NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अपराध
नज़रिया
भारत
मी लॉर्ड! न्याय हो गया, लेकिन होते हुए दिखा नहीं!!
सीजेआई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला ने इस पूरी प्रक्रिया पर कहा कि उसे जिस बात का डर था वही हुआ। न्याय की सबसे ऊँची जगह से भी उसे न्याय मिलने की उम्मीद ख़त्म हो गयी।
अजय कुमार
08 May 2019
मी लॉर्ड! न्याय हो गया, लेकिन होते हुए दिखा नहीं!!
Image Courtesy: Live Law

न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए बल्कि न्याय होते दिखना भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई के साथ जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले में रंजन गोगोई को मिला क्लीन चिट भी ऐसा ही एक मामला है। जिसमें एक लाइन में यह कहा जा सकता है कि ‘न्याय हो गया’ लेकिन न्याय होते हुए दिखता नहीं है। 

अब ऐसा क्यों कहा जा रहा है। इसे समझने के लिए इस पूरे मामले में किस तरह से न्यायिक प्रक्रिया अपनाई गई, इसे समझना जरूरी है। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर पर उन्हीं के अधीन काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। महिला ने अपना आरोप पत्र सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों के नाम भेजा। जिसे देश के चार प्रतिष्ठित डिजिटल वेब पोर्टल ने छापा। इसके बाद यह बात जगजाहिर हो गई। पहली नज़र में जिसने भी आरोप पत्र पढ़ा, सबने कहा कि आरोप गंभीर है और इन आरोपों की जांच की जानी चाहिए। महिला ने वीडियो फुटेज के साथ आरोप पत्र लिखा था और उसके अनुसार चीफ जस्टिस की तरफ़ से उसे इस तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है, जिसमें उसका पूरा परिवार पिस रहा है। 

इसके बाद आनन फानन में आकर चीफ जस्टिस ने दो अन्य जजों के साथ इस पर सुनवाई की। यह सुनवाई नहीं थी बल्कि एक तरह कि सफाई थी जिसमें चीफ जस्टिस ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के साथ की जा रही किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है। उन्होंने अपने 20 साल के करियर में   बहुत कम  कमाई की है और उन पर लगाया गया आरोप दुर्भावना से ग्रस्त है। चीफ जस्टिस की खुद के मामले में जज की भूमिका की तौर पर की गई कार्रवाई ने न्याय के आधारभूत सिद्धांत का ही माखौल उड़ा दिया कि कोई भी आरोपी खुद ही जज की भूमिका में आकर फैसला नहीं करेगा।

लोक विमर्श में  चीफ जस्टिस के इस कदम को खूब आलोचना की गई। और बहुतों ने कहा कि सीजेआई ने इस मामले में एक आम आरोपी की तरह व्यवहार किया है। जैसे कि एक आम आरोपी कहता है कि वह पाक साफ है, वह गलत काम कर ही नहीं सकता। कहने का मतलब यह है कि भले ही चीफ जस्टिस दोषी न हो या महिला के आरोप गलत हों लेकिन जरूरी यह था कि फैसले तक पहुंचने के लिए यथोचित न्यायिक प्रक्रिया को अपनाया जाता। इस कार्रवाई में सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही  अपना कद छोटा कर लिया।

इसके बाद इस मसले पर सुनवाई करने के लिए तीन जजों की इन हॉउस कमेटी यानी आंतरिक समिति बैठी। इस कमेटी को यह दायित्व सौंपा गया कि वह यह तय करे कि क्या इस आरोप में प्रथम दृष्टया गंभीरता दिखती है और क्या इसे विशाखा दिशा-निर्देश की तहत सुनवाई के के लिए आगे भेजा जा सकता है?  इस इन हॉउस कमेटी में सीनियोरिटी के लिहाज से  चीफ जस्टिस से तुरंत बाद आने वाले तीन जजों को शामिल किया गया।  यह जज हैं जस्टिस बोबडे, जस्टिस रमन्ना, जस्टिस इंदिरा बनर्जी। जस्टिस रमन्ना पर महिला कर्मचारी ने आपत्ति  जाहिर की।  महिला ने कहा कि मैं चीफ जस्टिस से घर के ऑफिस पर काम करती थी।  मुझे पता है कि जस्टिस रमन्ना और जस्टिस रंजन गोगोई अच्छे दोस्त हैं। ऐसे में जज के रूप में इन्हें स्वीकार करना उचित नहीं है। महिला की यह आपत्ति तार्किक थी। न्याय  के आधारभूत सिद्धांतों में से एक सिद्धांत यह भी है कि जज के तौर पर उन्हें शामिल नहीं किया जा सकता है जिनके पास न्याय को किसी भी तरह से  प्रभावित करने की थोड़ी से भी क्षमता होती है।  माहिला की इस आपत्ति को स्वीकार किया गया। जज को बदल दिया गया और नए जज के तौर पर इस कमेटी में जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल हुईं। वही जस्टिस इंदु मल्होत्रा जिन्होंने सबरीमाला मामलें में असहमति की राय रखी थी।

सिविल  सोसाइटी के बहुतों सारे लोगों की  तरफ से सुप्रीम कोर्ट की इन हाउस कमेटी  के कदम पर आपत्ति जारी की गयी। इनकी तरफ से कहा गया मामला सीधे विशाखा गाइडलाइन की तहत जाना चाहिए था। इंटरनल कमेटी बनती और सीधे फैसले की  सुनवाई करती।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तीन जजों की इन हॉउस कमेटी ने एक हफ्ते के अंदर फैसला सुना दिया।   इस दौरान इन तीन जजों ने केवल इसी मामले की सुनवाई की। महिला तीन बार जजों के सामने पेश हुई और अंत में फैसला आया कि  सारे आरोप निराधार हैं। 

महिला ने सुनवाई के दौरान जजों से यह निवेदन भी किया कि उसे अपनी राय रखने के लिए वकील दिया जाए।  वह तीनों जजों के सामने खुद को सही तरह से प्रस्तुत करने के लिए एक वकील की सहायता चाहती है। उसकी इस मांग को ठुकरा दिया गया।  जजों ने कहा कि यह अनौपचारिक जांच है, इसके लिए वकील की जरूरत नहीं होती है। यानी वकील नहीं दिया गया। इस तरह से महिला के बार बार कहने पर भी उसे वकील नहीं मिला और उसने मजबूरी में इस जाँच से अपना हाथ पीछे खींच लिया।  महिला ने कहा बार बार उससे यह सवाल पूछा जा रहा था कि उसने इतनी देरी से शिकायत क्यों की? और भी ऐसे मसले थे जिसका जवाब देने के लिए उसे वकील की जरूरत थी।   

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अप्रत्याशित घटना घटी। सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस  से बहुत अधिक जूनियर  तीन जजों की कमेटी ने चीफ जस्टिस का पक्ष सुनना शुरू किया। इसमें एक यह पेच आया कि एक जज ने असहमति जताई कि इस मामले की ठीक तरह से सुनवाई नहीं की जा रही है। इस कमेटी को जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक लेटर लिखा। लेटर में कहा इस मसले का इस तरह से निपटारा किया जाना गलत है। इससे सुप्रीम कोर्ट का साख कमजोर हो रही है। इन सारे आरोपों को किनारे लगाते हुए इन जजों की कमेटी ने भी कहा महिला के आरोपों में कोई दम नहीं है। इस  मामले को  बंद किया जाता है। 

इस तरह से यह मामला बंद कर दिया गया।

महिला ने इस इस पूरी प्रक्रिया पर यह बयान दिया कि उसे जिस बात का डर था वही हुआ। न्याय की सबसे ऊँची जगह से भी उसे न्याय मिलने की उम्मीद खत्म हो गयी।  

यहाँ यह समझने वाली बात है कि यह मामला यही पर खत्म नहीं हो सकता है। महिला अभी भी विशाखा दिशानिर्देश की तहत सुनवाई करने की मांग  रख  सकती है। जहाँ पर उसके मामले को विशाखा दिशानिर्देश की तरह सुना जाए। 

चीफ जस्टिस के समर्थक  कह रहे हैं कि चूँकि महिला ने सारे आरोप पहले ही सार्वजनिक कर दिए थे,इसलिए उसकी सुनवाई विशाखा दिशा-निर्देश के तहत नहीं की जा सकती है।  इस पर यह भी राय रखी जा रही है कि विशाखा दिशा-निर्देश का यह जरूरी तत्व नहीं है कि महिला द्वारा लगाए गए आरोप गोपनीय ही रखे जाए। और यहां पर मामला तो एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जो देश के सबसे सशक्त पदों में से एक से जुड़ा है। इसलिए विशाखा दिशा-निर्देश के तहत सुनवाई की जा सकती है।

इस मामले से जुड़ी छानबीन को सार्वजनिक किये  जाने से जुड़ी मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस इसकी छानबीन को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।  इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साल 2003 में अपने  द्वारा दिए गए फैसले क फिर से दुहराया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट के मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के ऐसे ही मामले की इंटरनल छानबीन को सार्वजनिक करने का मामला उठा गया था।जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला लिया था कि इंटरनल छानबीन या इन्क्वारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है।  तब से यह प्रथा बन चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट  अपने इंटरनल इन्क्वारी को सार्जनिक न करे।  इस पर वरिष्ठ वकील  इंदिरा जय सिंह ने कहा साल 2003 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला सूचना के अधिकार कानून लागू होने से  पहले का कानून है और क़ानूनी नजरिये से एक खराब कानून है। 

इस पूरे मसले पर क़ानूनी मामलों के एक्सपर्ट गौतम भाटिया हिंदुस्तान टाइम्स में लिखते हैं  कि अगर यह कोई दूसरा मामला होता और सुप्रीम कोर्ट के पास आता तो सुप्रीम कोर्ट इस पूरे प्रोसेस को दस सेकंड के भीतर खारिज कर देता और एक फिर से नए ढंग से इन्क्वारी करने का आदेश दे देता।  क्या अनौपचारिक सुनवाई में पक्षकार के मूलभूत अधिकार को भी ख़ारिज  कर दिए जाने को न्याय होना कहा जा सकता है। क्या अनौपचारिक सुनवाई होने भर से यह हक मिल जाता है कि यथोचित प्रक्रिया न अपनायी जाए। जब पक्षकारों की हैसियत के बीच असंतुलन है तो वकील की जरूरत को पूरा क्यों नहीं  किया गया? और जब सुनवाई ही अनौपचारिक थी तो यह कैसे कहा जा सकता है कि चीफ जस्टिस को क्लीन चिट मिल गयी है। इस पर जस्टिस एपी शाह ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट का सालों साल पीछा करते रहेगा।

Supreme Court
CJI
CJI Ranjan Gogoi
process in cji case
sexual harassment
Supreme Court Verdict
violence against women
higher authorities
Supreme Court of India
Ranjan Gogoi case

Related Stories

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

राजीव गांधी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश दिया

यूपी : महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा के विरोध में एकजुट हुए महिला संगठन

बिहार: आख़िर कब बंद होगा औरतों की अस्मिता की क़ीमत लगाने का सिलसिला?

बिहार: 8 साल की मासूम के साथ बलात्कार और हत्या, फिर उठे ‘सुशासन’ पर सवाल

मध्य प्रदेश : मर्दों के झुंड ने खुलेआम आदिवासी लड़कियों के साथ की बदतमीज़ी, क़ानून व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

बिहार: मुज़फ़्फ़रपुर कांड से लेकर गायघाट शेल्टर होम तक दिखती सिस्टम की 'लापरवाही'

यूपी: बुलंदशहर मामले में फिर पुलिस पर उठे सवाल, मामला दबाने का लगा आरोप!

दिल्ली गैंगरेप: निर्भया कांड के 9 साल बाद भी नहीं बदली राजधानी में महिला सुरक्षा की तस्वीर

जेएनयू में छात्रा से छेड़छाड़, छात्र संगठनों ने निकाला विरोध मार्च


बाकी खबरें

  • sc
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पीएम सुरक्षा चूक मामले में पूर्व न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में समिति गठित
    12 Jan 2022
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘‘सवालों को एकतरफा जांच पर नहीं छोड़ा जा सकता’’ और न्यायिक क्षेत्र के व्यक्ति द्वारा जांच की निगरानी करने की आवश्यकता है।
  • dharm sansad
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
    12 Jan 2022
    पीठ ने याचिकाकर्ताओं को भविष्य में 'धर्म संसद' के आयोजन के खिलाफ स्थानीय प्राधिकरण को अभिवेदन देने की अनुमति दी।
  • राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    विजय विनीत
    राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    12 Jan 2022
    "आरएसएस को असली तकलीफ़ यही है कि अशोक की परिकल्पना हिन्दू राष्ट्रवाद के खांचे में फिट नहीं बैठती है। अशोक का बौद्ध होना और बौद्ध धर्म धर्मावलंबियों का भारतीय महाद्वीप में और उससे बाहर भी प्रचार-…
  • Germany
    ओलिवर पाइपर
    जर्मनी की कोयला मुक्त होने की जद्दोजहद और एक आख़िरी किसान की लड़ाई
    12 Jan 2022
    पश्चिमी जर्मनी में एक गांव लुत्ज़ेराथ भूरे रंग के कोयला खनन के चलते गायब होने वाला है। इसलिए यहां रहने वाले सभी 90 लोगों को दूसरी जगह पर भेज दिया गया है। उनमें से केवल एक व्यक्ति एकार्ड्ट ह्यूकैम्प…
  • Hospital
    सरोजिनी बिष्ट
    लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़
    12 Jan 2022
    लखनऊ के साढ़ामऊ में स्थित सरकारी अस्पताल को पूरी तरह कोविड डेडिकेटेड कर दिया गया है। इसके चलते आसपास के सामान्य मरीज़ों, ख़ासकर गरीब ग्रामीणों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। साथ ही इसी अस्पताल के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License