NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कला
साहित्य-संस्कृति
भारत
मई आंदोलन की संतान- विवान सुंदरम
फोटोइंक आर्ट गैलरी में 13 अप्रैल से 1 जून तक चले उनके 2016 के बाद के चित्रों को देखते हुए लगता है कि विवान की कला किसी संपूर्णता की खोज और उसे न ढूंढ पाने की व्यथा से उपजी है।
वैभव सिंह
02 Jun 2019
विवान की कला

मई के महीने के अंत में भयंकर तपिश, गर्म हवाएं, सड़कों पर सन्नाटा था, लेकिन सड़क किनारे लगे पेड़ों पर हरियाली झूम रही थी। इसी मौसम में एक अखबार से देर से ही पता चला कि दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में भारतीय कला के प्रख्यात स्तंभ विवान सुंदरम के चित्रों की एक प्रदर्शनी फोटोइंक आर्ट गैलरी में चल रही है। विवान के चित्रों व कलाओं में पिछले कुछ बरस से मेरी रुचि तेजी से बढ़ी है। अभी विगत वर्ष ही दिल्ली के किरन नादार म्यूजियम आफ आर्ट में ‘स्टेप इनसाइड एंड यू आर नो लांगर ए स्ट्रेंजर’ नाम से उनकी कला के समूचे पुनरावलोकन के लिए एक प्रदर्शनी आयोजित की गई थी और तब विस्तार से और सिलसिलेवार ढंग से विवान की कला-यात्रा से परिचित होने का मौका मिला था। कला के प्रति समर्पित व्यक्तित्व को आप किसी एक क्षण में, सृजन के किसी एक पक्ष से या एक मुलाकात में शायद ठीक से नहीं जान सकते हैं। कलात्मक सृजन, दर्शन, उपलब्धि व विफलता के पूरे सफर को देखना तथा समझना पड़ता है।

vivan2 (1).jpg

इस बार फोटोइंक आर्ट गैलरी में 13 अप्रैल से 1 जून तक चले उनके 2016 के बाद के चित्रों को देखते हुए लगता है कि विवान की कला किसी संपूर्णता की खोज और उसे न ढूंढ पाने की व्यथा से उपजी है। इस श्रेणी के दीर्घ आकार के चित्र केरल के पट्टनम गांव में पुरातत्त्व की खुदाई में मिले ढाई हजार साल पहले के विलुप्त शहर को केंद्र में रखकर तैयार किए गए हैं। इनमें लाइट, डिजिटल तकनीक, बाक्स, पारदर्शी अमूर्तन आदि का प्रयोग किया गया है और चित्रों में टूटी-फूटी सामग्री, विध्वंस और निरर्थक वस्तुओं के प्रति एक झुकाव नजर आता है। अपने चित्रों में उन्होंने चमकते, प्रकाश फेंकते शीशे के लंबे-पतले धागों (आप्टिकल फाइबर) को भी डाला है ताकि मानव आबादी और पृथ्वी का उद्दीप्त आभास पैदा किया जा सके। विवान पर एक समूची किताब रूथ रोसनगार्टेन ने लिखी है और उन्होंने कहा था कि ‘विवान की कला में दुःख का तत्त्व प्रबल है और यह इस अवसाद से जन्मा है कि कभी कुछ संपूर्ण, एकात्म और अविभाज्य था पर बाद में वह खंडित होकर बिखर गया। अब किसी भी स्थायी या संपूर्ण की कामना केवल मन-मस्तिष्क में रह सकती है, उसका बाहर अस्तित्व नहीं है।’

vivan3 (1).jpg

विवान की कला यात्रा सुदीर्घ और प्रयोगपूर्ण रही है। उन्होंने तैल चित्रों से लेकर वीडियो, आर्किटेक्चरल सामग्री, फोटोग्राफी और इंस्टालेशन तक के प्रयोग अपनी कला में बहुत कुशलता के साथ किए हैं। 1990 के दशक में ही उन्होंने कैनवास पर चित्र बनाने के प्रशिक्षण को त्याग दिया था। उन्हें नए माध्यमों, सामग्री व शिल्प का प्रयोग करने वाले अनथक अन्वेषक के रूप में देखा जाता है और इस कारण ही सम्मान प्रदान किया जाता है। उन्होंने पहले बड़ौदा और फिर लंदन के स्लेड स्कूल आफ आर्ट में कला प्रशिक्षण प्राप्त किया है। मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल उनकी मां की सगी बहन यानी विवान की मौसी थीं। एक सुखद संयोग की तरह परिवार से ही उन्हें कला से आजीवन जुड़ने की प्रेरणाएं प्राप्त हुईं। विवान ने 2002 में ‘री-टेक आफ अमृता’ नाम से अपने परिवार के विभिन्न चित्रों को डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कर फोटो मोंटाज यानी तस्वीरों को नए रूप तथा क्रम से पेश कर पारिवारिक आर्काइव को नया रूप प्रदान किया था। विवान पर यूरोप के विभिन्न किस्म के सामाजिक आंदोलनों का गहरा प्रभाव रहा और खासतौर पर फ्रांस के 1968 के मई आंदोलन से वे प्रभावित थे। उन्होंने कई अवसरों पर खुद को मई आंदोलन की संतान कहा है और उसी से मिले स्वाधीनता बोध से जुड़ा बताया है। मई आंदोलन भले विफल रहा हो पर अपने अनुयायियों को उसने हमेशा के लिए सत्ता से प्रश्न पूछने तथा प्रतिरोध करने के लिए प्रेरित कर दिया। मई आंदोलन तथा पाब्लो नेरुदा की ‘माचु पिच्चू का शहर’ पर उन्होंने कई चित्र बनाए हैं। उनकी समूची कला में विभिन्न प्रकार के प्रयोग जैसे स्थापत्य, मूर्तिकला, फोटोग्राफी, इंस्टालेशन, सजीव आकृति, डिजिटल तकनीक आदि का प्रभाव दिखता है। इन विभिन्न कलात्मक प्रयोगों के मध्य जो एक चीज बहुत सामान्य रूप से उपस्थित है, वह है काल या ‘टाइम’ के पूरे बोध को कला में तोड़ना, विखंडित स्थितियों का चित्रण तथा स्मृति की एकरेखीयता के स्थान पर उसके टेढ़े-तिरछे ढंग से उभरने की नियति को दिखाना। उन्होंने राजनीतिक कला का नया रूप कला के क्षेत्र में विकसित किया है। बहुत सारे राजनीतिक विषयों जैसे नौसेना विद्रोह, 1992 के बंबई दंगे, पेरिस के मई आंदोलन, खाड़ी युद्ध (1991) के अलावा दूसरे महायुद्ध में आउशवित्ज जैसी त्रासदियों पर‘लांग नाइट’ के नाम से चित्रों की श्रृंखला तैयार की थी। उन्होंने रामकिंकर बैज की कला को केंद्र में रखकर भी इंस्टालेशन तैयार किए हैं। कुल मिलाकर विवान का कला संसार बाहर के विषयों को कला के पूर्णतया स्वायत्त क्षेत्र में लाकर उनके प्रति अपने दर्शकों की ऐंद्रिक व बौद्धिक सजगता को विकसित करता है।

20190528_151316 (1).jpg

2016 के बाद के सृजन में उन्होंने मिट्टी के बर्तनों-मूर्तियों (टेरीकोटा), दीमक, प्रागैतिहासिक पत्थर व कांच के टुकड़ों व अवशेषों का प्रयोग किया है और चीजों में विच्छिन्नता, या कहें कि टूटफूट को बहुत गहरी कला-दृष्टि से उभारा है। एक नए प्रकार की सौंदर्य दृष्टि है जो ‘कोलाजिस्ट’ है, यानी परस्पर अलगाव रखने वाली चीजों को एक साथ, एक जगह लाने के प्रयास के रूप में सामने आती है। उनमें उजड़ी मानव बस्तियों का बोध होता है और प्रकृति का आक्रोश दिखता है। प्रागैतिहासिक समय से लेकर वर्तमान दुनिया तक के इतिहास को किसी ऊंचाई पर उड़ते पक्षी की तेज निगाह के सहारे पकड़ने का हुनर भी इन चित्रों में व्यक्त होता है। आज की डिजिटल, तरंग आधारित, सेटलाइट संदेशों वाली दुनिया को वे तीन हजार साल पहले उजड़े गांव के ठीक सामने रखकर पेश करते हैं। फोटोग्राफी की ऐसी दृष्टि जो देशकाल की सारी विराटता को अपनी हथेलियों में दबोच लेती है और फिर उसे कला में नए मौलिक तरीकों से रचने लग जाती है। आमतौर पर भी यही देखा जाता है कि कोई समूची, बनी-बनाई या भव्य चीज मनुष्य की कल्पना को उतना उत्तेजित नहीं करती है, जितना ध्वस्त, टूटी-फूटी व टुकड़ों में बिखरी वस्तुएं। खंडहरों के सामने खड़ा इंसान उनसे जुड़ी कहानियों के बारे में जितना सोच सकता है, उतना किसी शानदार दमकती इमारत के सामने खड़े होकर नहीं। विवान भी इंसानी मनोजगत की ठीक इसी विशेषता का प्रयोग कला में करते हैं और टुकड़ों में बंटी-बिखरी वस्तुओं के सहारे अपने दर्शकों को नए ढंग से कल्पनाशील होने का न्यौता देते हैं। वे अपनी कला में विध्वंस की ज्ञात-अज्ञात प्रक्रिया या उसके खतरों का चित्रण करते हैं, ताकि लोगों को एक सुंदर और व्यवस्थित दुनिया के बारे में सोचने का मौका मिले। उनकी कला मनुष्य के हस्तक्षेप से होने वाले तथा स्वतः चलने वाले विध्वंस, दोनों को कलात्मक कोणों से उभारती है। उसमें जीवन है तो मृत्यु भी, सृजन है तो विनाश भी, यूटोपिया है तो डिस्टोपिया भी, पीछे छूटा अनंत काल है तो अनिश्चितता में डूबा भविष्य भी।

vivan4 (1).jpg

विवान खुद भी मानते हैं कि उनमें शहर के कूड़ा करकट तथा उससे बीनने वाले लोगों के प्रति एक रोमांटिक लगाव रहा है। उनकी मेहनत के कारण ही एक विशाल शहरी सभ्यता का अस्तित्व बना हुआ है। पर साथ ही आज की नव-उदारवादी आर्थिक प्रणाली का संकट भी है, जो भयानक स्तर पर निरर्थक चीजों, कूड़ा व फेंकी गई वस्तुओं का ढेर पैदा कर रही है। यह समकालीन सत्य भी उनकी चित्रकला में विभिन्न प्रकार के ध्वंस व अवशेषों के प्रयोग के लिए जिम्मेदार रहा है। उनकी कला के मर्म को प्रभावित किया है। इंडियन एक्सप्रेस को हाल ही में दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा- ‘प्रकृति में एक चीज हमेशा से मौजूद रही है। वह यह कि प्रकृति के भीतर ही बहुत सारी विनाशकारी तथा प्रकृति को क्षरित करने वाली चीजें छिपी होती हैं। जब कला इस सत्य से अपनी कला सामग्री का चुनाव करती है तो कला व प्रकृति का अंतर्विरोध सामने आता है। एक ओर कला का अमूर्तन व जीवन है, दूसरे छोर पर प्रकृति के भीतर से रोजाना पैदा होने वाली मृत्य तथा ध्वंस है।’ कला तथा चित्रकला के क्षेत्र में विवान की छवि सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सजग कलाकार की रही है। पर विवान स्वयं अपनी सजगता को किसी प्रोपगंडा, मिशन या फार्मूले में बांधकर नहीं देखते हैं। वह कहते हैं- ‘यह कलाकार की स्वतंत्रता है कि वह किसी विषय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना चाहता है, या नहीं। अगर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करता है तो इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि वह कम महत्त्वपूर्ण कलाकार है।’ पर विवान यह बात तब कहते हैं जब उन्होंने स्वयं विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर अपना पक्ष कला के माध्यम से बहुत साहसपूर्ण तरीके से रखा है। वह कहते हैं- ‘मेरा काम लगातार बदलता रहा है। जब आपातकाल लगा तब 1976 में मैंने आपातकालीन शासन के खिलाफ पेंटिंग बनाईं। मुझे गिरफ्तार भी होना पड़ सकता था। इसी प्रकार 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद बंबई में हुए भीषण दंगों पर ‘मेमोरियल’ (1993) का सृजन किया।’ एक कलाकार जो स्वयं विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक त्रासदियों को अपनी कला के माध्यम से व्यक्त करता रहा हो, वही इस बात को पूरी गंभीरता से महसूस भी करता है कि किन विषयों पर कलाकार अपनी प्रतिक्रिया देगा, यह पूर्णतः उसका निजी निर्णय होता है।

(लेखक हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक हैं।)


बाकी खबरें

  • putin
    एपी
    रूस-यूक्रेन युद्ध; अहम घटनाक्रम: रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश 
    28 Feb 2022
    एक तरफ पुतिन ने रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश दिया है, तो वहीं यूक्रेन में युद्ध से अभी तक 352 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • mayawati
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है
    28 Feb 2022
    एसपी-आरएलडी-एसबीएसपी गठबंधन के प्रति बढ़ते दलितों के समर्थन के कारण भाजपा और बसपा दोनों के लिए समुदाय का समर्थन कम हो सकता है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,013 नए मामले, 119 मरीज़ों की मौत
    28 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1 लाख 2 हज़ार 601 हो गयी है।
  • Itihas Ke Panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी: आज़ादी की आखिरी जंग
    28 Feb 2022
    19 फरवरी 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी को ज़्यादातर लोग भूल ही चुके हैं. 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में इसी खास म्युटिनी को ले कर नीलांजन चर्चा करते हैं प्रमोद कपूर से.
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा
    27 Feb 2022
    मणिपुर की राजधानी इंफाल में ग्राउंड रिपोर्ट करने पहुंचीं वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह। ज़मीनी मुद्दों पर संघर्षशील एक्टीविस्ट और मतदाताओं से बात करके जाना चुनावी समर में परदे के पीछे चल रहे सियासी खेल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License