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भारत
राजनीति
क्यों मोदी और संघ परिवार गोलवलकर को ‘भुला’ देना चाहते हैं?
पीएम मोदी ने आरएसएस के पूर्व प्रमुख गोलवलकर की हालिया 114वीं जयंती का कोई उल्लेख नहीं किया है। लगता है कि इसके पीछे यह विचार काम कर रहा है कि निजी तौर पर उनके ‘सारतत्व’ को लागू करते रहना है, जबकि सार्वजनिक तौर पर इसके उल्लेख की आवश्यकता नहीं है।
सुभाष गाताड़े
26 Feb 2020
क्यों मोदी और संघ परिवार गोलवलकर को ‘भुला’ देना चाहते हैं?

इस बार माधव सदाशिव गोलवलकर की 114 वीं जयंती बिना किसी धूम-धाम के सम्पन्न हो चुकी है। एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बार में भगवा पार्टी के दोयम दर्जे के नेता की ओर से यदि एक भूले-भटके लेख को छोड़ दें तो, ऊँचे पदों पर बैठे हुए किसी भी व्यक्ति ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इस दूसरे प्रमुख को याद किया जाना आवश्यक नहीं समझा, जिन्होंने आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार से अपना पदभार ग्रहण किया था।

दिलचस्प बात तो ये है कि ट्विटर पे चहकने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को दिल्ली के हुनर हाट में अपनी लिट्टी चोखा प्रतियोगिता के बारे में ट्वीट करने का समय तो निकल आता है, लेकिन उन्हें अपनी टाइमलाइन पर उस दिन गोलवलकर के बारे में एक भी लाइन लिखने की फुर्सत नहीं निकल पाई। देखने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, क्योंकि अपनी पुस्तक में जिसका शीर्षक ‘ज्योतिपुंज’ है में मोदी जी ने गोलवलकर को लेकर चालीस पेज समर्पित किये हैं, जिसमें उन्हें “महानतम सामाजिक कार्यकर्ताओं में से एक” सिद्ध किया गया है, जिन्होंने मातृभूमि की सेवा में अपने जीवन की आहुति दी है”। अपनी किताब में मोदी लिखते हैं “गोलवलकर गुरूजी का सम्पूर्ण जीवन ही समर्पण का बेहतरीन नमूना है। गुरुजी के पास संयम, संकल्प और दृढ़ता के रूप में वे सभी गुण मौजूद थे, जिसकी हर उस इंसान से अपेक्षा की जाती है, और जो अपने लक्ष्य के निमित्त ही जिन्दगी जीता है।“

क्या इस बार यह चुप्पी मोदी या उनके वरिष्ठ साथियों की ओर से अनजाने में हो गई या ऐसा जानबूझकर किया गया?

इस बात पर विश्वास करना लगभग नामुमकिन है कि सामूहिक रूप से सब के सब अनजाने में ही आरएसएस के सबसे लम्बे समय तक संघ प्रमुख के रूप में सेवारत (1940-1973) को भूलवश याद कर पाने में असफल रहे।

ऐसा कैसे हो सकता है कि वे एकाएक से एक ऐसे इंसान को विस्मृत कर दें, जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर डॉक्टर हेडगेवार ने जो इसके संस्थापक और पहले प्रमुख रहे हों, ने संगठन के “प्रमुख वास्तुकार” के रूप में चुना हो? बाहरी पर्यवेक्षकों और आरएसएस के अंदरूनी सूत्र इस बात को लेकर एकमत हैं कि गोलवलकर को बेहद अहम किरदार कहा जा सकता है, जिन्होंने हिंदुत्व के प्रोजेक्ट के लिए सैद्धांतिक पृष्ठभूमि तैयार की, और इसके विशाल संगठनात्मक नेटवर्क की आधारशिला रखी। उनके बनाए गए बीज रूप में आज तक जो हिंदुत्व के प्रति निष्ठा रखने वाले अनुषांगिक (संबद्ध) संगठनों की जो भरमार है, उसमें से जो प्रत्येक भिन्न भिन्न समाज के वर्गो तक अपनी पहुँच बना पाने में सफल रहे हैं, के पीछे गुरूजी का ही योगदान है।

मात्र डेढ़ दशक पहले ही संघ परिवार और उससे जुड़े सभी संगठनों ने मिलकर गोलवलकर जयंती को वृहद पैमाने पर “सामाजिक समरसता” की केन्द्रीय थीम पर मनाया था। इस अवसर पर देश भर में ब्लॉक स्तर पर "हिंदू रैलियों" का आयोजन किया गया था। आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने इस विषय में लिखा था कि “श्री गुरूजी के विचारों और विजन को जन-जन तक प्रचार-प्रसार के लिए” सेमिनारों, संगोष्ठियों और व्याख्यानों को आयोजित किया गया।

प्रोफेसर जी पी देशपांडे के अनुसार, जिन्होंने उस समय ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित अपने एक लेख में इसके बारे में विस्तार से लिखा है, जिसमें वे बताते हैं कि यह वह दौर था जब “गोलवलकर के महिमामंडन” ने उन्हें “इन्सान के स्तर से कुछ ऊपर विराजमान” करने का काम किया था। देशपांडे इस लेख में गोलवलकर के नाम के साथ "श्री" जोड़ने के बारे में बता रहे थे, एक पदवी जिसे लगाने से वे "करीब-करीब अवतार जैसी चीज के रूप में पवित्र" नजर आने लगते हैं।

“महाराष्ट्र के संदर्भ में देखें तो इसका अलग ही महत्व और अर्थ नजर आता है। आध्यात्मिक गुरुओं को अक्सर 'श्रीगुरुजी' के नाम से पुकारने की परम्परा है। इस प्रकार से आप यहाँ पर भी देख सकते हैं कि गोलवलकर को बेहद महीन तरीके से महिमामंडित करने की कोशिश की गई। यहाँ पर उनके साथ जो नई पदवी जोड़ी गई है, वह उन्हें मानवीय स्तर से थोड़ा ऊपर दिखाने का प्रयास है। ”

शायद श्री गुरुजी के इस आहिस्ता से 'अद्रिश्यीकरण' किये जाने के संकेत आरएसएस सुप्रीमो मोहन भागवत के 2018 में दिल्ली में आयोजित "भारत का भविष्य" नामक तीन दिवसीय व्याख्यान की श्रृंखला में देखा जा सकता है। अपनी तरह के पहले-पहल कार्यक्रम के रूप में इसे प्रस्तुत किया गया था, जिसमें अधिकाधिक लोगों के बीच पहुँचने का यह एक कार्यक्रम था। इसके जरिये लोगों को यह समझाने के लिए कि "विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर संघ के परिपेक्ष्य" और "इसकी विचारधारा और कार्य के बारे में गलतफहमी को स्पष्ट करने के लिए" आयोजित किया गया था।

इस दौरान एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के संवाददाता ने इस बात का संज्ञान लिया और गिनकर रखा कि किस प्रकार से उनके भाषण में सबसे अधिक (45) बार, हेडगेवार का नाम सबसे अधिक बार लिया गया था, जबकि पहले दो दिनों के दौरान सिर्फ एक बार गोलवलकर का उल्लेख किया गया था। सबसे दिलचस्प यह रहा कि कि भागवत ने “अपने पहले दो दिनों के व्याख्यान में 32 अलग-अलग हस्तियों को कम से कम 102 बार उधृत किया, जिससे यह दिखाया जा सके कि किस प्रकार से संघ देश के सर्वश्रेष्ठ विविध स्रोतों को अपने में समाहित करने को लेकर तत्पर है।” आरएसएस सुप्रीमो ने तो यहां तक कि “महात्मा गांधी, बी आर अंबेडकर, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, एमएन रॉय, एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खान और बुद्ध सहित जरथुस्त्र, रामकृष्ण परमहंस, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, गुरु नानक और शिवाजी के साथ-साथ संघ के बेहद कम सार्वजनिक जीवन में प्रचलित व्यक्तियों का भी अपने भाषण में उल्लेख किया।”

इस सबमें गोलवलकर अनुपस्थित बने रहे, जिससे यह स्पष्ट हो चला था कि ये सिर्फ भागवत ही नहीं बल्कि संघ परिवार के अन्य सभी प्रमुख व्यक्तित्व भी सार्वजनिक स्तर पर उनके नाम को सामने रखने को लेकर कुछ अलग ही सोच रखते थे। कार्यक्रम के तीसरे दिन इस बात का खुलासा हो सका, जब सवाल-जवाब के सत्र के दौरान मालूम चला कि आरएसएस की मंशा गोलवलकर की विवादास्पद पुस्तक, बंच ऑफ़ थॉट्स के साफ़-सुथरे संस्करण को पेश करने को लेकर है। यह पुस्तक मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को “आंतरिक खतरों” के रूप में चिन्हित करती है, और इस प्रकार उनके नाम के साथ उनकी सामूहिक बेचैनी को साबित करती है।

‘आंतरिक खतरों’ पर अध्याय, जिसमें मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट शीर्षक वाले तीन उपखंड हैं, वह कुछ इस तरह आरंभ होता है: “दुनिया के कई देशों के इतिहास का यह दुखद सबक रहा है कि देश की सुरक्षा के लिए खतरा, देश के भीतर शत्रुतापूर्ण तत्वों से कहीं अधिक होता है, बजाय कि बाहरी आक्रमणकारियों से। दुर्भाग्यवश राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर जो पहला सबक होना चाहिए, और जबसे अंग्रेज हमारी भूमि को छोड़कर गए हैं, इसकी हमारे देश में लगातार अनदेखी की गई है।

पुस्तक में भारतीय संविधान को लेकर भी विवादास्पद बयान दिए हैं और उसी अनुपात में स्वतंत्रता संग्राम को लेकर और उसमें भाग लेने वाले नायकों को भी कलंकित करने का प्रयास किया गया है। भागवत इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि गोलवलकर द्वारा पेश किये गए मानव-विरोधी समाधानों को यदि नए रंग-रोगन में सजाये गए आरएसएस के रूप में प्रस्तुत किया गया तो यह काफी महँगा साबित होने जा रहा है।

भागवत की ओर से इस बाबत पुस्तक के एक नए संस्करण की बात कही गई, जो कि काफी हद तक आश्वस्त करने वाला नहीं लगता है: जहाँ तक बंच ऑफ़ थॉट्स का सवाल है, उसमें लिखित प्रत्येक कथन का अपना समय काल और परिस्थिति से संदर्भित है... उनके स्थायी विचारों को एक लोकप्रिय संस्करण में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें से हमने उन सभी टिप्पणियों को हटा दिया है, जिनका अस्थाई सन्दर्भों से सरोकार था। हमने सिर्फ उन्हीं को इसमें शामिल किया है जिनका सदियों तक महत्व बना रहने वाला है। आपको वहां पर वे टिप्पणियाँ ‘मुस्लिम एक दुश्मन है’ देखने को नहीं मिलेंगी।

एक विश्लेषक के अनुसार, यह कहना कुछ उसी तरह से है जैसे कि हिटलर के मेन काम्फ  के शुद्धीकरण किये गए संस्करण की तरह, जिसमें यहूदियों को सीधा निशाना बनाए जाने वाले सन्दर्भों को हटा दिया जाये, और इसे कहीं बेहतर ग्राह्य बनाया जा सके और हिटलर की छवि को कहीं अधिक प्यारा बनाकर पेश किया जाये।

और इस प्रकार यह समझ पाना कोई राकेट साइंस है कि संघ सार्वजनिक रूप से गोलवलकर से दूरी क्यों बनाना चाहता है।

उनके जीवन की पगडंडियों पर एक सरसरी नज़र से इसे और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।

याद रखें गोलवलकर का जीवनकाल विश्व इतिहास के उस अवधि के दौरान का है जो अपने आप में कई मायनों में विलक्षण रहा है। यह वह दौर था, जब नाजीवाद और फासीवाद पश्चिमी यूरोप को निगलने के लिए तैयार थे, एक ऐसा दौर जहाँ पर तीसरी दुनिया के कई देशों में राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्ष अपनी अंतिम अवस्था में चल रहे थे। यह वह समय था जब सोवियत रूस में समाजवादी निर्माण के महान प्रयोग जारी थे, और साथ ही साम्यवादी-नेतृत्व में चलने वाले धारदार आंदोलनों के बढ़ते ज्वार उस युग की विशेषताओं को परिभाषित कर रहे थे।

यदि सिंहावलोकन करें तो कह सकते हैं कि यह विश्व इतिहास में एक ऐसा मोड़ था जब सामंतवाद और उपनिवेशवाद वाली पुरानी दुनिया चरमरा रही थी और एक नई दुनिया उभर कर सामने आ रही थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि अपने अजीबोगरीब जीवन-दर्शन के चलते, जो 'हिंदू धर्म की गौरवशाली परंपराओं' के आधार पर एक हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए लालयित थे, और जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के समकक्ष उनसे कहीं अधिक बड़े विरोधी के रूप में मुसलमानों को चिन्हित करते थे, और जो नाजीवाद-फासीवाद की ओर से किये गए 'सोशल इंजीनियरिंग' के प्रयोगों से प्रेरणा लेकर, गोलवलकर इतिहास के साथ कदमताल मिला पाने में पूरी तरह से विफल रहे। वास्तव में अपनी इसी कट्टरता के चलते उन्होंने न सिर्फ खुद को औपनिवेशिक विरोधी संघर्षों से दूर रखा, बल्कि अपने संगठन को भी कोई सकारात्मक कार्यक्रम तैयार कर इसमें भाग लेने के लिए प्रेरित न कर सके।

हिंदुत्व की अपनी अवधारणा को लेकर गोलवलकर की ओर से पहला सैद्धांतिक योगदान उनके वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड (1938) शीर्षक वाले एक पर्चे के रूप में दिखाई देता है। हिटलर की ओर से जारी यहूदियों की 'जातीय सफाई'  के प्रति जिस प्रकार से सीधे-सीधे शब्दों में प्रशंसा की गई है, और हिंदू नस्ल के भीतर 'विदेशी नस्लों' को समाहित कर लेने का जिस प्रकार का बेशर्मी भरा प्रस्तावक प्रस्तुत किया गया, जिसे बाद के दिनों में आरएसएस के नेताओं ने अपनी पूरी ताकत इस धारणा को बनाने में लगा दी कि यह पुस्तिका ही गोलवलकर द्वारा नहीं लिखी गई थी, बल्कि यह तो मात्र बाबाराव सावरकर द्वारा राष्ट्र मीमांसा का अनुवाद भर था।

यह अलग बात है कि वी ओर अवर नेशनहुड डिफाइंड की अपनी प्रस्तावना में 22 मार्च 1939 को गोलवलकर स्वयं राष्ट्र मीमांसा को अपने लिए "प्रेरणा और सहायता के मेरे प्रमुख स्रोतों में से एक" बताते हैं। अमेरिकी विद्वान जीन ए क्यूरन जिन्होंने पचास के दशक की शुरुआत में ही आरएसएस पर अपना विशद अध्ययन किया, ने संघ के साथ हमदर्दी रखते हुए मिलिटेंट हिन्दुइज्म इन इण्डियन पॉलिटिक्स: अ केस स्टडी ऑफ़ द आरएसएस (1951) शीर्षक से एक किताब लिखी। इस पुस्तक में वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि 77 पेज की इस किताब को गोलवलकर ने ही 1938 में लिखा था जब वे हेडगेवार द्वारा आरएसएस के महासचिव नियुक्त किये गए थे, और और उन्होंने इसे आरएसएस की "बाइबल" करार दिया था।

इसके अलावा एक तीसरी पृष्ठभूमि भी है जहाँ गोलवलकर का मनुस्मृति के अध्यादेशों से प्रेम उन्हें अपने समय से बहुत पीछे ले जाता हुआ साबित करता है। जहाँ एक ओर नव-स्वतंत्र भारत के निर्माता एक ऐसे संविधान के निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे थे, जिसकी आधारशिला लाखों भारतीयों के लिए सकारात्मक भेदभाव के विशेष प्रावधानों के साथ व्यक्तिगत अधिकारों की अनुलंघनीयता पर आधारित थे, जिन्हें आजतक धार्मिक धर्मग्रंथों के हवाले से किसी भी मानवाधिकारों से वंचित किया जाता रहा था। वहीँ दूसरी ओर यह गोलवलकर ही थे, जो स्वतंत्र भारत के संविधान के रूप में मनुस्मृति का अनुमोदन कर रहे थे। 30 नवंबर 1949  को ऑर्गनाइजर शिकायत करता है: “लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत में हुए अद्भुत संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु द्वारा रचित कानून तो स्पार्टा के लाइकुरस या फारस के सोलोन से काफी पहले ही लिख दिए गए थे। कानून के रूप में प्रतिष्ठित मनुस्मृति में वर्णित कानून आज तक दुनिया में प्रशंसा भाव से देखे जा रहे हैं और अपने लिए सहज आज्ञाकारिता और अनुरूपता प्राप्त कर रहा है। लेकिन हमारे संविधान के विद्वान जनों के लिए इसका कोई मोल ही नहीं है।”

जब चालीस के दशक के अंत में अम्बेडकर और नेहरु के नेतृत्व में हिन्दू महिलाओं को सीमित अधिकार दिए जाने सम्बन्धी हिंदू कोड बिल को पारित किये जाने सम्बन्धी कोशिशें की गईं। इस बिल में संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव था, तो इस ऐतिहासिक हिन्दू महिला सशक्तीकरण जो इतिहास में पहली बार होने जा रहा था, के खिलाफ आन्दोलन करने में गोलवलकर और उनके सहयोगियों को कोई पछतावा नहीं हुआ। उनके विरोध की वजह बिलकुल साफ़ थी: यह कदम हिंदू परंपराओं और संस्कृति के विपरीत है।

आधुनिक भारत के निर्माण में खलनायक के रूप में काम करने वाले गोलवलकरीय प्रोजेक्ट की जो वैचारिक सीमाएं हैं, उन्हें उजागर करने वाले ऐसे ढेरों उदाहरणों को गिनाया जा सकता है। किसी भी निष्पक्ष पर्यवेक्षक के लिए यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि जिस तरह से उन्होंने धर्म के आधार पर भारतीय लोगों की व्यापक एकता को खंडित करने के लिए बीच में कील ठोंकने की कोशिश की, या जिस तरह से उन्होंने पश्चिमी यूरोप में नस्लीय सफाए में किये जा रहे प्रयोगों की प्रशंसा की और जिस तरह से अपने जीवन के अंत तक उन्होंने मनुस्मृति को महिमामंडित करने का यत्न किया, वह प्रदर्शित करता है कि उनकी यह परियोजना सामाजिक सद्भाव के उदयेशों से अनिवार्य रूप से विपक्ष में खड़ी थी।

यह और बात है कि एक सांप्रदायिक एजेंडा को प्रोत्साहित करने के बावजूद, चाहे धीमी गति से ही क्यों न हो भारतीय समाज की तस्वीर को बदलने का गोलवलकरीय एजेंडा आगे बढ़ता रहा है। हमारे समाज के एक हिस्से को अपने पक्ष में गोलबंद करने में गोलवलकरीय प्रोजेक्ट की यह "सफलता", निश्चित रूप से इस लेख से परे एक अलग से उपचार की मांग करती है।

ऐसा बिलकुल न समझा जाये कि संघ के पास उनके विजन के बारे में कोई अन्य ही सोच बन चुकी है। बल्कि वे तो इसे 2002 में गुजरात में "सफल प्रयोग" या जिस प्रकार से सीएए-एनपीआर-एनआरसी त्रय का आयोजन किया गया, वे गोलवलकर और आरएसएस की दूरदृष्टि की परिणति का प्रतिनिधित्व को सफलतापूर्वक अंजाम देते रहे हैं। उनके सामने सिर्फ एक ही समस्या है, और वह है इस विजन के प्रस्तुतीकरण को लेकर। समय-समय पर सामाजिक-राजनीतिक सरोकार के विभिन्न मुद्दों पर उनकी ओर से किये गए विवादास्पद उद्घोषों को देखते हुए, और कई मौकों पर ‘पूर्वनिर्धारित अस्पष्टता’ से परे जाना- जो कि उनके द्वारा बनाए गए संगठन की यह खासियत रही है। और इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि जो लोग हिंदुत्व की परियोजना के विरोध में खड़े होते हैं, उनके हमले के निशाने के तौर पर हमेशा से ही गोलवलकर सामने होते हैं। 

इस सबसे बचने की शायद सबसे अच्छी रणनीति है कि सार्वजनिक तौर पर उन्हें विस्मृत कर दिया जाये, जबकि सारतत्व के रूप में उन्हें पूरी तरह से लागू किया जाये, में नजर आती है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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