NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या सशक्त क्षेत्रीय दल के अभाव में कांग्रेस-बीजेपी का ‘बंधक’ बन गया है उत्तराखंड!
चुनाव 2019 : उत्तराखंड की पांच सीटें राज्य के जल-जंगल-ज़मीन से जुड़ी हुई हैं। इन पांच सीटों से देश को 60 फीसदी पानी देने वाली नदियों का भविष्य तय होगा। लेकिन यही मुद्दा यहां नदारद है।
वर्षा सिंह
07 Apr 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : Patrika

आने वाली 11 अप्रैल को एक छोटा सा हिमालयी राज्य उत्तराखंड अपनी पांच सीटों के लिए लोकतंत्र के महापर्व में शरीक होने जा रहा है। ये पांच सीटें राज्य के जल-जंगल-ज़मीन से जुड़ी हुई हैं। इन पांच सीटों से देश को 60 फीसदी पानी देने वाली नदियों का भविष्य तय होगा। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में देश के पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संभालने वाला, 70 फीसदी वन क्षेत्र वाला राज्य, पांच सीटों के लिए वोट डालेगा। हिमालयी राज्य के लिए ये पांच सीटें कितनी महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन पहाड़ की वादियों में जो चुनावी गूंज सुनाई दे रही है, उसमें पाकिस्तान, पुलवामा, आतंकवाद बनाम राष्ट्रवाद, रफ़ाल, मैं चौकीदार हूं, चौकीदार चोर है, सरीखी बातें ही शामिल हैं। मोदी यहां पुलवामा हमले के बहाने सैनिक परिवारों का वोट मांगते हैं, कांग्रेस को नीचा ठहरा कर खुद को अच्छा बताकर वोट मांगते हैं। इसका ठीक उलट राहुल गांधी और उनकी पार्टी कर रही है। या फिर वे एक-दूसरे के घोटालों की परतें उघाड़ कर चुनाव लड़ रहे हैं।

चुनाव में देश और के भविष्य से जुड़े असली मुद्दे सिरे से नदारद हैं। लोकतंत्र का पर्व क्या सिर्फ बीजेपी-कांग्रेस हो गया है। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के इस दौर में उत्तराखंड जैसे युवा राज्य में एक तीसरे विकल्प की, तीसरे मोर्चे की, सख्त कमी खल रही है। क्षेत्रीय दल अपने क्षेत्र के मुद्दों की कुछ बात करते। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस जैसे और भी उदाहरण हैं। क्या वजह है कि आंदोलनों के प्रदेश में कोई क्षेत्रीय ताकत मौजूद नहीं है।

राज्य में सीपीआई-एमएल के नेता इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि सबकुछ भाजपा-कांग्रेस के बीच में समेटने की कोशिश की जाती है। एक वैकल्पिक राजनीतिक मोर्चे की जरूरत है। वामपंथी पार्टियों ने इस दिशा में कोशिश भी की है। इंद्रेश कहते हैं कि तीनों वाम दल मिलकर दो सीटों टिहरी और नैनीताल लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं। सामूहिक रूप से प्रचार अभियान भी कर रहे हैं। वे कहते हैं कि राज्य के भीतर हमारा दूरगामी लक्ष्य है कि संघर्षों का मोर्चा बने। इंद्रेश कहते हैं कि उत्तराखंड को चुनावी मोर्चे से ज्यादा आंदोलनों और संघर्षों के मोर्चे की जरूरत है। ऐसा मोर्चा ही चुनाव में जाए तभी परिणाम दे सकने की स्थिति में होगा।

उत्तराखंड में क्षेत्रीय दल के रूप में मौजूद रहा उत्तराखंड क्रांति दल अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। राज्य आंदोलन से जुड़ी इस पार्टी से स्थानीय लोगों में भावनात्मक लगाव भी था। लेकिन भीतरी टूटफूट की शिकार पार्टी जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पायी। पार्टी के अध्यक्ष दिवाकर भट्ट कहते हैं कि थोड़ी हमारी कमजोरिया रहीं, थोड़ा जनता ने भी समझने में भूल करी। राज्य बनने के बाद यदि पब्लिक का समर्थन मिल जाता, तो हम यहां की क्षेत्रीय ताकत होते। पुराने दिनों को याद कर दिवाकर कहते हैं कि राज्य आंदोलन के समय एक मात्र हमारी ही पार्टी थी, जिसने राज्य बनाने में अहम भूमिका निभायी। वे कहते हैं कि फौजी बहुल प्रदेश होने की वजह से हमारे राज्य में राष्ट्रीयता की भावना अधिक है और क्षेत्रीयता की कम। क्योंकि सैनिक राष्ट्रवादी होते हैं। लेकिन आज हम अपने घर को, अपने राज्य को ही नहीं बचा पा रहे हैं। दिवाकर भट्ट कहते हैं कि यहां के लोगों में रीजनल थॉट नहीं है। वे पहले जवाहरलाल नेहरू का गुणगान करते थे, अब मोदी की भक्ति करते हैं।

दिवाकर भट्ट कहते हैं कि हमारी कोशिश होगी कि इस राज्य को बचाने की लड़ाई लड़ें। गांव खत्म हो रहे हैं। स्कूलों में ताले पड़ रहे हैं। मानव रहित गांवों वाला राज्य अपने सीमाओं की रक्षा कैसे करेगा। यूकेडी का अस्तित्व बचाने के लिए भट्ट गांवों में पार्टी को मजबूत करने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि हम सड़कों पर मोर्चा खोलते रहे, जेल जाते रहे, लेकिन अब गांवों का रुख़ करेंगे।

यूकेडी को लेकर सीपीआई-एमएल नेता इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि सत्ता लोलुपता और अवसरवादिता के चक्कर में यूकेडी ने अपनी ज़मीन गंवा दी। मुद्दों पर संघर्ष करने की जगह वे कभी कांग्रेस के पीछे चले गए, कभी भाजपा के पीछे। जो वहां नहीं खप पाए तब वो यूकेडी हो गए।

वे पार्टी अध्यक्ष दिवाकर भट्टा का ही उदाहरण देते हैं, जो वर्ष 2007 में भाजपा सरकार के साथ मंत्री रहे, 2012 में बीजेपी सिंबल पर चुनाव लड़े, 2017 में बीजेपी का टिकट नहीं मिला, फिर निर्दलीय चुनाव लड़े और तब भी ऐलान किया कि अगर भाजपा को जरूरत होगी तो मैं चुनाव जीतकर भाजपा का समर्थन करूंगा। जब वे चुनाव हार गए तो फिर यूकेडी में शामिल हो गए।

उत्तराखंड में कोई क्षेत्रीय ताकत क्यों नहीं तैयार हो सकी। इस पर वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं कि जो संगठन यहां मुद्दों की लड़ाई लड़ते हैं, उनमें राजनीतिक शक्ति नहीं है, वे चुनाव की राजनीति में नहीं हैं। वे भी यूकेडी का उदाहरण देते हैं जो सत्ता की होड़ में शामिल हो गया। बहुगुणा कहते हैं कि हमारे राज्य में तीसरे विकल्प का यहां अभाव तो है, तीसरा विकल्प होता है तो पारंपरिक दलों को भी मजबूरी में ये मुद्दे उठाने पड़ते हैं, क्योंकि क्षेत्रीय दल अपने राज्य की बुनियादी सवालों को उठाते हैं।

क्या जनता ही बीजेपी और कांग्रेस को महत्व देती है। बहुगुणा इस पर सहमति नहीं जताते। वे कहते हैं कि जब कोई क्षेत्रीय दल सक्रिय ही नहीं हैं तो इसमें जनता का क्या दोष। राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं कि जिस राज्य में शराब के खिलाफ़ आंदोलन हुए, पर्यावरण के लिए आंदोलन हुए, चिपको जैसा अहम आंदोलन हुआ, उस राज्य में मौजूद संगठनों में अभी इतनी ताकत नहीं आई कि वे क्षेत्रीय दल की हैसियत से चुनावों में जा सकें।

चार अप्रैल को औरतों की मुहिम में शामिल हुईं, उत्तराखंड महिला मोर्चा की अध्यक्ष कमला पंत कहती हैं कि क्षेत्रीय ताकत बनाने के लिए हमें कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी। वे कहती हैं कि देश के संदर्भ में हो या राज्य के, जिस तरह के कानून आ रहे हैं, उदाहरण के तौर पर वन कानूनों को बदलने की बात आ रही है, हमें ऐसे मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाने की जरूरत है। महिला मोर्चा की नेता कहती हैं उत्तराखंड में तो महिलाओं की सुरक्षा का सवाल तेज़ी से बढ़ रहा है, जो पहले यहां कभी मुद्दा नहीं था। इसके साथ ही जल-जंगल-जमीन के मुद्दे हैं। राज्य की ज़मीन हमारे हाथ से निकलती जा रही है। जिसे सामान्य आदमी नहीं खरीद रहा। वे संघर्ष कर रहे संगठनों की एकता पर बल देती हैं।

कमला पंत का एक सुझाव भी है कि एक बार कांग्रेस को जिताइये, एक बार भाजपा को जिताइये, इससे अच्छा है कि आप नोटा चुनें, इसके ज़रिये ये बता सकें कि हमें बेहतर प्रत्याशी चाहिए, जो राज्य और देश में बदलाव ला सके। एक ऐसी नई राजनीति की जरूरत आज सब महसूस कर रहे हैं।

उत्तराखंड में जिस तरह संसाधनों की लूट हो रही है। जमीन, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन, बेरोजगारी के जो सवाल हैं, राज्य बनने के बाद और विकराल हो गए हैं। पहाड़ के मुद्दों के लिए पहाड़ की पार्टी की जरूरत महसूस होती है।

केंद्र की ताकत क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर क्षेत्र, राज्य और देश की समस्याओं को हल करने का डिसेंट्रलाइज़ फॉर्मुला बन सकती हैं। भारत जैसे विविधता वाले देश में शायद इसकी ज्यादा जरूरत है। हिंदूवादी पार्टी बनाम कांग्रेस पार्टी के बीच में एक बड़ा स्पेस है, जहां क्षेत्रीय दल या तीसरी ताकत बुनियादी सवालों और विकास की बात कर सकें।

UTTARAKHAND
2019 आम चुनाव
General elections2019
2019 Lok Sabha Polls
BJP
Congress
CPI(ML)
ukd

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License