NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लोकतंत्र, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के लिए एक स्पष्टीकरण
इस निराशाजनक समय की आवश्यकता की मांग है कि सभी लोग संविधान के मूल सिद्धांतों पर लौटें और इसकी शुरुआत अपने चुनावी अधिकार का सही ढंग से इस्तेमाल करें।
बशारत शमीम
29 Apr 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : Kamran Yousuf

भारत में भारी असंतोष का समय है क्योंकि अल्पसंख्यक विशेष रूप से मुस्लिम खुद को दक्षिणपंथी फासीवादियों के हमले का शिकार पाते हैं। यह ज्ञात है कि जब भी फासीवादी ताक़तें किसी भी समाज में उभरती हैं तो असंतोष, बहुलवाद तथा सहिष्णुता इसके पहले शिकार होते हैं। वर्तमान समय में भारत में इसे देखा जा सकता है। कश्मीर में यह हमारे लिए ज़्यादा मायने रखता है क्योंकि हम उनमें से हैं जो विरोध के रास्ते पर हैं चूंकि हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं। निरंतर ख़ौफ़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारते हुए कोई भी परेशान हो जाएगा कि ऐसी परिस्थितियों में स्वतंत्रता और लोकतंत्र का आख़िर क्या मतलब है?

निस्संदेह कश्मीर में लोगों ने इस तरह के विचारों पर से विश्वास खो दिया है लेकिन अगर हम कोई भी समाधान के बारे में बात कर रहे हैं तो इसका रास्ता लोगों की इच्छा के अनुसार लोकतांत्रिक तरीक़े में ही निहित है। और फासीवाद इसका कट्टर विरोधी है। भारत में फ़ासीवादी ताक़तों की चुनावी सफलता फिर से अनिवार्य रूप से हमारे अधिकारों के और दमन का कारण बनेगी और इस तरह लोकतांत्रिक समाधान की किसी भी संभावना को निष्प्रभावी कर सकती है। न्यायसंगत कश्मीरी आकांक्षाओं की पूर्ति पर आम सहमति के लिए भारत में फासीवादी चेतना को हराना होगा। भारत के लोगों को इस महत्वपूर्ण समय के बारे में याद दिलाने की ज़रूरत है। एक कश्मीरी के रूप में जो लोकतंत्र,स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रयास करते हैं वे नई सरकार चुनने की इस चुनावी प्रक्रिया के केंद्र में मौजूद भारतीय जनता से अपील करके इस महत्वपूर्ण समय में उन्हें अपने संवैधानिक दायित्वों के बारे में केवल याद दिला सकते हैं।

हमारा संविधान हर प्रकार की स्वतंत्रता जैसे कि जीवन यापन करने, अभिव्यक्ति, सामाजिक-राजनीतिक संबद्धता, आर्थिक अवसर और असंतोष व्यक्त करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लेकिन चूंकि वर्तमान में इन स्वतंत्रताओं पर हमले हो रहे हैं इसलिए संवैधानिक मूल्यों का दृढ़ता से पालन करने और बचाव करने की ज़िम्मेदारी सभी भारतीय नागरिकों पर काफी ज़्यादा है। ये वे मूल्य हैं जिन पर किसी भी लोकतंत्र की नींव है। स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र एक मज़ाक है। कट्टर मानवतावादी एम.एन. रॉय ने एक बार कहा था: “स्वतंत्रता की तलाश और सत्य की खोज मानव की प्रगति की मौलिक आवश्यकता है… मनुष्य की तरह न कि यांत्रीकृत सामाजिक जीव के घिरनी में दांत की तरह स्वतंत्रता व्यक्तियों की क्षमताओं के प्रकट होने पर सभी प्रतिबंधों का क्रमिक लोप है। इसलिए व्यक्ति की ये स्थिति किसी भी सामूहिक प्रयास या सामाजिक संगठन के प्रगतिशील और स्वतंत्रता के महत्व की माप है।” इसका तात्पर्य यह है कि अस्तित्व के लिए संघर्ष अस्तित्व की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष है। दूसरे शब्दों में यह मानव जीवन का निष्कर्ष तैयार करता है।

संविधान, क़ानून, सरकारें स्वतंत्रता को संरक्षित और सुरक्षित रखने के लिए हैं न कि इन्हें हटाने के लिए। इसलिए लोकतंत्र की मूल भावना स्वतंत्रता को समाहित करता है। भ्रष्टाचार, शोषण, अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, मानव अधिकारों का उल्लंघन, लैंगिक असमानता लोकतंत्र और स्वतंत्रता को परिभाषित नहीं कर सकती है। धार्मिक, जातिगत और लैंगिक ध्रुवीकृत तथा दृढ़ मानकों की तरह इस देश में मौजूद सामाजिक और आर्थिक मानदंडों पर स्वतंत्रता को महसूस नहीं किया जा सकता है। जब तक ये संरचनाएं बदल नहीं जाती तब तक लोकतंत्र, स्वतंत्रता तथा समानता अनुभव करने योग्य नहीं है।

भारतीय राष्ट्रवाद और समरूपता को संघ परिवार के हाथों में जाने से रोकना ज़रुरी है क्योंकि इसका एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रवाद की अतिशयोक्तिपूर्ण परिभाषा को उग्रता से प्रसारित करना है जिसमें किसी असंतुष्ट और आलोचकों के लिए जगह नहीं हैं। यह फासीवाद से प्रभावित है और इसमें एक विशेष विचारधारा के निर्दयी बहुलवाद का समावेश है जो विशेष रूप से भगवा है। हमने देखा है कि नागरिकों के मौलिक अधिकार, जैसे खाने-पीने का अधिकार, पोशाक, अभिव्यक्ति, साथी के चयन, स्वतंत्र विचार, विरोध,असंतोष और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग भारत में हमले का शिकार हुआ है। कश्मीर भी इससे अछूता नहीं है।

हमने देखा है कि कितने बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की हत्या हुई है। हमने लगातार लिंचिंग के मामले को भी देखा है और यह भी देखा है कि केंद्रीय मंत्री ने इन मामलों में आरोपियों को हार पहनाकर स्वागत किया है। हमने किसानों की पीड़ा को भी देखा है। हमने लगातार महिलाओं के बलात्कार की घटना को देखा है और सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि सत्तारूढ़ दल (कठुआ में) के निर्वाचित नेताओं ने आरोपियों के पक्ष में कैसे रैलियां निकाली हैं। हमने कश्मीर में प्रदर्शनकारियों की हत्या और लोगों को आंखों की रौशनी को खोते हुए भी देखा है। हमने यह भी देखा है कि किस तरह एक मतदाता को सेना की जीप (बडगाम में) में बांध कर मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया था। हमने शैक्षणिक संस्थानों, न्यायिक संस्थानों और अन्य सरकारी संस्थानों की स्वायत्तता पर हमला करते हुए देखा है।

नागरिकों के मौलिक अधिकारों को जोखिम में डालते हुए केवल अपने लाभ के लिए शासक वर्ग द्वारा लोकतंत्र का लाभ नहीं उठाया जा सकता है। किसी भी लोकतंत्र की परीक्षा अल्पसंख्यकों की स्थिति से होती है भले ही लोकतंत्र का अर्थ बहुमत का शासन है।’ अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न लोकतंत्र नहीं बल्कि अत्याचार की एक स्पष्ट अवस्था है। सभी स्वतंत्रताओं पर हमले हो रहे हैं भले ही कोई आपातकाल घोषित नहीं किया गया है। विशेष मतों को अपनाने वाले लोगों को मारा जा रहा है, आलोचनात्मक विचार पेश करने को लेकर लोगों को जेल में डाला जा रहा है और उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहा जा रहा है।’ नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता पर हमला वर्तमान इतिहास में समानांतर नहीं दिखाई देता है। और अगर यह अत्याचार नहीं है तो क्या है?

इस निराशाजनक समय की आवश्यकता की मांग है कि सभी लोग संविधान के मूल सिद्धांतों पर लौटें और इसकी शुरुआत अपने चुनावी अधिकार का सही ढंग से इस्तेमाल करें। भारत में वर्तमान परिदृश्य में जहां लोगों को उनके जीने के तरीक़े को लेकर हमले बढ़ रहे हैं तो ऐसे में मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। यह वास्तव में धर्मनिरपेक्ष तथा प्रगतिशील ताक़तों के लिए एकजुटता, समर्थन तथा शक्ति के निर्माण के साथ होता है जो फासीवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ असली बचाव है। इसी तरह की मानसिकता वाली दूसरी राजनीतिक ताक़तें जो संवैधानिकता और भारतीय गणतंत्रवाद के आवश्यक धर्मनिरपेक्ष, बहुलता और सहिष्णु मूल्यों में विश्वास करती हैं उन्हें समय की मांग को ध्यान में रखते हुए एक साथ आना चाहिए। बेशक वास्तविक लोकतंत्र तथा स्वतंत्रता की लड़ाई लंबी है और अनिवार्य रूप से मतपत्र पर समाप्त नहीं होता है।

इस संदर्भ में कश्मीर के बारे में बात करना आवश्यक है क्योंकि कश्मीर में स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र के विचार पिछले तीन दशकों में कई बड़ी जांच से गुज़रे हैं। हमने देखा है कि कैसे कश्मीर में सबसे अधिक दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से फासीवादी सिद्धांतों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वर्तमान भारत में सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी सरकार ने फासीवाद तथा कट्टर राष्ट्रवाद को गणतंत्र के विचार से जोड़ने की कोशिश की। यह स्वाभाविक रूप से पूरे भारत में सभी आवश्यक लोकतांत्रिक और गणतंत्रीय मूल्यों का अतिक्रमण करता है लेकिन संघ परिवार की परियोजना में कश्मीर की अशांत घाटी की बजाय कोई बेहतर फलदायी क्षेत्र नहीं जहां इसे पूरी ताक़त से लाया जाए।

1947 की असाधारण परिस्थितियों में यह धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक आधार था जो कश्मीर को भारत के क़रीब लाया जबकि इसने दो-राष्ट्र सिद्धांत को खारिज कर दिया। कश्मीरियत के विचार के साथ एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के विचार में प्राकृतिक सामंजस्य पाया गया जो धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद की सार्वभौमिक लोक नीति पर आधारित है। शेखुल आलम या नंद ऋषि के नाम से लोकप्रिय महान कश्मीरी कवि और संत ने 15 वीं शताब्दी में बहुलवाद का आह्वान करते हुए कहा था :

हम एक दूसरे पर इच्छा न थोपें,

हमारा प्यार हिंदू और मुस्लिम जैसा सभी से होना चाहिए,

तब निश्चित रूप से भगवान हमसे खुश होते हैं...

यह बहुलतावादी लोकनीति है जिसने ऐतिहासिक रूप से कश्मीर और कश्मीरियत के विचार को परिभाषित किया है। लेकिन दुर्भाग्य से संघर्ष और राजनीतिक अशांति के कारण हमें भारी क़ीमत चुकानी पड़ी। हमारे अधिकारों और बहुवतावादी ताने बाने ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह से एक खतरनाक मोड़ ले लिया। हालांकि यह अक्सर कहा गया है कि लोकतांत्रिक आदर्शों की उन क्षेत्रों में सबसे अधिक सराहना की जाती है जहां उन पर सबसे ज़्यादा हमले होते हैं। इसकी अनुपस्थिति में इसके असली मूल्य का एहसास होता है और यही वह है जो इस लेखक की तरह कश्मीरी ने अब तक अपने जीवन में महसूस किया है।

यह भारतीय लोगों के लिए महान लोकतांत्रिक आदर्शों को बनाए रखने और संघर्ष करने का समय है जिसे इसके राष्ट्रीय संस्थापक नेताओं ने उन्हें धर्मनिरपेक्ष संविधान के रूप में दिया। अंततः कश्मीरियों की वास्तविक आकांक्षाओं का कोई भी समाधान लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की आत्मा में है। और यह ज़रूरी है कि कश्मीर और मुख्य भूभाग भारत दोनों में ऐसे सर्वोच्च आदर्श जीवित हों। निस्संदेह कोई थोपा हुआ या उधार लिया हुआ तरीका या अवधारणा नहीं बल्कि कुछ ऐसा जो कश्मीर की ऐतिहासिक पहचान के केंद्र में बहुलवाद और धर्मनिरपेक्षता का विचार निश्चित रूप से लोकतांत्रिक संघर्ष का पूरक हो सकता है। इस समय कश्मीर की दीर्घकालिक राजनीतिक समस्या का समाधान करना अभी भी भारतीय गणराज्य की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और संघीय प्रकृति की सबसे बड़ी जीत हो सकती है।

(लेखक जम्मू-कश्मीर के कुलगाम के एक ब्लॉगर और युवा कार्यकर्ता है। ये उनके निजी विचार हैं।)

General elections2019
2019 Lok Sabha elections
Jammu and Kashmir
India
kashmiriyat
Communalism
Save Democracy
save constitution

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक


बाकी खबरें

  • brooklyn
    एपी
    ब्रुकलिन में हुई गोलीबारी से जुड़ी वैन मिली : सूत्र
    13 Apr 2022
    गौरतलब है कि गैस मास्क पहने एक बंदूकधारी ने मंगलवार को ब्रुकलिन में एक सबवे ट्रेन में धुआं छोड़ने के बाद कम से कम 10 लोगों को गोली मार दी थी। पुलिस हमलावर और किराये की एक वैन की तलाश में शहर का चप्पा…
  • non veg
    अजय कुमार
    क्या सच में हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ है मांसाहार?
    13 Apr 2022
    इतिहास कहता है कि इंसानों के भोजन की शुरुआत मांसाहार से हुई। किसी भी दौर का कोई भी ऐसा होमो सेपियंस नही है, जिसने बिना मांस के खुद को जीवित रखा हो। जब इंसानों ने अनाज, सब्जी और फलों को अपने खाने में…
  • चमन लाल
    'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला
    13 Apr 2022
    कई कलाकृतियों में भगत सिंह को एक घिसे-पिटे रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन, एक नयी पेंटिंग इस मशहूर क्रांतिकारी के कई दुर्लभ पहलुओं पर अनूठी रोशनी डालती है।
  • एम.के. भद्रकुमार
    रूस पर बाइडेन के युद्ध की एशियाई दोष रेखाएं
    13 Apr 2022
    यह दोष रेखाएं, कज़ाकिस्तान से म्यांमार तक, सोलोमन द्वीप से कुरील द्वीप समूह तक, उत्तर कोरिया से कंबोडिया तक, चीन से भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान तक नज़र आ रही हैं।
  • ज़ाहिद खान
    बलराज साहनी: 'एक अपरिभाषित किस्म के कम्युनिस्ट'
    13 Apr 2022
    ‘‘अगर भारत में कोई ऐसा कलाकार हुआ है, जो ‘जन कलाकार’ का ख़िताब का हक़दार है, तो वह बलराज साहनी ही हैं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल, भारतीय रंगमंच तथा सिनेमा को घनघोर व्यापारिकता के दमघोंटू…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License