NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लोकतंत्र में चुनाव के लिए शैक्षिक योग्यता की शर्त बेमानी
लोग भूल जाते हैं कि लोकतंत्र सबका है वह अभिजात्यवादी नहीं है। यानी ऐसा नहीं हो सकता है कि लोकतंत्र उनका नहीं हो जो शिक्षित नहीं हैं।
अजय कुमार
01 Jan 2019
पंचायत
साभार - इंडिया.कॉम

 

कभी-कभार पढाई-लिखाई को लेकर चलने वाली बहसें एक अजीब सी अभिजात्यता का एहसास कराती हैं। ऐसा लगता है कि जो पढ़े-लिखे नहीं हैं वह किसी काबिल नहीं है। यह बहसें उस लोकतान्त्रिक संरचना के बिल्कुल खिलाफ जाती हैं, जिस लोकतान्त्रिक संरचना का अंतिम लक्ष्य सभी के लिए आज़ादी, बराबरी और इंसाफ जैसे मूल्य हासिल करना है।

राजस्थान में नगर निकाय यानी नगर निगम और नगर पालिका के चुनाव होने वाले हैं। वसुंधरा राजे की पूर्व सरकार ने जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनाव में जनरल केटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 10वीं, सरपंच के उम्मीदवारों के लिए 8वीं और अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) सीट के उम्मीदवार के लिए 5वीं क्लास पास होने की शैक्षिक अनिवार्यता रखी थी। यानी वही लोग पंचायती चुनाव लड़ने के हकदार होंगे, जिन्होंने इतनी शैक्षिक योग्यता हासिल की होगी। राज्य की नई अशोक गहलोत सरकार ने पंचायती राज चुनाव के लिए इन योग्यताओं को ख़ारिज कर दिया है। यानी पंचायती चुनाव लड़ने के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। ठीक इसी तरह की योग्यता हरियाणा सरकार ने अपने पंचायती चुनाव के लिए रखी थी। साथ में यह भी अनिवार्यता रखी थी कि जिनके यहाँ शौचालय की सुविधा होगी, जिन्होंने अपनी खेती-किसानी का कर्जा और बिजली का बिल चुका दिया होगा वही लोग पंचायती चुनाव में उम्मीदवार बन सकेंगे। तेलंगाना सरकार भी अपने पंचायती चुनाव के लिए कुछ ऐसा ही करने का विचार कर रही है।

आंकड़ें कहते हैं कि राजस्थान में पंचायती चुनाव में शैक्षिक योग्यता होने की वजह से 2015 में तकरीबन 260 सरपंच निर्विरोध रूप से चुने गए, मतलब ये है कि वहां एक से ज़्यादा उम्मीदवार खड़े ही न हो पाए। 2010 में यह संख्या केवल 10 सरपंचों की थी। वहीं हरियाणा के पंचायती चुनाव में शैक्षिक अनिवार्यता की वजह से तकरीबन 68 फीसदी दलित महिलाओं और 50 फीसदी सभी वर्ग की महिलाओं को पंचायती चुनाव से दूर रहना पड़ा था।

इस पूरी वस्तुस्थिति के बीच यह बहस खड़ी होती है कि चुनावी उम्मीदवार बनने के लिए शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता होनी चाहिए अथवा नहीं। हमारी आम समझ इस सवाल का सीधे यह जवाब देती है कि जब शिक्षा के जरिये ही काबिलियत हासिल की जाती है तो चुनावी उम्मीदवार बनने के लिए भी शैक्षिक योग्यता जरूर होनी चाहिए और ऐसा होने पर कोई भी निर्वाचित उम्मीदवार अपने कामों को अच्छी तरह से कर पाएगा।

इस समझ में सबसे बड़ी नासमझी यह होती है कि लोग भूल जाते हैं कि लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत जैसी भी कोई बात होती है। भूल जाते हैं कि लोकतंत्र सबका है वह अभिजात्यवादी नहीं है। यानी ऐसा नहीं हो सकता है कि लोकतंत्र उनका नहीं हो जो शिक्षित नहीं हैं। यहां यह भी समझ लेना चाहिए कि सिर्फ पढ़े-लिखे होने का मतलब ही समझदार या बेहतर इंसान होना नहीं है। इसलिए असली बहस यह नहीं होनी चाहिए कि शिक्षा जरूरी है या नहीं बल्कि असली बहस यह होनी चाहिए कि क्या चुनावी उम्मीदवार बनने के लिए शैक्षिक योग्यता या शौचालय बनाने जैसी कोई बात अनिवार्य होनी चाहिये। 

इस बहस का जवाब इस बात से मिलता है कि जन प्रतिनिधि का काम क्या होता है?इस जवाब को ढूंढते हुए हम जन प्रतिनिधित्व और नौकरशाही में घाल-मेल कर जाते हैं। हमें लगता है कि सरकार होने का मतलब केवल जन प्रतिनिधि है। जबकि असलियत यह है कि जन प्रतिनिधि जनता के दुःख दर्द को समझता है, सदन में उस दुःख दर्द की आवाज बुलंद करता है और प्राथमिकताएं तय करता है कि इनमें से कौन सा काम पहले और कौन सा काम बाद में किया जाएगा। इसके बाद का काम नौकरशाहों और क्लर्कों का होता है कि कामों को जनता के बीच लागू करवाए। इसे ऐसे समझिये कि गाँव की सड़क खराब है यह बताने का काम लोकप्रतिनिधि का है और यह सड़क बनेगी कैसी, इसे हल करने का काम पंचायत के अफसरों और क्लर्कों का होगा।

लेकिन हम शैक्षिक योग्यता जैसी लकीर बनाते हैं जो बिल्कुल असंवैधानिक है। इससे हमें संविधान के जरिये मिले मूल अधिकारों का हनन होता है। संविधान के अनुच्छेद 14 में सभी नागरिकों के साथ बराबरी की बात की गयी है और जन कल्याण के लिए शिक्षा के आधार पर भेदभाव करने जैसी कोई बात नहीं कही गयी है। और न ही परिवार कल्याण के आधार पर भेदभाव करने की बात की गयी है। लोकप्रतिनिधि के चयन में इन आधारों पर भेदभाव करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाता है।

अब शैक्षिक अनिवार्यताएं से जुड़े बहुत सारे दूसरे पहलुओं की तरफ देखते हैं। हमारे देश की पंचायती व्यवस्था में एक तिहाई सीट औरतों के लिए आरक्षित होती है। और हमने देखा है कि फैसले लेने वाले पदों पर औरतों के आने से ऐसे फैसले लेने में आसानी होती है तो औरतों से जुड़े हों। ठीक ऐसा ही अनुसूचित जाति और जनजातियों से जुड़े लोगों के निर्णायक पदों पर आने से होता है। कहने का मतलब यह है कि अगर शैक्षिक अनिवार्ताएं ऐसे पदों से जुड़ती हैं तो कमज़ोर तबकों का लोककल्याण से जुड़े विषयों से प्रतिनिधित्व हट जाता है।

लोकतंत्र में चुनने का अधिकार जनता का होता है। यानी जनता फैसला करेगी कि उसका प्रतिनिधि कौन होगा, न कि किसी व्यक्ति विशेष की राय। इसलिए जैसे ही हम शैक्षिक अनिवार्यता जैसी लकीर खींचते हैं वैसे ही हम नागरिकों से अनुच्छेद 19 के तहत मिले चुनने की आजादी का मौलिक अधिकार छीन लेते हैं। इस तरह से भी यह असंवैधानिक हो जाता है।

 इन सारे तर्कों से बड़ी बात यह है कि किसी को अशिक्षित रखने में सबसे बड़ी भूमिका व्यवस्था की है। कोई अशिक्षित है तो इसका कारण यह है कि सरकारी और सामाजिक कारणों से उसे शिक्षा नहीं मिल सकी। इसलिए लोकतंत्र में यह बिल्कुल गलत होगा कि व्यवस्था ही उन्हें बाहर रखने का काम करे, क्योंकि आज जरूरत तो सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ाने की है।

संविधान सभा में इस बात पर खूब बहस हुई कि वोट देने का अधिकार सभी को दिया जाए या नहीं। बहुतों की राय थी कि केवल पढ़े लिखे लोगों को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिए। खूब बहस के बाद यह फैसला हुआ कि सभी को वोट डालने का अधिकार होगा। इस अधिकार का फायदा हम आज देख सकते हैं। अगर सभी को वोट डालने का अधिकार नहीं होता तो दलितों, महिलाओं और अन्य कमज़ोर वर्गों की बात शासन प्रशासन का हिस्सा नहीं बन पाती। न ही इनसे जुड़ी बहुत सारी बातें खुलकर लोक विमर्श का हिस्सा बन पातीं। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि जैसे-जैसे सत्ता में हर तरह के लोगों की भागीदारी बढती है विमर्श का दायरा फैलता है, शिक्षा से जुड़े विषय फैलते हैं, पढाई-लिखाई से जुडी अभिजात्यता घटती है। इसलिए एक लोकतान्त्रिक संरचना में फैसले लेने वाले सबसे ऊँचे पदों पर सभी का प्रतिनिधित्व होने पर ही यह संभव हो पाता है कि सभी का कल्याण संभव हो। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

rajsthan panchayat
haryana panchayt
educational eligibility
article 14
democarcy in india

Related Stories

पत्नी नहीं है पति के अधीन, मैरिटल रेप समानता के अधिकार के ख़िलाफ़

मौजूदा अघोषित आपातकाल का अंत किसान करेंगे

सीएए के विरोध में भाजपा के 80 मुस्लिम नेताओं ने प्राथमिक सदस्यता छोड़ी

अनुच्छेद 14 और 15 को मिलाकर पढ़ेंगे तो नागरिकता संशोधन बिल हारता दिखेगा

सिर्फ़ कश्मीर ही नहीं, देश का लोकतंत्र ख़तरे में है: ग़ुलाम नबी आज़ाद

जटिल है जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न

विवि परिसरों में जातिगत भेदभाव खत्म करने की मांग को लेकर अदालत पहुंची वेमुला व तड़वी की मां

क्या दो साल से कम सज़ा पाए नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए?

भगवा-राष्ट्रवाद और भगत सिंह का राष्ट्रप्रेम!


बाकी खबरें

  • Forest
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: सोती रही योगी सरकार, वन माफिया चर गए चंदौली, सोनभद्र और मिर्ज़ापुर के जंगल
    19 Jan 2022
    चंदौली, सोनभद्र और मिर्ज़ापुर के जंगलों में अब शेर, बाघ, मोर और काले हिरणों का शोर नहीं सुनाई देता। अब यहां कुछ सुनाई देता है तो धूल उड़ाते भारी वाहनों का भोपू और नदियों का सीना चीरकर बालू निकालती…
  • Cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: पर्यटन की हालत पर क्यों मुस्कुराई अर्थव्यवस्था!
    19 Jan 2022
    ऐसा क्या हुआ कि पर्यटन की हालत देख अर्थव्यवस्था की हंसी छूट गई!
  • Taliban
    एम के भद्रकुमार
    पाकिस्तान-तालिबान संबंधों में खटास
    19 Jan 2022
    अमेरिका इस्लामाबाद के साथ तालिबान के संबंध में उत्पन्न तनाव का फायदा उठाने की तैयारी कर रहा है।
  • JNU protest
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जेएनयू में छात्रा से छेड़छाड़, छात्र संगठनों ने निकाला विरोध मार्च
    19 Jan 2022
    जेएनयू परिसर में पीएचडी कर रही एक छात्रा के साथ सोमवार रात कथित तौर पर छेड़खानी की गई। मामला सामने आने के बाद मंगलवार को छात्रों और शिक्षकों ने परिसर में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने का आरोप…
  • census
    अनिल जैन
    जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य को क्यों टाल रही है सरकार?
    19 Jan 2022
    सवाल है कि कोरोना महामारी के चलते सरकार का कोई काम नहीं रूका है, तो फिर जनगणना जैसे बेहद महत्वपूर्ण कार्य को हल्के में लेते हुए क्यों टाला जा रहा है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License