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दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप की जीत से क्या सबक़ मिल रहे हैं?
क्या बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव करेगी? अरविंद केजरीवाल और आप के सामने क्या चुनौतियां हैं? इस चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या फर्क पड़ेगा? कांग्रेस की हार का क्या मतलब है? ऐसे तमाम सवाल है जिनपर बात की जानी चाहिए।
अमित सिंह
11 Feb 2020
AAP Wins
Image courtesy: Twitter

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बंपर जीत दर्ज की है। अरविंद केजरीवाल लगातार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बनेंगे। बीजेपी ने हालांकि पिछले चुनाव के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन उसका सांप्रदायिकता का मुद्दा काम नहीं आया और दिल्ली की जनता ने स्थानीय मुद्दों पर वोट डाला। पिछले चुनावों की तरह इस बार भी कांग्रेस इन चुनावों में खाता नहीं खोल पाई।

केजरीवाल ने चुनावों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों को उठाया और जनता के बीच इसी आधार पर वोट मांगा। जनता ने उन पर भरोसा जताया है। अब चुनाव परिणाम आने के बाद इसके क्या मायने हैं? क्या बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव करेगी? अरविंद केजरीवाल और आप के सामने क्या चुनौतियां हैं? इस चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या फर्क पड़ेगा? कांग्रेस की हार का क्या मतलब है? ऐसे तमाम सवाल है जिनपर बात की जानी चाहिए।

वैसे दिल्ली का यह चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए याद किया जाएगा। 'शाहीन बाग़ के लोग घर में घुसकर आपकी बहू बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे।', 'आतंकवादियों को बिरयानी खिलाने के बजाय बुलेट (बंदूक की गोली) खिलानी चाहिए।' 'देश के ग़द्दारों को, गोली मारो ... को।' 'अरविंद केजरीवाल आतंकवादी है।' जैसे बयानों और 'जयश्री राम' के नारे के चुनावी इस्तेमाल से बीजेपी ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की थी लेकिन परिणाम यह साफ दिखाता है कि जनता ने इस राजनीति को अस्वीकार कर दिया।

हालांकि इसके उलट हम सीधे ये कहें कि जनता ने सिर्फ काम के आधार पर आप को चुन लिया तो यह बहुत सरलीकृत व्याख्या होगी। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश भले ही बीजेपी ने शुरू की लेकिन आप ने कभी उसका खुलकर विरोध नहीं किया। बल्कि बीच-बीच में बीजेपी की पिच पर भी खेलते नजर आए। आप नेता अरविंद केजरीवाल बजरंगबली के मंदिर भी गए और एक इंटरव्यू में हनुमान चालीसा गाकर सुनाने लगे। वोटिंग के दिन भी जब कई बूथों पर बीजेपी के सर्मथक जयश्री राम का नारा लगा रहे थे तो आप कार्यकर्ता रणनीति के तहत उन्हें मना करने के बजाय चुप रहे या फिर बजरंग बली का नारा लगाते नजर आए।

इसी तरह धरने देने के लिए मशहूर केजरीवाल कभी सीएए के खिलाफ दिल्ली भर में चल रहे धरने के समर्थन में खुलकर नहीं आए जबकि नागरिकता संशोधन कानून पर आम आदमी पार्टी का स्टैंड साफ है। वो इस कानून के खिलाफ हैं।

अपने पूरे चुनावी कैंपेन के दौरान आप सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष राजनीति की पहल करती नजर नहीं आई। बल्कि आप नेता हिंदू वोट बैंक नाराज न हो जाए इसके लिए अपनी सॉफ्ट हिंदू छवि को भी बचाते नजर आए।

पिछले कई चुनावों से यह सिलसिला चल रहा है और दिल्ली चुनाव परिणामों ने इसे लगभग पुष्ट करने का काम किया है कि काम के साथ-साथ जो हिंदू बहुसंख्यकवाद के धार्मिक हितों की तुष्टि करता रहेगा वो चुनाव में जीत दर्ज करेगा।

हालांकि ये राजनीति है और राजनीति में बहुत नैतिकता की अपेक्षा करना भी बेमानी है लेकिन यह इसलिए दुखद है क्योंकि यह नेहरू और आंबेडकर का देश है। यहां जीत के लिए राजनीति के स्तर में काफी गिरावट आई है। आपको बताएं कि भारत पाक विभाजन के बाद हुए हजारों हिंदू मुस्लिम दंगों की पृष्ठिभूमि में जब देश का पहला आम चुनाव हो रहा था तब इसी राजनीति के खिलाफ खुद नेहरू ने बिगुल फूंका था। पहले आम चुनाव में नेहरू ने 30 सितंबर 1951 को लुधियाना से अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत की थी।

अपने पहले ही चुनावी भाषण में नेहरू ने सांप्रदायिकता के खिलाफ आर पार की लड़ाई छेड़ने का आह्वान किया...इसके बाद 2 अक्टूबर को दिल्ली में उन्होंने यह बात दोहराई..उन्होंने कहा— अगर कोई भी आदमी किसी दूसरे आदमी पर धर्म की वजह से हाथ उठाता है तो मैं सरकार का मुखिया होने के नाते और सरकार से बाहर भी...जिदंगी की आखिरी सांस तक उससे लड़ता रहूंगा...नौ हफ्ते के अपने चुनाव प्रचार में नेहरू ने पूरे देश का तूफानी दौरा किया। यह बात बार बार दोहराई थी।

लेकिन आज किसी भी बड़ी पार्टी के नेता के अंदर इतना नैतिक साहस नहीं बचा है कि वह धर्मनिरपेक्षता की पैरवी खुलकर कर सके। शायद इस खतरे की आहट भीमराव आंबेडकर ने भी महसूस की थी। संविधान सभा में वोटिंग अधिकार पर चल रही बहस के दौरान आंबेडकर ने इसके दुरुपयोग की आशंका जाहिर की थी।

अब सवाल बीजेपी की चुनावी रणनीति पर है। पिछले कई विधानसभा चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ रहा है। उसकी पूरी चुनावी रणनीति सांप्रदायिक राष्ट्रवाद, राममंदिर और राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द गिर्द घूम रही है। इस साल महाराष्ट्र, झारखंड और कुछ हद तक हरियाणा में मिली हार के बाद दिल्ली की जनता ने भी विधानसभा चुनावों के लिए इस रणनीति को नकार दिया है। ऐसे में वक्त आ गया है कि बीजेपी को इस रणनीति को छोड़कर जनमुद्दों पर चुनाव लड़ने की तरफ ध्यान देना होगा। इसके चलते आगामी बिहार और बंगाल के चुनाव दिलचस्प होने वाले हैं।

जहां तक सवाल दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम का राष्ट्रीय राजनीति पर है तो निसंदेह इसका असर बीजेपी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा। दिल्ली में भले ही 70 सीट हैं और मुख्यमंत्री के पास ज्यादा अधिकार नहीं है लेकिन राष्ट्रीय राजधानी और मीडिया की उपस्थिति के चलते इसका असर देशभर पर पड़ता है। यह चुनाव विपक्ष के लिए आगामी चुनावों में टॉनिक का काम करेगा तो बीजेपी को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा।

वहीं, कांग्रेस को इस हार को लेकर चिंतन की जरूरत है। 2013 में मिली हार के बाद से ही पार्टी के नेता बारबार आम आदमी पार्टी से सीखने की बात करते हैं लेकिन लगातार मिलती हार से सबक नहीं ले रहे हैं। इस बार पार्टी के वोटबैंक में काफी गिरावट दर्ज की है। लंबे समय तक इस तरह की करारी हार मिलने का सबसे ज्यादा असर कार्यकर्ता पर पड़ता है। कांग्रेस को इस पर विचार करने की जरूरत है।

निसंदेह इस जीत के और आज के हीरो अरविंद केजरीवाल हैं। दिल्ली की जनता ने उनके काम पर भरोसा किया। अब उन्हें अपनी पार्टी और विकास के दिल्ली मॉडल को लेकर दूसरे छोटे राज्यों में जाने की जरूरत है।

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