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“मेरे प्रिय फर्स्ट टाइम वोटर्स…”
मन की असली बात : फर्स्ट टाइम वोटर्स के साथ... "कैच दैम यंग"। यह मैंने संघ में रह कर सीखा। मेरा संघ भी बच्चों को शाखा में बचपन में ही बुलाना शुरू कर देता है और उन्हें अपना जैसा बना कर ही दम लेता है।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
05 May 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : Rediff.com

(डिसक्लेमर : इस संबोधन/आलेख का माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मन की बात’ से कोई संबंध नहीं हैं। अगर आपको ऐसा लगे तो इसे महज़ संयोग मात्र समझें : लेखक)

आज मैं मन की असली बात पहली बार वोट देने वालों नौजवानों के साथ करना चाहता हूं। पहली बार के वोटर मेरे लिए सबसे इंपोर्टेंट हैं क्योंकि उनको अगर एक बार अच्छी तरह पटा लिया जाये तो बारम्बार वोट मिलते रहेंगे। नये वोटर्स को पटाना आसान भी है जबकि पुराने वोटरों को पटाना मुश्किल है। वैसे तो जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में हैं, फिर भी पुराने वोटर्स, उनकी उम्र अधिक होती है, पता नहीं कब टपक जायें। नये वोटर्स ज्यादा टाइम तक टिकेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। इसलिए इस बार मन की असली बात फर्स्ट टाइम वोटर्स के साथ।

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मेरे प्रिय फर्स्ट टाइम वोटर्स, आप लोगों की उम्र आमतौर पर अट्ठारह (18) से तेइस (23) वर्ष के बीच होगी। पिछले चुनावों के समय आप तेरह साल से अटठारह साल के बीच की उम्र के रहे होगे। इस दौरान आप में से अधिकतर स्कूल जाया करते रहे हैं। आप लोगों को मैंने बार बार आपके स्कूल में संबोधित किया। मन की बात तो की ही, ऐसे प्रोग्राम भी किये, टीचर्स डे पर, बाल दिवस पर, स्वच्छ भारत दिवस पर, और भी कई बार जिनमें मैंने आपको  कई बार संबोधित किया। मैंने ऐसा प्रबंध किया कि सभी स्कूलों में मैं एक साथ टेलीविजन पर, प्रोजेक्टर स्क्रीन पर देखा और सुना जा सकूं। मैंने आदेश दिया कि ऐसे कार्यक्रमों में कोई भी छात्र, कोई भी शिक्षक अनुपस्थित न रहे। सब लोग वैसे भले ही कक्षा में आयें न आयें पर उस दिन अवश्य आयें जब मैं आप लोगों को संबोधित कर रहा हूँ। इस तरह से मैं पिछले पांच साल से लगातार आप लोगों को अपना बनाने की कोशिश में लगा हूं।

प्यारे बच्चों, अभी हाल तक तो आप बच्चे ही थे न। जब मैं पिछले पांच साल तक आपको मन की बात में, आपको लेकर बनाये गये विशेष कार्यक्रमों में, आपकी परीक्षा से पहले आपका धीरज बंधाने के बहाने, या फिर किसी भी और बहाने से, संबोधित करता था तो मन में विशेष ध्यान रहता था कि "कैच दैम यंग"। यानी आप सब को व्यस्क होने से पहले ही पकड़ लिया जाये। आप अपनी कोई सोच बनायें, इससे पहले ही आपको अपनी सोच में ढाल लिया जाये। यह मैंने संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) में रह कर सीखा। मेरा संघ भी बच्चों को शाखा में बचपन में ही बुलाना शुरू कर देता है और उन्हें अपना जैसा बना कर ही दम लेता है।

मेरे प्रिय फर्स्ट टाइम वोटर्स, मैं आपको बताना चाहता हूं कि आपका यह पहला वोट देश के काम आना चाहिए। मेरे काम आना चाहिए न कि किसी भी विरोधी के। यह पहला वोट बरबाद करने के लिए नहीं है। यह वोट आपको जिन्दगी भर याद रहेगा। आप स्वयं बताओ, आपका यह वोट पाकिस्तान में स्थित बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक के वीरों को समर्पित किया जाना चाहिए या नहीं। मेरे फर्स्ट टाइम वोटरों, आपका यह पहला वोट पुलवामा के शहीदों को समर्पित किया जाना चाहिए या नहीं। पर आप मुझसे यह न पूछें कि पुलवामा किसकी गलती से हुआ। आप मुझसे यह भी न पूछें कि पुलवामा में जो चूक हुई, उसके लिए कौन जिम्मेवार है। न ही यह सोचने/जानने का प्रयास करें कि क्या अगर सावधानी बरती जाती तो पुलवामा रोका जा सकता था। बस यह जान/समझ लें कि पुलवामा के लिए वोट किसे दिया जाये, मोदी को। सर्जीकल स्ट्राइक के लिए वोट किसे दिया जाये, मोदी को। कोई भी और हकदार नहीं है आपके पहले वोट का।

डीयर फर्स्ट टाइम वोटर्स, कई बार मैं सोचता हूँ कि यह पुलवामा का अटैक तो मेरे ही सौभाग्य से हुआ। न यह अटैक होता और न ही मैं चुनावों से पहले लोगों में यह राष्ट्र भक्ति जगा पाता। न पुलवामा का अटैक होता और न मैं बालाकोट पर सर्जिकल स्ट्राइक कर पाता। अब इस सर्जिकल स्ट्राइक में कितने आतंकवादी मरे, मरे भी या नहीं मरे, इससे हमें क्या मतलब। मुझे मुद्दा तो मिल गया। सारा का सारा चुनाव इसी मुद्दे पर लड़वा दिया। न विकास की बात, न रोजगार की बात। न कालेधन की बात और न ही भ्रष्टाचार की बात। धन्यवाद आतंकवादियों धन्यवाद! धन्यवाद पाकिस्तान धन्यवाद। तुम नहीं होते तो मेरे लिए मुश्किल ही मुश्किल थी। पुलवामा कर आपने यह चुनाव मेरी झोली में डाल दिया। मैं तो खुद चिंता में था कि इस चुनाव में क्या मुद्दा उठाउंगा। थेंक यू वंस अगेन।

मेरे प्रिय फर्स्ट टाइम वोटर्स, आप यह न सोचें कि इस समय आम चुनाव हैं और आचार संहिता लागू है। और आचार संहिता के अनुसार चुनावी रैली में, वोट मांगते हुए सेना का जिक्र कर वोट मांगना आचार संहिता का उल्लंघन है। पहले सभी दल इस बात को मानते रहे हैं। पर यह मोदी है, यह बहुत सारी बातें नहीं मानता है। मोदी आचार संहिता को अचार संहिता समझता है। उसे थेपले के साथ खा जाता है और उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है। चुनाव आयोग कुछ कदम उठाता उससे पहले ही मैंने उन्हें समझा दिया कि सर्जीकल स्ट्राइक आरएसएस के स्वयंसेवकों ने की थी और पुलवामा में भाजपा के कार्यकर्ता शहीद हुए थे। और मेरी बात चुनाव आयोग समझ भी गया। मेरे खिलाफ कुछ नहीं किया। बस आप लोग भी समझ लो, पुलवामा के शहीदों के लिए, बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक के लिए, वोट मुझे ही देना है।

अंत में दोहा :

हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आय। 

सरकारी खर्च पर (मन की) बात कर, मैंने वोटर लिये पटाय।।

 

(लेखक पेश से चिकित्सक हैं।)

इसे भी पढ़ें :मन की असली बात : युवाओं के साथ

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"मन की असली बात"

“प्यारे बहनों-भाइयों, नोटबंदी पार्ट-2 के लिए तैयार रहें”

 

Satire
Political satire
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