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भारत
राजनीति
महाराष्ट्र संकट : अकेला विधायक जो होटल में कभी नहीं दिखा
...और महाराष्ट्र से नौ ऐसे सबक़ जिनसे सीख लेने की ज़रूरत।
उज्ज्वल के. चौधरी
27 Nov 2019
महाराष्ट्र

पांच दिन पहले यानी शनिवार को महाराष्ट्र में सरकार बनी लेकिन जल्द ही गिर गई। इस सरकार के दो शीर्ष नेताओं देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार ने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है। अब ग़ैर बीजेपी की सरकार बनने के लिए मंच तैयार हो गया। यह एक सबक़ है जिसे बीजेपी और उसके मित्र दलों ने लगभग एक महीना लंबे चले उठापटक से सीखा है।

सबसे पहले, संविधान दिवस के मौके पर सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ा हुआ और पूरी तरह से पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए खुले बैलट और कैमरे के ज़रिए जल्द फ्लोर टेस्ट का आदेश दे दिया। जैसा ही शीर्ष अदालत ने यह फ़ैसला सुनाया फडणवीस और उनके उपमुख्यमंत्री राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के विद्रोही नेता अजीत पवार ने अपने दुर्भावनापूर्ण कदम के स्वाभाविक परिणाम को स्वीकार कर लिया। न्यायपालिका की भूमिका पर लोगों को कुछ उम्मीद भी हो सकती है।

दूसरा, इस बेतुके मामले में शामिल सभी खलनायक का खुलासा होना चाहिए। शिवसेना ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन चुनावों के बाद पहले की गई बातचीत के मुताबिक उसे सरकार में 50-50 की हिस्सेदारी चाहिए थी। एनसीपी ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने का बीड़ा उठाया लेकिन जब कांग्रेस पार्टी ने इसे समर्थन का पत्र नहीं दिया तो यह भी हिचकिचा गई। शुरू में कांग्रेस नहीं चाहती थी लेकिन अब उसकी राज्य इकाई के दबाव के बाद हाईकमान ने शिवसेना की अगुवाई में सरकार बनाने का समर्थन दे दिया है। और बीजेपी ने महाराष्ट्र में लागू हुए राष्ट्रपति शासन को रद्द करते हुए गुपचुप तरीक़े से गुप्त सरकार का गठन किया।

तीसरा पहलू राज्यपाल संबंधी पक्षपात का है: मैंने 21 वीं शताब्दी में ब्रिटिश राज-जैसे गवर्नर के पद की अप्रासंगिकता पर पहले लिखा है। यह अप्रासंगिकता एक बार फिर सामने आई है। संविधान में स्पष्ट रूप से यह लिखे होने के बावजूद राज्यपाल को स्वयं को आश्वस्त करना चाहिए कि सरकार बनाने की क्षमता का दावा करने वालों के पास वास्तव में पर्याप्त संख्याएं हैं या नहीं, केंद्र में बीजेपी के पूर्व मंत्री रह चुके राज्यपाल दबाव में आए या इस नाटक का हिस्सा बन गई जिसने उनकी संवैधानिक स्थिति का मजा़ाक उड़ाया।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय से ही राज्यपालों की पक्षपाती भूमिका और उनके राजनीतिक दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। देश को राज्यपालों की भूमिका और उद्देश्य पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि क्या यह पद एक उपयोगी उद्देश्य के लिए है। हालांकि, केंद्र में केवल एक बहुदलीय सरकार जिसमें किसी एक दल के पास भारी बहुमत नहीं है और न ही कोई व्यक्ति अंतिम शक्ति रखता है उसे इस संबंध में संशोधन शुरू करना चाहिए।

चौथा, हमने सीखा कि राजनीतिक दलों में आज वैचारिक मर्यादाओं और दृढ़ विश्वासों का अभाव है। विचारधारा लगभग इतिहास बन गया है। शिवसेना ने अपना हिंदुत्व दृष्टिकोण खो दिया और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया; उधर राकांपा और कांग्रेस ने शिवसेना के साथ गठजोड़ करके अपने सांप्रदायिक-विरोधी चेहरे को गंवा दिया, और बीजेपी अपनी भ्रष्टाचार विरोधी चरित्र को खो दिया है जब उसने भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे अजीत पवार के साथ गठबंधन कर लिया था।

इसलिए, जो सबक़ हमने सीखा है वह यह है कि समायोजन, समझौता और कॉमन मिनिमम प्रोग्राम्स (कल्याण और शासन पर केंद्रित) का एक युग इस वक़्त की महक है।

पांचवां, बीजेपी के लंबे समय से बेदाग़ और भ्रष्टाचार से मुक्त होने के दावे का एक बार फिर पर्दाफ़ाश हुआ। प्रधानमंत्री ने बिना कैबिनेट की बैठक के महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन रद्द करने के लिए अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल किया। इसे 5 बजे राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित किया गया था और महाराष्ट्र के राज्यपाल द्वारा कार्रवाई के लिए छोड़ दिया गया। शपथ समारोह सुबह 8 बजे से ठीक पहले हुआ और फडणवीस को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिला दी गई, जबकि पवार को डिप्टी सीएम बना दिया गया। यह पवार हैं जिनके ख़िलाफ़ फडणवीस सरकार ने 70,000 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के मामले में जांच कर रही है। सिर्फ़ इतना ही नहीं: भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने पवार को पदभार ग्रहण करने के महज़ दो दिनों के भीतर ही घोषणा कर दिया कि नौ प्रमुख आरोप अजीत पवार टिकने वाले नहीं हैं।

ये पूरा मामला भ्रष्टाचार का है। यह कर्नाटक, गोवा, मणिपुर और अन्य जगहों पर कथित रूप से विधायकों का समर्थन हासिल करने के मुद्दे से अलग है।

छठा, रिज़ॉर्ट और होटल की राजनीति का मामला है। हर चुनाव के बाद जहां भी कोई स्पष्ट बहुमत नहीं होता है तो मीडिया और जनता के मन में विपक्षी विधायकों की सुरक्षा का मुद्दा सामने आ जाता है। विभिन्न पार्टियां अपने विधायकों को अपने राज्यों के भीतर या बाहर विभिन्न होटलों में छिपा देती हैं और यह एक स्थायी विशेषता बन गई है जिसे गोवा, कर्नाटक और अब महाराष्ट्र में देखा गया है। इस तरह की चीजें पहले भी हुई थीं लेकिन कभी कभार हुई थी। राजनीति और लोगों के जनादेश का मज़ाक बनते हुए मोदी-शाह के दौर में यह निरंतर हो रहा है।

सातवां, भारत में एक दलबदल-विरोधी क़ानून है जिसके द्वारा यदि विधायकों का एक समूह अपनी पार्टी से अलग होना चाहता है तो उसके पास उस सदन (केंद्र या राज्य) में उस पार्टी के कुल निर्वाचित सदस्यों में से एक-तिहाई या अधिक होना चाहिए। इसलिए, छिटपुट दलबदल तो रुक जाता है पर बड़े पैमाने पर दलबदल की अनुमति अब भी बरक़रार है। किसी भी निर्वाचित सदस्य द्वारा दलबदल को समाप्त करने का अब समय आ गया है। कोई इस्तीफा दे सकता है, या कोई पार्टी दूसरे के साथ गठबंधन करने या गठबंधन से दूर जाने के लिए समग्र रुप से फैसला कर सकती है। लेकिन अकेले सदस्य को चाहे वह एक हो या कुछ या कई उसे अपने अनुसार दल बदल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

आठवां, यह मीडिया के लिए भी एक सबक़ है। दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया का बड़ा तबक़ा सत्तारूढ़ दल का पालतू जानवर बल गया है और इसे आधी रात के दुस्साहस को "मास्टरस्ट्रोक" कहा जो हाल के दिनों में एक बहुप्रचलित शब्द भी है। इसके अलावा, चाणक्य-नीति ’का इस्तेमाल प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जैसी जांच एजेंसियों के खुले इस्तेमाल और विधायकों के समर्थन की पेशकश और ख़रीद के लिए किया गया है। मीडिया को रखवाली करने की ज़रूरत है और सत्ता में बैठे लोगों पर सवाल उठाने के लिए पूरी तरह से खड़ा होना चाहिए चाहे वह किसी की भी सरकार हो या किसी भी सरकार में बैठा कोई व्यक्ति हो।

नौवां: विपक्ष न्यूनतम साझा कार्यक्रम के साथ एकजुट होकर काम करने का सबक़ सीख सकता है। यदि वे पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार के नेतृत्व वाली सरकार के “जनविरोधी क़दमों और आर्थिक विफलताओं” को ज़बरदस्त तरीक़े से ग़लत साबित करने के इच्छुक हैं तो उन्हें प्रत्येक राज्य के लिए एक अलग रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है। विपक्ष की अगुवाई वाली राज्य सरकारों में एक जन-समर्थक भूमिका लोगों को मतदान और समर्थन पर विचार करने के लिए एक उदाहरण स्थापित करेगी। व्यवहार्य और दृढ़ विपक्ष की अनुपस्थिति भारत को केवल एक-दल की निरंकुशता की ओर धकेल देगी जिसके लिए विपक्ष उतना ही ज़िम्मेदार होगा जितना कि सत्ताधारी दल। महाराष्ट्र में विपक्ष का ग़लत साबित करना व्यर्थ नहीं किया जाना चाहिए। विपक्षी खेमे में कुछ भावना को जगाना चाहिए।

दसवां, यह ध्यान देना दिलचस्प है कि महाराष्ट्र में सबसे ग़रीब विधायक एकमात्र विधायक थे जिन्हें किसी ने ख़रीद-फ़रोख्त के लिए संपर्क नहीं किया था। वह इस ख़रीद-फरोख़्त में सामने नहीं आए। वह किसी होटल में नहीं दिखे। और चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद भी वह ख़ामोशी से अपने निर्वाचन क्षेत्र में काम कर रहे थे। वह हैं विनोद निकोले जो सीपीएम की तरफ़ से विधायक हैं उन्होंने दहानु से चुनाव जीता है। इन्होंने केवल 52,000 रुपये की संपत्ति घोषित की है जो सभी विधायकों से बहुत कम है। पार्टियों के लिए सबक यह है कि किसी को लाखों भूखे लोगों की सेवा करने के लिए अरबों रुपये की ज़रूरत नहीं है।

लेखक कोलकाता स्थित एडमस विश्वविद्यालय के प्रो वाइस चांसलर हैं।

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