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‘लव जिहाद’ के ख़िलाफ़ योगी सरकार के अवैध धर्मांतरण वाले अध्यादेश में क्या है?
योगी सरकार के मुताबिक उत्तर प्रदेश में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने और महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए के लिए यह अध्यादेश ज़रूरी था। हालांकि इसके आलोचकों का कहना है इस तरह के कानून महिलाओं के अधिकारों में दखल के साथ ही सांप्रदायिक उन्माद फैलाने का हथियार भी हैं।
सोनिया यादव
25 Nov 2020
Image Courtesy:  The New Indian Express
Image Courtesy: The New Indian Express

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते 31 अक्टूबर को जौनपुर की एक चुनावी रैली में कहा था कि लव-जिहाद पर कड़ा क़ानून बनेगा। अब योगी कैबिनेट ने इस पर अमल करते हुए मंगलवार, 24 नवंबर को बिना लव जिहाद का जिक्र किए 'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020' को मंज़ूरी दे दी है।  

इस कानून के तहत अवैध धर्मांतरण अपराध की श्रेणी में आएगा। इसके लिए अलग-अलग केस में एक से दस साल की सजा के प्रावधान के साथ ही आर्थिक दंड भी होगा। राज्यपाल की सहमति के बाद यह अध्यादेश प्रदेश भर में लागू हो जाएगा।

इस अध्यादेश के संबंध में जानकारी देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा, “शादी के लिए जबरन धर्मांतरण के वाक़ये बढ़ रहे थे। ऐसे में यह क़ानून ज़रूरी था। 100 से ज़्यादा ऐसे मामले सामने आए हैं। ये धर्मांतरण छल से और जबरन कराए गए हैं। यहां तक कि हाईकोर्ट ने भी आदेश दिया है कि जिन राज्यों में शादी के लिए धर्मांतरण हो रहे हैं वो अवैध हैं।"

हालांकि कानपुर में तथाकथित 'लव जिहाद' मामले की जांच कर रही स्‍पेशल इनवेस्‍टीगेशन टीम (एसआईटी) ने कहा है कि उसे साजिश के तहत संगठित रूप से धर्म परिवर्तन करके शादी का कोई सबूत नहीं मिला है और न ही इसमें किसी तरह की विदेशी फंडिंग पाई गई है।

सिद्धार्थनाथ सिंह के अनुसार उत्तर प्रदेश में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह अध्यादेश ज़रूरी था। महिलाओं और ख़ास करके अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए यह एक ज़रूरी क़दम है।

इस प्रस्तावित अध्यादेश में क्या है?

  • योगी सरकार के इस अध्यादेश के अनुसार 'अवैध धर्मांतरण' के तहत ऐसे धर्म परिवर्तन को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा, जो झूठ, धोखा, दबाव या प्रलोभन देकर या ऐसे किसी तरीकों से शादी कराकर हुआ हो।
  • इस अध्यादेश के अनुसार 'अवैध धर्मांतरण' अगर किसी नाबालिग़ या अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं के साथ होता है तो तीन से 10 साल की क़ैद और 25 हज़ार रुपये का जुर्माना भरना पड़ेगा।
  • सामूहिक धर्म परिवर्तन कराने वाले सामाजिक संगठनों का रजिस्ट्रेशन कैंसल कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अगर सामूहिक धर्मांतरण होता है तो सज़ा में तीन से 10 साल की जेल होगी और इसमें शामिल संगठन पर 50 हज़ार रुपये का जुर्माना लगेगा।
  • जिस व्यक्ति पर जबरन या धोखे से धर्म परिवर्तन कराने, शादी करने/कराने का आरोप है, उसे ही साबित करना होगा कि ऐसा नहीं किया गया है।
  • आरोपी साबित होने पर सजा के साथ ही विवाह भी रद्द माना जाएगा।
  • ऐसा अपराध ग़ैर-जमानती की श्रेणी में होगा। दोषी पाए जाने पर एक से पांच साल तक सजा और 15 हजार रुपये का जुर्माना।
  • अगर कोई शादी के लिए धर्म परिवर्तन का इच्छुक है, तो उसे जिला मजिस्ट्रेट के सामने दो महीने पहले इसकी सूचना देनी होगी। इसका उल्लंघन किए जाने पर छह महीने से तीन साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

गौरतलब है कि सीएम योगी ने अपने भाषण में इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच जज के उस फ़ैसले का हवाला दिया था जिसमें शादी के लिए धर्मांतरण को अवैध बताया गया था। हालाँकि कैबिनेट मीटिंग से ठीक एक दिन पहले ही 23 नवंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता बताते हुए इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप को ग़लत बताया था।

क्या था पूरा मामला?

यूपी के कुशीनगर के रहने वाले सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार ने पिछले साल अगस्त में शादी की थी। विवाह से ठीक पहले प्रियंका ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था और अपना नाम बदल कर 'आलिया' रख लिया था।

प्रियंका के परिजनों ने इसके पीछे साज़िश का आरोप लगाते हुए सलामत के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी थी जिसमें उस पर अपहरण और जबरन विवाह करने जैसे आरोप लगाए थे। सलामत के ख़िलाफ़ पॉक्सो ऐक्ट की धाराएं भी लगाई गई थीं।

लेकिन पूरे मामले को सुनने के बाद अदालत ने सारे आरोप हटाते हुए कहा कि धर्म की परवाह न करते हुए अपनी पसंद के साथी के साथ जीवन बिताने का अधिकार जीवन के अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार में ही निहित है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में लड़की के परिजनों की ओर से लड़के के ख़िलाफ़ दर्ज कराई गई एफ़आईआर को निरस्त करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि अगर दो बालिग़ व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं तो इसमें किसी दूसरे व्यक्ति, परिवार और यहां तक कि सरकार को भी आपत्ति करने का अधिकार नहीं है।

यह फ़ैसला सुनाते वक़्त अदालत ने अपने उन पिछले फ़ैसलों को भी ग़लत बताया जिनमें कहा गया था कि विवाह के लिए धर्मांतरण प्रतिबंधित है और ऐसे विवाह अवैध हैं।

इसे पढ़ें : यूपी में लव जिहाद पर क़ानून सिर्फ़ 'सियासी' फ़ायदे के लिए बनाया जा रहा है?

बता दें कि देश के मौजूदा क़ानून में 'लव जिहाद' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। किसी भी केंद्रीय एजेंसी की ओर से 'लव जिहाद' का कोई मामला सूचित नहीं किया गया है। केंद्र सरकार ये साफ कर चुकी है कि लव जिहाद का कानून की नज़रों में कोई अस्तित्व नहीं है बावजूद इसके लव जिहाद पर घमासान जारी है। उत्तर प्रदेश के अलावा बीजेपी शासित मध्य-प्रदेश और हरियाणा की सरकारें भी इस तरह के क़ानून बनाने की बात कर चुकी हैं।

नारीवादी, सामाजिक संगठनों का विरोध

हालांकि नारीवादी, सामाजिक संगठन लगातार कथित लव जिहाद के मामलों और उनके खिलाफ बनने वाले कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इसे महिलाओं की आज़ादी के विरूद्ध राज्य पितृसत्ता के बंधनों से जोड़कर देख रहे हैं।

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) ने एक बयान जारी कर लव जिहाद के खिलाफ बनने वाले कानून को हिन्दू महिलाओं की आज़ादी पर, जीवन के फैसले खुद लेने के उनके संवैधानिक अधिकार पर हमला करार दिया है।

ऐपवा के अनुसार अभी तक देश और कई राज्यों के पुलिस तंत्र, जांच एजेंसी, और अदालतों ने कहा है कि "लव जिहाद" नाम का कोई प्रकरण है ही नहीं। इसका कोई सबूत नहीं है कि मुस्लिम नौजवान हिन्दू महिलाओं का प्रेम के बहाने धर्म परिवर्तन की साजिश रच रहे हैं। सच तो यह है कि भारत का युवा वर्ग, जाति और धर्म के बंधन को तोड़कर प्रेम कर रहे हैं - और यह स्वागत योग्य है, देश हित में है। भाजपा के अनुसार, हिन्दू महिला किसी मुस्लिम पुरुष से प्रेम करे, तो इसे "लव जिहाद" माना जाएगा और इस पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। कुल मिलाकर प्रेम के खिलाफ पितृसत्तात्मक हिंसा यानी "ऑनर क्राइम" को कानूनी हथियार सौंपा जा रहा है।”

ऐपवा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रति राव, राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी और राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन द्वारा जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि डॉ. अम्बेडकर ने मनुवादी पितृसत्ता की ताकतों का मुकाबला करते हुए, हिन्दू कोड बिल पारित किया था जिसमें हिन्दू महिलाओं की बराबरी और आजादी के कई पहलू थे। दहेज और सती प्रथा के खिलाफ लंबी लड़ाई के बाद कानून बने। इन कानूनों को कमजोर करने और हिंदू महिलाओं के  संविधान प्रदत अधिकारों को छीन लेने की भाजपाई साजिश है "लव जिहाद" के खिलाफ कानून। इसलिए आज हिन्दू लड़कियों और महिलाओं को मुस्लिम युवकों से नहीं बल्कि हिन्दुओं के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा से खतरा है। इतिहास गवाह है कि किसी भी धर्म के नाम पर देश चलाने वाली ताकतें महिलाओं के अधिकारों की दुश्मन होती हैं।

पितृसत्ता की देन है ‘लव जिहाद’

अंतरधार्मिक विवाह यानी दूसरे धर्म के लड़के से शादी को ‘लव जिहाद’ बताना पितृसत्तात्मक समाज की सोच है। एक ऐसी सोच जिसमें लड़कियों को नासमझ और अबला समझा जाता है, वे अपनी मर्ज़ी से अपनी पसंद का जीवनसाथी नहीं चुन सकती। जबकि कानून ये हर बालिग लड़की का अधिकार है।

इसे पढ़ें: लव जिहाद की कपोल कल्पनाएं क्यों? साफ़-साफ़ कहो तुम स्त्रीद्रोही हो!

महिला अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने वाली कमला भसीन बताती हैं, “हमारे समाज में लड़कियों को शुरू से ही दबा कर रखने की कोशिश की गई है। उसे क्या करना है, क्या पहनना है, किससे शादी करनी है, किससे सेक्स करना है ये सब वो खुद नहीं तय करती, उसके घर के पुरुष तय करते हैं। ऐसे में जब कोई लड़की लव मैरिज कर ले, वो भी दूसरे धर्म में तो ये बड़ी बात हो जाती है क्योंकि वो इस पितृसत्ता के बंधनों को चुनौती दे रही है। हमारा संविधान हमें वो सारे हक़ देता है, जो पुरुषों को मिले हुए हैं। ऐसे में कोई और हमारे लिए फ़ैसले कैसे ले सकता है।”

कमला आगे कहती हैं, “लव जिहाद की व्यवस्था सिर्फ़ नफ़रत और पितृसत्ता की सोच पर टिकी हुई है, जो लड़कियों को अपने हिसाब से कंट्रोल करना चाहते हैं। उनके अनुसार औरतें ‘बेवकूफ़’ हैं, और आसानी से मर्दों के ‘जाल’ में ‘फंस’ जाती हैं। लेकिन अब लड़कियां आगे बढ़ रही हैं और अपने लिए खुद फैसले ले रही हैं। मुझे उम्मीद है हम अब ख़ुद को और दूसरों के हाथों नियंत्रित नहीं होने देंगे, हमारी स्वतंत्रता एक बेहतर समाज के लिए ज़रूरी है।”

यौन उत्पीड़न को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश है ‘लव जिहाद’

कथित ‘लव जिहाद’ का एक और एंगल भी है, जिसे प्रताड़ना से जोड़कर देखा जाता है। दूसरे धर्म में शादी की मुख़ालिफ़त करने वाले लोगों का अक्सर ये मानना होता है कि ज्यादातर ऐसी शादियां मुकम्मल नहीं होती, महिलाओं का शोषण किया जाता, उनका इस्तेमाल कर उन्हें छोड़ दिया जाता है। और ये एक सोची समझी साज़िश के तहत किया जाता है।

महिलावादी संगठन से जुड़ी शबनम हाशमी इस संबंध में कहती हैं, ‘लव जिहाद’ को जस्टीफाई करने के तौर पर अक्सर यौन हिंसा की घटनाओं का ज़िक्र किया जाता है जिनमें पीड़िता ग़ैर-मुस्लिम और दोषी मुस्लिम हों। इसमें कई दावे सच होते हैं कई झूठ लेकिन हमें ये समझने की जरूरत है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं हैं। ये सिर्फ़ औरतों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश है। प्यार और स्वेच्छा से बने रिश्तों की तुलना ऐसी घटनाओं से करना कतई उचित नहीं है।”

धार्मिक उन्माद फैलाने का हथिहार है ‘लव जिहाद’

गौरतलब है कि लव जिहाद के खिलाफ कानून के आलोचकों का मानना है कि लव जिहाद का इस्तेमाल ज्यादातर समाज में दो धर्मों के बीच नफ़रत फैलाने के मकसद से होता है। तथाकथित ‘जिहाद’ को रोकने के लिए कट्टरवादी संगठन आए दिन ‘समुदाय विशेष’ के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते रहते हैं। शोषण से बचाने के नाम पर औरतों को किसी भी दूसरे समुदाय के मर्दों से शादी की इजाज़त नहीं दी जाती है। ये महिलाओं के अधिकारों में दखल तो है ही साथ ही सांप्रदायिका उन्माद फैलाने का हथिहार भी है। जिसे अब राजनीतिक पार्टियां अपने वोटबैंक को साधने का माध्यम बना रही हैं।

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