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राजनीति
#महाराष्ट्र_सूखा : सूखे से निजात के लिए किसानों को मामूली सरकारी मदद
सरकार द्वारा दी जा रही मामूली राशि पर टिप्पणी करते हुए एक किसान कहते हैं, “क्या आपको लगता है कि हमें मदद मिली है? नहीं! ऐसा सिर्फ चुनाव को लेकर हुआ है।”
अमय तिरोदकर
12 Mar 2019
#MahaDrought
असोला गांव के किसान ग्राम पंचायत की दीवार पर लगी सरकारी सहायता की सूची में अपना नाम तलाशते हुए।

[वर्ष 1972 के बाद से महाराष्ट्र ने कई बार सूखे की मार झेली लेकिन इस बार ये राज्य सबसे ज़्यादा प्रभावित है। राज्य सरकार ने 350 में से 180 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। पूरा मराठवाड़ा (दक्षिणी और पूर्वी महाराष्ट्र का क्षेत्र) क्षेत्र अब बेहद ख़तरनाक स्थिति में है। न्यूज़क्लिक द्वारा ग्राउंड रिपोर्ट की श्रृंखला का यह पांचवा भाग है।]

maharashtra2.jpg
जब न्यूज़क्लिक इस क्षेत्र में पहुंचा तो देखा कि बीड ज़िले में धरुर तहसील के असोला गांव के किसान ग्राम पंचायत दफ्तर की दीवार पर लगे नोटिस बोर्ड पर अपना नाम खोज रहे थे। उन्हें हाल में ही पता चला था कि सरकार ने सहायता के लिए इस सूची की घोषणा की है। हर कोई इस लंबी सूची में अपना नाम खोज रहा था। कुछ किसान खुश होकर लौट रहे थें कुछ किसान निराश होकर।

इस सूची में पैंतीस साल के महादेव मुंडे का नाम शामिल है। महादेव कहते हैं, "मुझे इस बार हुए अकाल के लिए 5,372 रुपये की सहायता मिली है और भारी बारिश के कारण साल 2016 में हुए फसलों के नुकसान के लिए 4,554 रुपये की सहायता मिली है।" अब तक की कुल सहायता राशि मात्र 9,926 रुपये है। यह पूछे जाने पर कि क्या आप इस राशि से संतुष्ट हैं तो महादेव कहते हैं, “अगर मैं कहूं कि मैं खुश नहीं हूं तो मुझे क्या मिलेगा? क्या यह सरकार मुझे और राशि देगी? इसलिए चुप रहना बेहतर है और जो कुछ भी मिलता है उसे हासिल करें।” यह महाराष्ट्र में किसानों के लिए लागू किए गए योजनाओं की ज़मीनी सच्चाई है जिसका बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया गया लेकिन सही तरीके से लागू नहीं किया गया।

महादेव के पड़ोसी रामाशंकर सुरवसे राज्य सरकार द्वारा दी गई सहायता की वास्तविकता बताते हैं। वे कहते हैं, “मेरे पास 3 एकड़ ज़मीन है। मैं प्रति वर्ष कपास की फसल से लगभग 1 लाख रुपये कमाई कर लेता था। लेकिन इस साल महज 40,000 रुपये ही हासिल हुए हैं। इतना तो मैं खेत में ही निवेश करता हूं। बीज से लेकर रोपाई और रोपाई से लेकर खाद पानी तक कुल 40,000 रुपये लगते है। तो इसमें मेरा फायदा क्या है? मतलब कुछ भी नहीं। ऐसी स्थिति में मुझे सहायता के रूप में 6,800 रुपये मिले। क्या यह पर्याप्त होगा? यह मात्र 2100 रुपये प्रति एकड़ है।”

महाराष्ट्र सरकार ने 350 में से 180 तहसीलों में सूखे की घोषणा की है। यह भी घोषणा की गई है कि किसानों का ध्यान रखा जाएगा और किसानों को सहायता राशि हस्तांतरित करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। लेकिन दी गई सहायता राशि इतनी कम है कि कोई किसान इसके सहारे एक महीने भी नहीं रह पाएंगे।

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किसानों की सूची जिन्हें सरकारी सहायता मिली है।

अखिल भारतीय किसान सभा के डॉ. अजीत नवाले कहते हैं, “हम पहले ही मांग कर चुके हैं कि किसानों को सूखे की सहायता के रूप में 40,000 रुपये मिलने चाहिए। सरकार ने किसानों के लिए कई योजनाओं की सूची दी है। इसने हमें आश्वासन भी दिया है कि वह प्रति एकड़ सहायता राशि बढ़ाने के बारे में सोचेगी। 2,000 रुपये से लेकर 2,500 रुपये तक इतनी कम राशि है कि यह मदद नहीं है बल्कि यह एक भौंडा मज़ाक की तरह दिखाई देता है।”

लेकिन असोला गांव महाराष्ट्र के उन गांवों में से एक है जो भाग्यशाली था। कई अन्य गांव भी हैं जहां किसानों को न्यूनतम सहायता भी नहीं मिली है। उस्मानाबाद के भूम तहसील में लीत ग्राम के दत्ताभाऊ आसलकर कहते हैं, “अब तक हमारे गांव के किसी भी किसान को सूखे की सहायता के लिए एक रुपया भी नहीं मिला है। हमने केवल टेलीविजन चैनलों पर खबरों में देखा है कि सरकार किसानों को पैसा दे रही है।”

सहायता तथा पुनर्वास मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने फोन पर न्यूज़़क्लिक को बताया कि कई गांवों में राशि हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उन्होंने कहा, “यह सच हो सकता है कि कुछ गांव छूट गए हों। लेकिन मैं सभी किसानों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि राज्य सरकार सूखे का सामना कर रहे सभी लोगों को पर्याप्त मदद देने के लिए प्रतिबद्ध है। सूखे से संबंधित सहायता और अन्य कार्यों के लिए कुल राशि 8,000 करोड़ रुपये है जो महाराष्ट्र में अब तक की सबसे अधिक राशि है।”

लातूर ज़िले के निलंगा तहसील के बोतकुल गांव के 28 वर्षीय किसान सचिन मोरे अपने गांव में एक केले के खेत में न्यूज़क्लिक को ले गए। इस खेत की पूरी फसल बर्बाद हो चुकी है। उन्होंने कहा, “इस खेत को देखिए, इसके मालिक इससे कम से कम 3 लाख रुपये कमाते होंगे। लेकिन भीषण सूखे के कारण इनके खेत में कुछ भी नहीं बचा है। मेरी पपीते के खेती की भी यही कहानी है। क्या आपको लगता है कि 2,000-3,000 रुपये की यह छोटी राशि हमारी किसी भी तरह से मदद कर सकती है?"

असोला गांव में पैंसठ वर्ष के पांडुरंग सरोदे ग्राम पंचायत की दीवार पर लगी सरकारी सहायता की सूची को लेकर चुटकी ली। वे कहते हैं. “तुम्हाला वताते ही मदत आली? नहीं। हाय तार इलेक्शन आली! (क्या आपको लगता है कि हमें मदद मिली है? नहीं! ऐसा सिर्फ चुनाव को लेकर हुआ है!)।"

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