NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
पट्टेदारी का उदारीकरण या गरीबों की ज़मीनें हड़पने का षड्यंत्र?
NSSO के डेटा से पता चला है कि 2011-12 में करीब 36 प्रतिशत ज़मीन को पट्टे के तौर पर किराये से दिया गया। विडंबना यह है कि इसे 30 प्रतिशत अमीर ज़मीन मालिकों ने किराये पर ले लिया।
विकास रावल, वैशाली बंसल
04 Nov 2019
Grabbing Land of the Poor?

वामपंथी सरकारों को छोड़कर, भारत में सरकारें भूमि सुधार के ज़रिए जमीन के दोबारा बंटवारे और जोतदारों के अधिकारों के लिए कभी गंभीर नहीं रहीं। 1991 में भारत द्वारा उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को अपनाने के बाद से सरकारों ने भूमि सुधार के बारे में बोलना भी बंद कर दिया है। इतना ही नहीं, ''हक़ कमेटी रिपोर्ट 2016'' जैसे नीतिगत दस्तावेज़ों में तो खुलकर भूमि सुधार कानूनों को वापस लिए जाने को कहा गया है।

अपने निर्माण के तुरंत बाद नीति आयोग द्वारा बनाई गई हक़ कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया कि ''ज़मीन को लीज़़ पर देने के ऊपर लगे प्रतिबंधों'' से इसका पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। यह बात छोटे ज़मींदारों के खिलाफ़ जाती है। कमेटी ने प्रस्ताव दिया कि पट्टेदारी बाज़ार के उदारीकरण से छोटे और आर्थिक तौर पर घाटे के शिकार ज़मीन मालिक, बड़े ज़मींदारों को अपनी ज़मीनें लीज़ पर दे सकेंगे। और वे दूसरे व्यवसायों की तरफ मुड़ सकेंगे। इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक आर्टिकल में अशोक गुलाटी और रितिका जुनेजा ने भी पट्टेदारी बाज़ार को उदार बनाए जाने की मांग की है। ताकि ज़मीन मालिकों के अधिकारों को सुरक्षित किया जा सके।

50 और 60 के दशक में आधे मन से लाए गए भूमि सुधार कानूनों के चलते अभी तक पट्टेदारी संबंध अनौपचारिक और शोषणकारी बने हुए हैं। वे सामाजिक-आर्थिक शक्ति समीकरण में भी उलझे हैं। जबकि ज़मीन को लीज़़ पर देना चालू है, जमींदार मौखिक समझौतों के तहत ज़मीन लीज़ पर देते हैं, जिनका रिकॉर्ड में ज़िक्र नहीं होता और आधिकारिक सर्वे में उन्हें छोटा कर दिखाया जाता है। इन अनदेखे ज़मीन समझौतों के चलते ही अकसर लोग तर्क देते हैं कि ज़मीन को किराए पर देने की प्रवृत्ति साल दर साल कम होती जा रही है।

गौर करने वाली बात है कि NSSO के ''भूमि और पशु सर्वे'' के आंकड़े बताते हैं कि अगर पूरे भारत की तस्वीर ली जाए तो पट्टेदारी में बड़ा इज़ाफ़ा हुआ है। सर्वे के मुताब़िक, 2002-03 से 2012-13 के बीच कुल कृषि योग्य भूमि पर पट्टेदारी का हिस्सा 6.6 प्रतिशत से बढ़कर 10.1 प्रतिशत हो गया।

किराएदारी पर विस्तृत अध्ययन कर इस लेख के लेखक ने बताया है कि कैसे पट्टेदारी बाज़ार में 1991-92 के बाद, बड़े पैमाने पर गरीब परिवारों को अधिकारविहीन कर दिया गया। जिन कानूनों द्वारा उनके अधिकारों की रक्षा होती थी, इस अवधि में ज्यादातर राज्यों के भीतर उन्हें कमजोर कर दिया गया। गरीब परिवारों को किसानों के मध्यम और अमीर वर्ग के चलते भी बाहर होना पड़ा। क्योंकि उन्होंने ज़मीनों को किराए पर लेना शुरू कर दिया, ताकि उनकी जोत का हिस्सा बढ़ सके। NSSO डेटा के मुताब़िक 2011-12 में पट्टेदारी के तहत जो 36 प्रतिशत ज़मीन थी, उसे महज़ 30 प्रतिशत अमीर ज़मीन मालिकों ने ही किराए से ले लिया था।

बड़े ज़मीन मालिकों के ज़मीन किराए पर लेने को कई बार गलती से प्रति-पट्टादारी समझ लिया जाता है। प्रति-पट्टेदारी एक ऐसा लेन-देन होता है, जिसमें छोटे-छोटे ज़मीन मालिक, एक बड़े मालिक को ली़ज़ पर ज़मीन देते हैं। भारतीय पट्टेदारी में आमतौर से बड़े ज़मींदार गरीबों को पट्टे पर ज़मीन देते हैं। या फिर समान वर्ग और जातीय स्थिति वालों की बीच यह लेन-देन होता है। कभी-कभार ही ज़मीन छोटे किसानों द्वारा बड़े मालिकों को पट्टे पर दी जाती है। 2011-12 में 77 प्रतिशत ज़मीन किराए पर दी गई, जिसे 30 प्रतिशत सबसे बड़े ज़मीन मालिकों ने पट्टे पर दिया। इसके उलट, निचले तबके के 50 प्रतिशत परिवारों ने महज़ सात प्रतिशत ज़मीन ही लीज़़ पर दी।

अमीर पूंजीवादी किसानों के बीच लीज़़ की बढ़ती मांग के बीच पट्टेदारी समझौतों की शर्तों में भी बड़ा बदलाव आया है। अमीर किसान आमतौर पर अपना किराया नगद में देते हैं। वहीं गरीब पट्टेदार फसल में हिस्सेदारी से किराया चुकाते हैं। इससे उन्हें ज़मीन मालिकों के साथ ज़ोखिम साझा करने और फसल कटने तक किराए को टाल देने की सहूलियत मिल जाती है। 1991-92 से 2011-12 के बीच स्थायी-किराये समझौतों में 22 प्रतिशत का उछाल आया। गांवों के अमीर नगद किराए से गरीबों की ज़मीनें छीन सकते हैं, इस प्रायिकता को देखते हुए कहा जा सकता है कि गरीबों को कष्टदायक शर्तों के तहत भी समझौते करने होते होंगे। प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन से पता चला है कि गरीब पट्टेदार आधी से तीन चौथाई तक फसल का हिस्सा या स्थायी किराया लीज़ के लिए देते हैं। पट्टा देने वाला कई बार समझौतों में दूसरी शर्तें भी रखता है।

पिछले दो दशकों के दौरान, राज्य का पट्टेदारी की नीति पर उद्देश्य पूरी तरह बदल गया है। तय अवधि की सुरक्षा और जोतने वाले को ज़मीन देने की जगह, अब राज्य ने अमीरों को भरोसा दिलाया है कि उन्हें अपनी ज़मीनें खोने का डर नहीं होगा। 2016 में हक़ कमेटी के प्रस्ताव पर बनाए गए मॉडल लॉ में ज़मींदारों को ''ज़मीन के अधिकारों की पूरी सुरक्षा'' दी गई है। इसके प्रावधान के तहत, तय अवधि के बाद "पट्टेदार के पास बिना किसी न्यूनतम ज़मीन को छोड़े'' ज़मींदार का ज़मीन पर अपने आप अधिकार हो जाता है।

इस कानून में राज्य की ''विशेष शक्तियों'' को भी खत्म कर दिया गया है। इन विशेष शक्तियों के तहत राज्य किराये राशि की सीमा तय कर सकता था। या किसी समझौते में शोषणकारी प्रवाधानों को हटा सकता था। प्रस्तावित कानून, ज़मीन समझौते की शर्तें, मालिक और किराएदार के बीच छोड़ देता है। इसमें मालिक को ज़मीन खोने या ''किसी अवधि के लिए भूमि पर लगातार कब्जे के अधिकार के बदले, किरायेदार की ओर से अनुचित उम्मीद'' का डर नहीं है।

पट्टेदारी बाज़ार उदारीकरण के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि कम पैसे मिलने के चलते किसान खुद अपनी ज़मीन को देना चाहता है और उनका किसी दूसरे गैर-कृषिगत व्यवसाय में जाना बेहतर होगा। छोटी भूमियां कई वज़हों से गैरलाभकारी बन गई हैं, जैसे उत्पाद की लागत में तेज वृद्धि, उत्पाद का सही मूल्य न मिल पाना, औपचारिक ऋण और सार्वजनिक निवेश की कमी। यह सभी 1991 में सुधार के बाद लागू हुईं राज्य नीतियों का परिणाम हैं। प्रधानमंत्री किसान योजना, किसान क्रेडिट कार्ड योजना और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी सरकारी योजनाओं में गरीब पट्टेदारों की कोई जगह नहीं है।

हक़ कमेटी का कहना है कि ज़मीन के बड़े हिस्सों को ज़मीन मालिक किराये पर नहीं देते, क्योंकि उन्हें अपनी ज़मीन खोने का डर होता है। दरअसल ज़मीन इसलिए खाली नहीं रहती कि गरीब किसान इसे लीज़़ पर नहीं दे पाते, बल्कि यह सिंचाई सुविधाओं की कमी और उत्पाद के कम मूल्य के चलते खाली रहती है। इसके बावजू़द जिंदा रहने के लिए गरीब किसान जितना हो सके, उतनी ज़मीन को जोतते हैं। ज़मीन खाली छोड़े जाने की समस्या अमीर वर्ग में अधिक है।

तथ्य यह है कि अभी तक की सबसे ऊंची बेरोज़गारी के दौर में ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी ग्रामीण गरीबों को आर्थिक सुरक्षा मुहैया करता है। यह उच्चतम दर्ज़े का घटियापन है कि कामगारों के गरीब तबकों की चिंताओं को, अमीर ज़मींदारों और पूंजीवादियों के लिए ज़मीन हड़पने के हथियार के तौर पर लाए जा रहे प्रावधानों का तर्क बनाकर पेश किया जा रहा है। आज देश जिस कृषि संकट का सामना कर रहा है, उससे निपटने के लिए जरूरी है कि राज्य गरीब पट्टेदारों और छोटे ज़मीन मालिकों की मदद के लिए प्रावधान बनाए, न कि उनसे उनकी ज़मीनें छीनी। 

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आपने नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Liberalising Tenancy or Grabbing Land of the Poor?

Land Reforms
Haque Committee
Leasing of Land
Land Tenancy
Poor farmers
Modi government
Neo-liberal policies
Land Reform Policies
NITI Aayog
Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana
Kisan Credit Card
Tenancy Reforms

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

ज्ञानवापी विवाद, मोदी सरकार के 8 साल और कांग्रेस का दामन छोड़ते नेता


बाकी खबरें

  • Yoweri Museveni
    सिलजा फ़्रोलिच
    अफ़्रीका : तानाशाह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कर रहे हैं
    11 Jan 2022
    युगांडा के राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी पर फर्जी सोशल मीडिया एकाउंट्स के ज़रिये अपनी सत्ता को मज़बूत करने का आरोप है। लेकिन वे अफ़्रीका में अकेले नहीं हैं। क्या महाद्वीप में सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए…
  • Elizabeth Holmes
    प्रबीर पुरकायस्थ
    एलिज़ाबेथ होम्स फ़ैसला: अमरीका में ग्राहकों से ठगी जायज़, पर निवेशकों से झूठ नहीं चलेगा
    11 Jan 2022
    अमरीका का जाना-परखा न्याय यही कहता है, कि उपभोक्ता ठग होते हैं और उनको ठगने में कोई गुनाह नहीं है। लेकिन निवेशकर्ताओं के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जा सकता है, वे बड़े धनपति जो हैं। 
  • covid
    दित्सा भट्टाचार्य
    भारत की कोविड-19 मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 6-7 गुना अधिक हैं: विश्लेषण
    11 Jan 2022
    नए अध्ययन के मुताबिक भारत में 2020 में अपेक्षित मृत्यु दर से कम की तुलना में 2021 में उच्च कोविड मृत्यु दर इस विषय में और अधिक शोध की मांग करता है।
  • Anand
    सत्यम श्रीवास्तव
    मध्य प्रदेश आनंद विभाग: कर्मकांड और प्रचार से दूर 'आनंद' की हक़ीक़त
    11 Jan 2022
    हिंदुस्तान में यह पहली बार हुआ था कि किसी एक राज्य (मध्य प्रदेश) में अपने नागरिकों की खुशहाली को मापने और खुशहाली का प्रचार-प्रसार करने के लिए सांस्थानिक स्तर पर पहल की। लेकिन सरकार द्वारा किए गए काम…
  •  Kashmir’s apple industry
    न्यूज़क्लिक टीम
    कश्मीर के सेब व्यापारी अपने भविष्य के लिए चिंतित, सरकार की तरफ़ से नहीं मिल रही मदद
    11 Jan 2022
    क़रीब 8,000 करोड़ के कश्मीर के सेब उद्योग को इलाक़े की अर्थव्यवस्था की बैकबोन माना जाता है, जिससे 30 लाख से ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं। मौजूदा समय में, #कश्मीरघाटी में 2,400 करोड़ तक की लागत के सेब का बाज़ार…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License