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किसान आंदोलन ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रहा है
किसानों ने जो आपत्तियां दर्ज की हैं, वे पूरी तरह न्यायसंगत हैं और मोदी सरकार की रीति-नीति को लेकर उनके ठोस, तल्ख अनुभवों पर आधारित हैं।
लाल बहादुर सिंह
08 Dec 2021
किसान आंदोलन ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रहा है

किसान-आंदोलन ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रहा है। कृषि-कानून तो वापस हो ही चुके हैं, आंदोलन की अन्य प्रमुख मांगों पर भी मोटे तौर पर concede करने के लिए सरकार अंततः बाध्य हो गयी है।

मंगलवार की अहम बैठक के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार की लिखित पेशकश के कुछ बिंदुओं पर अपनी आपत्तियां दर्ज करते हुए rectification के लिए सरकार के पास भेजा है। उम्मीद है किसानों के दृढ़ इरादों को देखते हुए सरकार और पीछे हटेगी और सम्भवतः आज ही अथवा आने वाले चंद दिनों में किसान विजय पताका फहराते अपने गांवों और खेत-खलिहानों की ओर वापसी का ऐलान कर देंगे।

इसे पढ़ें : किसान आंदोलन: केंद्र ने किसानों को भेजा प्रस्ताव, मोर्चे ने मांगा स्पष्टीकरण, सिंघु बॉर्डर पर अहम बैठक

किसानों ने जो आपत्तियां दर्ज की हैं, वे पूरी तरह न्यायसंगत हैं और मोदी सरकार की रीति-नीति को लेकर उनके ठोस, तल्ख अनुभवों पर आधारित हैं। वे यह दिखाती हैं कि सरकार की नीति और नीयत पर किसानों को रत्ती भर भी भरोसा नहीं हैं, वे कत्तई किसी मुग़ालते में आने वाले नहीं हैं।

इसीलिए वे हर प्रश्न पर स्पष्ट committment की मांग कर रहे हैं, और कोई चीज सरकार पर विश्वास के भरोसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

उनकी यह मांग पूरी तरह तर्कसंगत है कि सरकार MSP गारण्टी की कमेटी में केवल उन किसान प्रतिनिधियों को शामिल करने की घोषणा करे जो MSP समर्थक हैं। उसमें MSP विरोधी, कृषि के कारपोरेटीकरण व WTO-regime के समर्थक संगठन न शामिल किए जायं, वरना उस कमेटी का पूरा  औचित्य ही खत्म हो जाता है। 

किसानों को आंदोलन के दौरान इसका बेहद कड़वा अनुभव हुआ जब उच्चतम न्यायालय द्वारा कृषि-कानूनों को लेकर बनाई गई कमेटी में किसान नेता के नाम पर अनिल घनवत जैसे लोगों को शामिल कर दिया गया, जो खुले आम उन कानूनों का समर्थन करते घूम रहे थे। वे कानूनों के रद्द होने के बाद भी लगातार उनके समर्थन में और MSP के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। ( ठीक इसी तरह उन कानूनों के मुख्य सूत्रधार अशोक गुलाटी भी उस कमेटी के सदस्य थे!) जाहिर है ऐसे लोग MSP के लिए लड़ने वाले किसानों के प्रतिनिधि बनकर कमेटी में नहीं बैठ सकते।

ठीक इसी तरह आंदोलन के दौरान किसानों के खिलाफ दर्ज मुकदमों पर भी किसान बिना शर्त वापसी का time-bound committment चाहते हैं। उन्हें इस vague आश्वासन पर विश्वास नहीं है कि आंदोलन खत्म होने के बाद मुकदमे वापस ले लिए जाएंगे। उन्होंने देखा है कि  आंदोलनों के दबाव में सरकारों के आश्वासन के बावजूद आन्दोलन खत्म होते ही सरकार का दमन-चक्र चलने लगता है और सालों बाद तक किसानों को पुलिसिया उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। जाहिर है, शाह-मोदी की मंशा और उनके निरंकुश तौर-तरीकों को देखते हुए किसान उन्हें इस पर कोई छूट नहीं देना चाहते। 

बिजली बिल जो विद्युत क्षेत्र के निजीकरण का बिल है और जिसकी वापसी की बात सरकार ने 22 जनवरी के पूर्व हुई वार्ताओं में मान ली थी, अब उससे मुकरते हुए सरकार कह रही है कि उसे सभी stake-holders से बात करके लाया जाएगा। जाहिर है विद्युत क्षेत्र के निजीकरण के फलस्वरूप आम उपभोक्ताओं पर बोझ बहुत बढ़ जाएगा। किसानों ने बिजली बिल को पूर्व सहमति के अनुरूप वापस लेने की मांग की है।

दरअसल, " गुजराती ब्लड में व्यापार" का गौरव-गान करने वाली मोदी-शाह जोड़ी अन्नदाता किसानों के साथ पूरी तरह bargaining पर उतरी हुई है। अव्वलन तो वह किसानों को कुछ देना नहीं चाहती थी या कम से कम में निपटाना चाहती थी, जो मांगे मजबूरी में उसे माननी पड़ रही हैं, उसका भी श्रेय वह  किसानों को, उनके आंदोलन को और उसके नेताओं को नहीं मिलने देना चाहती।

सरकार ने शायद पहले यह सोचा था कि कानून वापसी की मोदी जी की आकाशवाणी होते ही और घर-वापसी के लिए उनकी अपील सुनते ही किसान अपने घरों की ओर चल देंगे। लेकिन वह नहीं हुआ। किसानों को बांटने की भी कोशिश कामयाब नहीं हुई। जब किसानों ने तेवर कड़े करने शुरू किए तब सरकार respond करने के लिए मजबूर हुई है।

बहरहाल, किसान इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि वैश्विक पूँजी और कारपोरेट की गोद में खेलती मोदी सरकार कृषि के कारपोरेट रास्ते से नीतिगत तौर पर तो पीछे हटी नहीं है, भले ही फिलहाल आंदोलन के प्रचण्ड दबाव में, चुनावी मजबूरी के कारण उसे tactical retreat करना पड़ा है। 

वे बखूबी समझते हैं कि आंदोलन के दबाव में भले ही सरकार MSP के लिए कमेटी बना रही है, पर किसानों के सभी कृषि उत्पादों की MSP पर खरीद सुनिश्चित कराने, उत्पादों का दायरा फल, सब्जी, दुग्ध-उत्पाद, poultry, fishery तक बढ़ाने, MSP दरें स्वामीनाथन आयोग के अनुरूप C2 +50% के आधार पर तय करवाने जैसे सवालों पर उन्हें अभी लंबी दूरी तय करनी है, साथ ही चोर दरवाजे से, अनगिनत नए नए शातिर तरीकों से कृषि सुधारों को, जिनके प्रति मोदी जी अपनी प्रतिबद्धता का बारम्बार इजहार कर रहे हैं,  पुनः लागू करने की मोदी सरकार और  भविष्य की सरकारों की कोशिशों के खिलाफ लगातार vigilant रहना होगा और लड़ने के लिए तैयार रहना होगा। 

इसीलिये किसानों ने फैसला किया है कि आंदोलन खत्म होने पर भी संयुक्त किसान मोर्चा जिंदा रहेगा और अब एक सुव्यवस्थित राष्ट्रीय संगठन का स्वरूप ग्रहण करेगा।

यह इस ऐतिहासिक आंदोलन के गर्भ से, 1 साल के समुद्र-मंथन से निकलने वाला सबसे बड़ा अमृत है।

राष्ट्रीय स्तर पर एकल मंच पर, जिसमें किसान-आंदोलन की सभी धाराएं शामिल हैं, किसानों के एक साथ खड़े होने की इस महान घटना का आने वाले दिनों में राष्ट्रीय जीवन पर भारी असर पड़ेगा। यह इस देश के जनांदोलनों के परिदृश्य को भी बदलेगा और इस देश की राजनीति पर भी दूरगामी असर डालेगा। 

दरअसल आज़ादी के बाद यह हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन की ऐतिहासिक कमजोरी थी कि किसान, कृषि और ग्रामीण भारत जो कि भारतीय समाज का centre of gravity है, वह एक संगठित ताकत के बतौर राष्ट्रीय परिदृश्य से अनुपस्थित रहा है। 60-70 दशक के सामंतवाद-विरोधी रैडिकल किसान-संघर्ष, अकूत बलिदान के बावजूद, व्यापकता और स्वीकार्यता नहीं हासिल कर सके तो 80 दशक के " अराजनीतिक किसान आंदोलन" अपनी व्यापकता और जुझारूपन के बावजूद कोई राजनैतिक छाप नहीं छोड़ पाए। 90 दशक के प्रारंभिक वर्षों में डंकल और WTO विरोधी, वैश्विक पूँजी के हमले के खिलाफ राजधानी दिल्ली में हुए जुझारू आंदोलनों में किसान-संगठन व आंदोलन नदारद थे। नवउदारवादी नीतियों के क्रियान्वयन के लगभग ढाई दशकों में किसान राष्ट्रीय विमर्श से गायब थे। 

किसानों को मोदी जी का आभारी होना चाहिए कि पहले भूमि अधिग्रहण कानून के माध्यम से और फिर कृषि कानूनों के माध्यम से उन्होंने किसानों की ऐतिहासिक एकता और संघर्ष की परिस्थितियों को परिपक्व कर दिया और उनके महान आंदोलन का उत्प्रेरक (catalyst ) बन गयी।

इस आंदोलन की सम्भवतः यह सबसे बड़ी उपलब्धि है कि एक बड़ी सामाजिक शक्ति के बतौर किसानों का राष्ट्रीय क्षितिज पर आगमन हो चुका है। किसान अब एक सचेत वर्ग ( class-for-itself ) के बतौर उभर रहे हैं। नीति-निर्माण की प्रक्रिया के अब वे object नहीं, वरन कर्ता ( subject ) बनने की ओर बढ़ रहे हैं। 

विश्व-इतिहास में इस आंदोलन को याद किया जाएगा, कारपोरेट-फ़ासिस्ट सत्ता को चुनौती देते हुए भारत में कृषि के कारपोरेटीकरण की सबसे बड़ी मुहिम को , जो कारपोरेट लॉबी के सबसे चहेते कृषि-अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के शब्दों में  कृषि क्षेत्र में neo-liberal reform का 91 moment था,  उसे पीछे धकेल देने तथा कृषि उपज के वाजिब मूल्य (MSP) के सवाल को राष्ट्रीय एजेंडा बना देने के लिए।

इतिहास के असली नायकों के रंगमंच पर आगमन की यह बेला है, यह भी तय है  किसान-पॉवर की यह दावेदारी भारतीय लोकतंत्र के आकाश में एक " उल्का की क्षणभंगुर चमक नहीं, अपितु ध्रुवतारे " की  स्थायी परिघटना के बतौर देश को बदलाव और प्रगति की राह दिखाने वाली है।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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