NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
अर्थव्यवस्था
लेबर लॉ को ख़त्म करना बंधुआ मज़दूरी को दावत देना है तो यह संवैधानिक कैसे?
अचानक से सभी श्रम कानूनों को ख़ारिज कर देना पूरी तरह से संविधान के मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्वों के ख़िलाफ़ है।


अजय कुमार
14 May 2020
labour

कोरोना संकट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए चौथे भाषण में श्रमिकों को लेकर कुछ खास नहीं कहा गया। बस प्रधानमंत्री ने लेबर, लैंड, लिक्विडिटी और लॉ की तुकबंदी करते हुए एक बार लेबर शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि इन चारों पर ध्यान देने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री की मंशा क्या है? इसका सही निष्कर्ष इन चार शब्दों से नहीं निकाला जा सकता है। लेकिन इशारा जरूर समझा जा सकता है। कुछ राज्यों में लैंड से जुड़े कानूनों में तब्दीली की जा रही है, लेबर लॉ को ख़ारिज कर दिया गया है। यानी इशारा साफ है कि सरकार इन मसलों पर असंवैधानिकता की हद पर जाकर भी काम करे तो आप ज्यादा पूछताछ मत कीजिए। सरकार यह कदम आपके भले के लिए ही उठा रही है।  

अब सवाल है कि सरकार को ऐसा करने की हिम्मत कहां से मिल रही है तो जवाब यह है कि कोरोना के समय में सरकार और नागरिकों के बीच का शक्ति संतुलन बिगड़ा हुआ है। सरकार ऐसी हैसियत में है कि जो मर्जी सो कर ले। जनता सड़कों पर नहीं आने वाली।

हो-हल्ला होगा भी तो केवल लेखों के शब्दों का हिस्सा बनकर रह जाएगा। अपनी इस हैसियत का फायदा उठाकर कई राज्य सरकारों ने लेबर लॉ को खारिज कर दिया। उत्तरप्रदेश की सरकार ने तो 38 में 35 लेबर कानूनों को तीन साल के लिए स्थगित कर दिया है। क्या सरकार लेबर लॉ को अचानक खारिज कर सकती है? इसको समझते हैं।  

लेबर कानून कोई सरकारी आदेश नहीं है। यह कानून है। राजनीति, संविधान, कानून, नियम जैसे विषयों में दिलचस्पी रखने वाला कोई भी विद्यार्थी पहली नजर में कह देगा कि अचानक से लेबर लॉ को हटा देना असंवैधानिक है। यहां संविधान के कई प्रावधानों का अनदेखा किया गया है। लोग घरों के अंदर कैद है और राज्य खुलकर अपनी मनमानी कर रहा है।  

उत्तर प्रदेश सरकार ने अध्यादेश के जरिये लेबर लॉ को स्थगित किया है। कानून के जानकार कहते हैं कि अध्यादेश तभी लाया जा सकता है, जब विधायिका कार्यरत न हो और ऐसी परिस्थिति बन गयी हो कि बिना अध्यादेश के काम न चले। अध्यादेश की हैसियत बिलकुल कानून की तरह होती है। हालांकि अध्यादेश जारी करने के बाद चलने वाले सदन की पहली बैठक के छह महीने के अंदर अध्यादेश को फिर से सदन के पटल पर प्रस्तुत करना पड़ता है।  यहां पास होने के बाद ही अध्यादेश हमेशा के लिए कानून के तौर पर लागू हो जाता है।  

अब सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश सरकार को ऐसी कौन सी आफत आ गयी थी कि लेबर लॉ में बदलाव के बिना काम नहीं चल रहा था। मज़दूरों ने ऐसा कर दिया था कि लेबर लॉ को खारिज करना जरूरी हो गया था। मालिकों को ऐसी कौन सी तकलीफ आ गयी थी कि लेबर लॉ हटाए बिना उनकी परेशानी का हल नहीं हो पा रहा थी। अर्थव्यवस्था में जब मांग पूरी तरह से शांत है और आने वाले दिनों में बहुत धीमा रहने वाला है तो आर्थिक वृद्धि जैसा तर्क देकर लेबर लॉ में बदलाव क्यों किया गया? अगर प्रधानमंत्री के भाषण के इशारों में समझे तो यह है कि यह कदम आपके भले के लिए उठाया गया है और आपको पूछताछ नहीं करनी है।  

लेबर लॉ संविधान के समवर्ती सूची का विषय है। इस पर केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। नियम यह है कि अगर केंद्र और राज्य के कानून के बीच टकराहट होगी तो केंद्र का कानून लागू होगा।  

संविधान का अनुच्छेद 213 कहता है कि अगर राज्य सरकार केंद्र के ऐसे कानून में फेरबदल करना चाहती है जो समवर्ती सूची के विषय से जुड़ा है तो उसपर राष्ट्रपति से अनुमति लेनी पड़ेगी। राष्ट्रपति से अनुमति का मतलब है कि केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति की अनुमति, तभी कानून में बदलाव हो पायेगा। यही बात अध्यादेश के सम्बन्ध में भी लागू होती है।

हो सकता है कि व्यवहारिक तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह सोचा हो कि केंद्र में भी भाजपा की सरकार है अनुमति लेनी में कोई परेशानी नहीं होगी, इसलिए बिना प्रक्रियाओं को अपनाए लेबर लॉ स्थगित कर देते हैं। बाकी प्रक्रियाओं में कोई रोक टोक नहीं आएगी।

इसपर लेबर लॉ विशेषज्ञ और मद्रास हाई कोर्ट में जज रह चुके जस्टिस के चंद्रू का बयान बिजनेस स्टैंडर्ड अख़बार में छपा है। चंद्रू का कहना है कि अचानक से सभी लेबर कानूनों को खारिज कर देना पूरी तरह से संविधान के मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्वों के ख़िलाफ़ है।

कुछ जानकारों का कहना है कि फ़ैक्ट्री एक्ट में पब्लिक इमेरजेंसी के समय तीन महीने के लिए फ़ैक्ट्री एक्ट के सारे प्रावधानों को खारिज कर देने का भी प्रावधान है। राज्य सरकार ने इसी प्रावधान का इस्तेमाल कर लेबर लॉ को खारिज किया है। लेकिन ऐसा करना भी उचित कदम नहीं है।

क्योंकि अगर हम मान भी ले कि कोरोना का समय पब्लिक इमरजेंसी की कैटगरी में आता है तो यह कैसे तय होगा कि मज़दूरों के अधिकारों को पब्लिक इमरजेंसी के तहत खारिज किया जाना चाहिए। कोरोना के समय मे घर में अंदर रहना, कल-कारखाने बंद कर देना तार्किक फैसला है लेकिन मज़दूरों के अधिकारों को खत्म कर देना बिलकुल अतार्किक।  

पब्लिक इमरजेंसी का इस्तेमाल कर राज्य वैसे ही प्रतिबन्ध लगा सकता है जो पब्लिक इमरजेंसी के विषय से तार्किक तौर पर जुड़े हुए हों। राज्य ऐसा प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता जिसका पब्लिक इमरजेंसी से कोई नाता न हो। लेकिन जिस तरह से सरकार कदम उठा रही है, उससे तो यह लगता है कि कहीं पब्लिक इमरजेंसी के नाम पर साँस लेने पर प्रतिबन्ध न लगा दिया जाए।  

अगर लेबर लॉ खत्म कर दिया गया है तो होगा क्या? वही होगा जो बिना कानून के होते आया है। वही जो देश के 90 फीसदी अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े मज़दूरों के साथ होता रहा है। कम मज़दूरी पर अधिक से अधिक काम लेना, ऐसे माहौल में काम करना जो नरक से बदतर हो।

मज़दूर संगठन तो कहते आये हैं कि भारत का लेबर कानून बहुत जटिल है। संगठित क्षेत्र के लोगों पर लागू होता है। तकरीबन 90 फीसदी से अधिक मज़दूर इससे अछूते रह जाते हैं।  लेबर लॉ से मज़दूरों के पास राज्य से थोड़ी बहुत मोल भाव की ताकत है। इस ताकत को भी छीन लिया गया है। लेबर लॉ हटाने की जरूरत नहीं थी, इसमें बड़े पैमाने पर रिफार्म की जरूरत है।

डॉक्टर आंबेडकर मज़दूरों के अधिकारों के बहुत बड़े हिमायती थे। उनकी वजह से संविधान के मूल अधिकारों के हिस्से में आर्टिकल 23 शामिल किया गया। आर्टिकल 23 में 'फोर्स्ड लेबर' शब्द का इस्तेमाल किया गया है। राज्य फोर्स्ड लेबर पर प्रतिबन्ध लगाएगा। आम बोलचाल की भाषा में इसे हम केवल बंधुआ मज़दूरी के तौर समझते हैं। अगर बंधुआ मज़दूरी हुई तो राज्य प्रतिबन्ध लगाएगा और दंड भी देगा।  लेकिन इस शब्द का सही अर्थ इससे ज्यादा व्यापक है।

इसका सही अर्थ समझने के लिए हमें एक निगाह संविधान सभा की बहस पर डालनी चाहिए।  फोर्स्ड यानि बाध्यता का मतलब केवल यह नहीं होता कि बंदूक की नोक पर किसी से काम से काम करवाया जा रहा है। बाध्यता का मतलब इससे अलग भी है। शक्ति असंतुलन से भरे हमारे समाज में परिस्थितियां भी बाध्यता के तौर पर काम करती हैं। जैसे मालिक और मजूदर के बीच के रिश्ते में मज़दूर की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हैसियत मज़दूर को हमेशा स्वतंत्रता से दूर रखती है। मज़दूर हमेशा बाध्यता की स्थिति में रहता है।

संविधान सभा के सदस्य केटी शाह तो कहते हैं कि मजबूर इंसान आजाद इंसान नहीं होता।  हमारे समाज में ऐसी कई जगह है जहाँ पर शक्ति संतुलन नहीं शक्ति असंतुलन हमेशा मौजूद रहता है। इस शक्ति असंतुलन को दूर करने के लिए जरूरी है कि राज्य जैसी संस्था कमजोर के पक्ष में सही फैसले लें और सही कानून बनाये। इस बहस को ध्यान में रखा जाए तो लेबर लॉ को खारिज करने के समबन्ध में यह कहना बिलकुल उचित होगा कि राज्य ने लेबर लॉ को ख़ारिज कर संविधान को खारिज किया है।  

labour laws in corona time
labour law legality
labour law constituionality
labour law and ambdekar

Related Stories


बाकी खबरें

  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    करनाल में किसान महापंचायत, रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन और अन्य
    07 Sep 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी हरियाणा के करनाल में किसान महापंचायत, रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ रेल कर्मियों का बुधवार को राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन,यूपी में डेंगू और वायरल बुखार का…
  • निमहांस के बर्ख़ास्त किये गए कर्मचारी जुलाई से हैं हड़ताल पर
    रोसम्मा थॉमस
    निमहांस के बर्ख़ास्त किये गए कर्मचारी जुलाई से हैं हड़ताल पर
    07 Sep 2021
    19 कर्मचारियों को इसलिये बर्ख़ास्त कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने अस्पताल प्रशासन से कोविड कर्फ़्यू के दौरान रात को घर जाने की व्यवस्था करने की मांग की थी।
  • मुज़फ़्फ़रनगर: 2013 की हिंसा के ज़ख़्म ज़िंदा है जौला गांव में
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुज़फ़्फ़रनगर: 2013 की हिंसा के ज़ख़्म ज़िंदा है जौला गांव में
    07 Sep 2021
    ग्राउंड रिपोर्ट में मुज़फ़्फ़नगर के जौला गांव में पहुंची वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह, जहां 2013 के सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों को पनाह मिली। किसान आंदोलन के भविष्य का रास्ता जौला गांव से होकर ही…
  • पेगासस विवाद : उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए और समय दिया
    भाषा
    पेगासस विवाद : उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए और समय दिया
    07 Sep 2021
    मामले में अगली सुनवाई के लिए 13 सितंबर की तारीख तय की है।
  • जातीय जनगणना: जलता अंगार
    बी. सिवरामन
    जातीय जनगणना: जलता अंगार
    07 Sep 2021
    यदि नीतीश सचमुच में इस मुद्दे पर ईमानदार हैं, तो उन्हें मांग करनी चाहिये थी कि केंद्र सरकार, जिसको आरएसएस-भाजपा का ओबीसी मास्टहेड मोदी का नेतृत्व मिला है, 2011 के सामाजिक-आर्थिक व जातीय जनगणना के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License