिक नैतिकता सरकार में कौन सी पार्टी है उस हिसाब से तय करते है | उत्तर प्रदेश में वो भरोसा एक बार फिर से तार तार हो रहा है, इस बार इसके लिए योगी आदित्यनाथ की सरकार सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है, इस बार बलात्कार के साथ साथ एक मजबूर पिता की हत्या का मामला भी है | तो क्या माना जाए, दो सरकारों का एक-सा ही वर्ताव है | गंभीर मामलों में ढिलाई बरतने के तौर-तरीके में कोई बदलाव नहीं आया है I प्रचंड बहुमत की सरकार हो तो अपने दुलारों को बचाने का खेल अश्लीलता के साथ सामने आया है, परन्तु राज्यपाल के व्यवहार में पूर्ण रूप से बदलाव है  |

सपा के विधयक पर आरोप लगे तो उससे लोकतंत्र खतरे में परन्तु अगर भाजपा के विधायक पर कोई भी आरोप हो तो उससे लोकतान्त्रिक सुचिता ,संवैधानिक मर्यादा और संवैधानिक नैतिकता जैसी कोई भी चीज़ नहीं होती है | राज्यपाल बलत्कार के आरोपी विधायक के मामले में सरकार के साथ खड़े दिख रहे हैं |

भारतीय राजनीती में कई मुद्दों पर पार्टीयों के रुख में अपने सुविधा और समय अनुसार परिवर्तन सामान्य घटना है | दल हमेशा ही अपने दल या दल के कार्यकर्ताओं पर लगे आरोपों पर मौन रहते हैं और विपक्षी पर हमलावर रहती है | जोकि हमें यूपी के तत्कालिक उन्नाओ रेप केस में मिल रहा है | जहाँ भाजपा पूरी तरह मौन वही समाजवादी दल सहित अन्य विपक्षी दल पूरी तरह से हमलावर हैं | ज़बकी हमें ये याद है कि फरवरी 2017 में इसी तरह का मामला गायत्री प्रजापति का मामला समने आया था, वहां सपा पूरी तरह से आज की भजपा की मुद्रा में थी और कोर्ट के फटकर के बाद उसकी गिरफ्तारी हुई थी | ये दलों के लिए सामन्य घटना है पर जब ये प्रवर्ती संवैधानिक पदों और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे लोगो में दिखने लगे तो ये एक बड़ी चिंता का कारण जो जाता है |

आज यूपी के राज्यपाल उन्नाओ के मामले में पूरी तरह से सरकार के पक्ष में और बचाव में खड़े हैं,जो की ठीक इसी तरह के गायत्री प्रजापति के मामले उन्होंने तात्कालिक सपा सरकार को पत्र लिखा और कई बार सार्वजनिक मंचो से भी सरकार की आलोचना की थी | उन्होंने अपने पत्र में तात्कालिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कड़े शब्दों में करवाई करने के लिए कहा था | उनके पत्र को ध्यान देना जरूरी है | उस में उन्होंने कहा था की ऐसे मामलो में करवाई न करने से लोकतान्त्रिक सुचिता ,संवैधानिक मर्यादा और संवैधानिक नैतिकता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं I

परन्तु दिलचस्प है कि जब भाजपा के विधायक पर भी रेप और जान से मरने की धमकी  देने जैसा गंभीर आरोप हैं इस के बाबजूद भी  ‘माननीय राज्यपाल राम नाइक’ की चुप्पी गंभीर सवाल उठाती है | साथ ही उन्होंने एक कार्यक्रम में भाजपा सरकार का पक्ष लिया और सरकार का वचाव किया | जो कि उनके दोहरे  चरित्र को दर्शाता है | जब वो सपा सरकार में राज्यपाल थे तो उन्हें सुचिता ,मर्यादा और नैतिकता का ख्याल था , परन्तु भाजपा शासन आते ही लगता है जैसे वो ये साड़ी मर्यादाए भूल गये | क्योंकि जब वो भाजपा के विधायक पर भी उतने ही या उससे भी ज़्यादा गंभीर आरोपो पर चुप रहते है तो वो उनके और राज्यपाल के निष्पक्ष व्यवहार पर सवाल उठाता है |

दोनों मामलों में ही प्रदेश की व्यवस्था को तारतार किया है | परन्तु ये और भी गंभीर है कि जब संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल भी सुविधा अनुसार घटनाओं को देखें और उन पर टिप्पणी करें ,क्योंकि उन्हें दलगत राजनीती से परे मान जाता है | लेकिन इस घटना में राज्यपाल की भूमिका किसी भी रूप में निष्पक्ष नहीं बल्कि राज्यपाल एक साधारण भाजपा प्रवक्ता के रूप में सरकार के पक्ष में वयान दे रहे हैं | जो की स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिऐ ठीक नही है क्योंकि सरकारों के कार्यप्रणाली को देखने के लिए ही राज्यपाल की नियुक्ति होती है और राजनीतक मौसम के हिसाब से व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती हैं |

राम नईक के पुरे जीवनकल को देखे तो वो बचपन से ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ता रहे हैं | उसके बाद उन्होंने अपने राजनितिक जीवन की शुरुआत भारतीय जन संघ से की और बाद में वो भाजपा के भी सक्रिय कार्यकर्ता और नेता रहे | वो भाजपा की और जन संघ के कई महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे हैं | वो कई बार महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य रहे और भाजपा के टिकट पर 3 बार लोकसभा पहुँचे | वो अटल सरकार में मंत्री भी रहे परन्तु वह 2009 के चुनाव में अभिनेता और कांग्रेस के उम्मीदवार गोविंदा से चुनाव हार गये |

इसके बाद 2014 में भाजपा शासित मोदी सरकार ने उन्हें यूपी का राज्यपाल नियुक्त किया ,लोगो ने इसके पीछे उनकी कट्टर हिंदुत्व वाली छवि को मुख्य विशेषता बतया था उसके बाद से उन्होंने कई बार विवादित वयानों के कारण से चर्चा में रहे हैं | उन्होंने राम मन्दिर को लेकर भी कहा था कि राम मन्दिर का निर्माण जल्दी से होना चाहिए क्योंकि इससे हिन्दुओ की भावना जुड़ी हुई है | जबकी ये मुद्दा अभी कोर्ट में विचाराधीन है, ऐसे मामलों में संवैधनिक पद पर बैठे व्यक्ति से इस तरह की टिपण्णी की अपेक्षा नहीं की जाती है |

 उनके व्यवहार से लगता है कि वो भाजपा के कार्यकर्ता और एक संवैधनिक पद के बीच का अंतर नही कर पाए हैं |

क्या ऐसे ही योगी सरकार ‘उत्तर प्रदेश’ को ‘उत्तम प्रदेश’ बनाएगी?

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