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मध्यप्रदेश : शक्कर कारखाने को बचाने के लिए सड़क पर उतरे किसान और मज़दूर
सहकारी शक्कर कारखाना कैलारस की स्थायी बंदी की कार्रवाई के ख़िलाफ़ किसान सभा, सीटू और सीपीएम कार्यकर्ताओं ने दिवाली के दिन विरोध प्रदर्शन किया।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
28 Oct 2019
workers protest

पूरा देश जब रविवार को दिवाली मना रहा था उस समय मध्य प्रदेश के चंबल इलाके के कैलारस तहसील के किसान और शक्कर मिल के कर्मचारी प्रदर्शन कर रहे थे। क्योंकि सहकारी शक्कर कारखाना कैलारस की स्थायी बंदी की कार्रवाई शुरू कर दी गई है। जिसे 2009- 10 में अस्थायी रूप से बंद किया गया था। इसके खिलाफ किसान सभा, सीटू और सीपीएम कार्यकर्ताओं ने दिवाली के दिन विरोध प्रदर्शन किया और तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा।

कैलारस का कारखाना इस जिले का एकमात्र सहकारी शक्कर कारखाना है। जिसे स्थायी रूप से बंद घोषित करने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा समापन अधिकारी (लिक्विडेटर) की नियुक्ति कर दी गई है। पंजीयक, सहकारी समितियां मध्य प्रदेश एम के अग्रवाल ने आदेश जारी कर उपसंचालक सहकारी संस्थाएं जिला मुरैना अनुभा सूद को समापन अधिकारी नियुक्त किया है। इसके बाद इस कारखाने को स्थाई रूप से बंद घोषित कर दिया जाएगा।

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मध्य प्रदेश किसान सभा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी एवं कारखाने के श्रमिक, कर्मचारियों और किसानों ने इसका पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि यह कारखाना क्षेत्र की जीवन रेखा है जिससे हजारों किसान परिवार व सैकड़ों श्रमिकों-कर्मचारियों के परिवार जुड़े हुए हैं। उनकी आजीविका चल रही है एक और सरकार इन्वेस्टर्स मीट बुलाती है और तमाम तरह की सुविधाएं देकर के कारखाने लगाने के लिए उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करती है दूसरी तरफ पूर्व से लगे हुए कारखाने को बंद किया जा रहा है यह अत्यंत आपत्तिजनक है।

मध्य प्रदेश किसान सभा के नेता अशोक तिवारी ने कहा कि डकैत प्रभावित क्षेत्र के विकास के लिए 1965 में सहकारी शक्कर कारखाना कैलारस जिला मुरैना की आधारशिला रखी गई थी, 1971 में यह कारखाना शुरू हुआ जिसमें  जौरा कैलारस, सबलगढ़, विजयपुर के लगभग 30000 किसान परिवार व पंद्रह सौ कर्मचारियों श्रमिकों के परिवार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े जिससे क्षेत्र के किसानों व कर्मचारियों का विकास हुआ। लोगों को रोजगार मिला कृषि का विकास हुआ लेकिन पिछले दिनों से इस कारखाने पर राजनेताओं की गिद्ध दृष्टि लग गई है, जिसके चलते भाजपा के 15 साल के शासन में तत्कालीन मुख्यमंत्री सांसद व राजनेताओं द्वारा वायदा किये जाने के बाद भी कारखाने को 2009 -10 के बाद नहीं चलाया गया, बंद होने के बाद चालू करने की घोषणा हुई परंतु कारखाना शुरू नहीं हुआ ।

आगे उन्होंने कहा कि गत वर्ष विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पदाधिकारियों राजनेताओं ने कारखाने को शुरू कराने का वायदा किया तत्कालीन सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी 15 दिन पूर्व कारखाने को शुरू कराने का आश्वासन दिया लेकिन उसके बाद भी कारखाने को शुरू कराना तो दूर की बात है बल्कि उसको स्थाई रूप से बंद कर खुर्दबुर्द करने निजी हाथों में सौंपने की तैयारियां शुरू कर दी गई है।  

किसान और मज़दूरों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाया कि वो निजी लोगों को फायदा पहुँचाने के लिए, इस शक़्कर मिल को निजी हाथों में सौंप रही है। किसान नेता और मध्य प्रदेश सीपीएम के पूर्व राज्य सचिव बदाल सरोज ने कहा कि जब इस मिल को बंद किया गया तो यह  घाटे में नहीं थी। बल्कि इसमें जितनी शक़्कर थी उसी को बेचकर और टैक्स में छूट देकर इसी चालू किया जा सकता था। लेकिन सरकारों में पहले बीजेपी की सरकार ने फिर अब कांग्रेस की सरकार ने जानबूझकर इसकी लागत को बढ़ाया और अब इसे औने पौने दाम पर बेचना चाहती है।

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आपको बता दे कि नौ साल से बंद कैलारस के सहकारी शक्कर कारखाना काे पिछले  साल तक चलाने के लिए चार करोड़ रुपये की दरकार थी। उसको भी सहकारिता विभाग ने पूरा नहीं किया ।

कैलारस शक्कर कारखाना को फिर से चलाने के लिए कागजी कवायद बीते कई साल से चल रही है। सीएम की घोषणा को पूरा करने के लिए राज्य शासन ने तीन साल पहले नेशनल शुगर फेडरेशन के तकनीकी सलाहकारों से यह अभिमत लिया था कि कारखाने की मशीनरी की हालत क्या है और कारखाना में शक्कर का उत्पादन करने पर संभावित कितना व्यय होगा। तकनीकी सलाहकार एसके सेठ  ने कैलारस पहुंचकर शक्कर कारखाना के हाउस की मशीनरी का बारीकी से अवलोकन किया था। मशीनरी की हालत को देखने के बाद जो रिपोर्ट तैयार हुई उसमें जिक्र था कि सहकारिता विभाग यदि कारखाना की 40 साल पुरानी मशीनरी को रिपेयर कराना चाहता है तो चार करोड़ रुपये का व्यय आएगा। इस खर्च के बाद कारखाना, शक्कर का उत्पादन करने की स्थिति में आ जाएगा। जबकि नए प्लांट पर 90 करोड़ रुपये व्यय होंगे।

इसके साथ ही ये कारखाना चलने से हज़ारो लोगों की रोजी रोटी भी बच जाएगी लेकिन यहां सवाल है कि फिर इसे सरकार  पुनः चालू क्यों नहीं करना चाहती है?

अशोक तिवारी बताते हैं कि इस मिल की करीब 65 एकड़ ज़मीन शहर के प्राइम लोकेशन पर है, इस पर कई लोगों की नज़र है। उसी को हड़पने के लिए घाटे का बहाना बताकर इसे बेचा जा रहा है। यह कारखाना क्षेत्र की जीवन रेखा है जिससे हजारों किसान परिवार व सैकड़ों श्रमिकों कर्मचारियों के परिवार जुड़े हुए हैं उनकी आजीविका चल रही है।

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प्रदर्शनकारियो ने कहा कि  नेताओ द्वारा चुनाव में कारखाने को चालू करने का वादा किया था लेकिन चालू करने का वादा कर कारखाने को बंद करने की कार्रवाई किया जाना वादाखिलाफी है। इस स्थिति से किसान व कर्मचारी अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने इसका पुरजोर विरोध करने, कारखाने को चलाने और किसान व कर्मचारियों का बकाया भुगतान करने के लिए जोरदार कार्रवाई शुरू कर दी है। इन लोगों ने 24 से विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। रविवार को लोगों ने काली दिवाली मनाई और शासन से कारखाने को चलाने की किसान कर्मचारियों के बकाया भुगतान की मांग की है। 

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