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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव : औरंगाबाद औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिकों के बीच भय और असुरक्षा का माहौल
एक स्थानीय भाषाई दैनिक अख़बार ने हाल ही में औरंगाबाद औद्योगिक क्षेत्र और आसपास से 50,000 मज़दूरों, जिनमें से ज़्यादातर ठेका मज़दूर थे, को काम से निकाले जाने की ख़बर छापी है।
अमय तिरोदकर
11 Oct 2019
Translated by महेश कुमार
Maharashtra Assembly Polls
फोटो साभार: न्यूज़ 18 

माधव जेवुघाले अब 59 वर्ष के हैं और पिछले 40 वर्षों से औरंगाबाद की ग्रीव्स कॉटन कंपनी की चिखलथाना इकाई में काम कर रहे हैं। अब उनके रिटायरमेंट में सिर्फ़ एक साल बचा है। लेकिन वे कंपनी में चल रहे हालात के साथ साथ अगली पीढ़ी के मज़दूरों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

जेवुघाले कहते हैं “औद्योगिक मजदूर की अवधारणा को ही योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया जा रहा है। इसके पीछे दो वजहें हैं। एक तो इसके पीछे वजह अर्थव्यवस्था का वर्तमान स्वरूप है तो दूसरा मिल मालिकों की नीयत में आया बदलाव है। हमारे वास्तविक मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं, जबकि उनकी कोशिश है कि पहले कम उत्पादन कर मज़दूरों की संख्या में कमी लाई जाए। इसके ज़रिये, वे स्थायी मज़दूरों को समाप्त करना चाहते हैं।”

माधव ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) से जुड़े रहे हैं। उन्हें लगता है कि मराठवाड़ा के पूरे औद्योगिक क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन काम कम हो रहा है। उनके अनुसार, यह सब स्वचालित व्यवस्था को लाने के कारण है और यह स्थिति वर्तमान में और साथ ही भविष्य में काम के अवसरों के संदर्भ में श्रमिक बल को मार रही है।

उन्होंने आगे बताया कि “हम अपनी कंपनी में अब केवल 78 स्थायी कर्मचारी बचे हैं। जबकि 1980 में यह संख्या 1,000 थी। कंपनियों को भर्ती के अन्य विकल्प मिल रहे हैं, जैसे ठेके पर मज़दूरों की भर्ती करना आदि। यह अंततः स्थायी श्रमिकों की ताक़त को कम कर देता है।"

औद्योगिक श्रमिकों के सामने एक सबसे गंभीर और महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि कंपनियां कई संयंत्रों की स्थापना करके हर जगह काम की क्षमता को कम कर देती हैं। उदाहरण के लिए, ग्रीव्स कॉटन की महाराष्ट्र में तीन इकाइयाँ हैं। यह डीज़ल इंजन बनाती हैं। इस कंपनी को प्रति माह 30,000 इंजनों की आवश्यकता है और इस मात्रा को चिकलथाना प्लांट से ही पूरा किया जा सकता है यानी इस इकाई में ही उपरोक्त संख्या का उत्पादन करने की क्षमता है। जबकि इस संयंत्र में केवल 5,000 इंजन ही निर्मित किए जाते हैं।

जेवुगले समझाते हैं कि आख़िर "इसके मायने क्या हैं?" वे बताते हैं, "यह कंपनी की तरफ़ से एक साफ़ इशारा है, और जो कह रहा है कि उनके पास अपने उत्पाद के उत्पादन के लिए विकल्प मौजूद हैं। यह स्थिति अंतत: वेतन वृद्धि सहित श्रमिकों की विभिन्न मांगों को प्रभावित करती है। यदि हम हड़ताल पर जाने का निर्णय लेते हैं, तो कंपनी अन्य संयंत्रों के माध्यम से उत्पादन को पूरा कर लेती है। कड़वा सच यह है कि हम विकल्पहीन बन गए हैं और इसलिए कंपनी जो कहती है हमें उसे स्वीकार करना पड़ता है।"

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार युवा छात्रों के लिए राष्ट्रीय रोज़गार वृद्धि मिशन (NEEM) योजना लेकर आई, जिससे उन्हें प्रयोगात्मक रूप से  कंपनी में काम का अनुभव हासिल हो सके। लेकिन कम्पनियां इन्हें स्थाई कर्मचारियों की तुलना में बेहद कम तनख़्वाह, क़रीब 30% वेतन पर भर्ती कर लेती हैं, और वे काम करते हैं। औरंगाबाद के बाहर स्थित एक मोरगानाईट आभूषण बनाने वाली कम्पनी में काम करने वाले मज़दूर अशोक गवली के अनुसार “यह एक तरह से शोषण करना हुआ। कम्पनियाँ इन्हें मामूली वेतन देकर उनसे काफ़ी अधिक काम ले रही हैं। न तो इनके पास ग्रेच्युटी की सुविधा है और न कोई बोनस। कुछ भी नहीं।”

वर्तमान में जारी आर्थिक मंदी औद्योगिक मज़दूरों के लिए एक और चिंता का सबब है। हर जगह उत्पादन में गिरावट दर्ज हुई है। औद्योगिक इलाक़ों में ‘ब्लॉक क्लोज़र’ (नोटिस जारी कर कम्पनी द्वारा कई घंटे या दिनों के लिए बंदी) अब एक नियम सा बन गया है। कई कम्पनियां अपने यहाँ श्रमिकों को हफ़्ते में सिर्फ़ 4 दिन ही काम पर आने के लिए कह रही हैं। नासिक और पुणे कि कुछ औद्योगिक इलाक़ों में तो एक महीने में 12 दिन ग़ैर कार्य दिवस के रूप में अवकाश दिया जा रहा है। छंटनी से अभी तक ठेका मज़दूर प्रभावित हुए हैं, लेकिन स्थिति में जल्दी सुधार नहीं हुआ तो स्थाई श्रमिकों को डर है कि उनका हाल भी ऐसा ही होने जा रहा है। 

गवली के मुताबिक़ “कोई भी कंपनी अपनी इकाइयों को काम की कम क्षमता के साथ नहीं चला सकती है। लेकिन मांग में आई गिरावट ने श्रमिकों को बुरी तरह प्रभावित किया है।"

औरंगाबाद के संदीप पाटिल, जो एक छोटे बिल्डर हैं, वे मुख्य रूप से औद्योगिक क्षेत्र के आसपास भवन का निर्माण करते रहे हैं। उनके मुख्य ग्राहक शहर में औद्योगिक क्षेत्र के वेतनभोगी वर्ग से हैं। न्यूज़क्लिक से बात करते हुए पाटिल ने कहा, “आजकल, जो भी घर की बुकिंग या घर ख़रीदने के लिए आता है, वह ईएमआई के भुगतान आदि में रियायतें मांगता है, लेकिन यह मेरा काम नहीं है। यह सब रियायतें बैंकों को देने की ज़रूरत है। लेकिन यह स्थिति वेतनभोगी वर्ग के मन में उस डर को दिखाती है जो छंटनी से आशंकित और भयभीत हैं।"

एक स्थानीय भाषाई दैनिक अख़बार ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में बताया है कि औरंगाबाद के औद्योगिक क्षेत्र और उसके आसपास के इलाक़े में 50,000 नौकरियों में कटौती हुई है, जिसके शिकार मुख्य रूप से ठेका मज़दूर हुए हैं। यह राज्य में स्थिति की गंभीरता की ओर इशारा करता है।

Economic slowdown
Maharashtra Assembly Polls
aurangabad
Aurangabad Industrial Zone
Greaves Cotton
Morganite Production

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