NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मीडिया ने दिया मोदी को मूलभूत मुद्दों पर वाक ओवर
यही वजह है कि मोदी के ख़राब बयान भी 'मोदी का एक और मास्टर स्ट्रोक', 'मोदी का अब तक का सबसे बड़ा हमला' और 'मोदी का पलटवार' वगैरह बनकर सुर्खियां बटोरते हैं। दूसरी तरफ़, मोदी के विरोध में एक ज़रा-सी चूक या टिप्पणी को भी रणनीति के तहत मीडिया भारी विवादास्पद प्रायोजित करके सत्तारूढ़ी दल का एजेंडा सेट करता है।
शिरीष खरे
08 May 2019
मीडिया ने दिया मोदी को मूलभूत मुद्दों पर वाक ओवर
Image Courtesy: CartoonistSatish.Com

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बेकारी, ग़रीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, किसानों की आत्महत्या, दलित, आदिवासी व मुसलमानों पर लगातार हो रही हिंसा, सामाजिक कल्याण, आम आदमी के विकास, आवास, संविधान ख़त्म करने के दावे, पिछड़े ज़रूरतमंदों से आरक्षण का अधिकार छीनने की वकालत तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं को तहस-नहस करने जैसे आरोप और मूल मुद्दों से भागने के कारण सोशल मीडिया पर एक तरह का उबाल है।

देखा जाए तो वे पूरे पाँच साल ही जनता के सरोकारों से जुड़े मुख्य मुद्दों से दूरी बनाने और अपनी सरकार की नाकामयाबियों से पीछा छुड़ाने के लिए कभी नेहरु-गांधी परिवार की आड़ लेते तो कभी कथित राष्ट्रवाद का दामन थामते नज़र आए। पूरी की पूरी भाजपा मोदी के कार्यकाल में किए कामों का ज़िक्र आते ही या तो रक्षात्मक हो जाती है या फिर भक्तिप्रधान नारे लगाकर ध्यान भटकाती है।

दूसरी तरफ़, मीडिया और ख़ास तौर से बड़े अख़बार तथा चैनल मूलभूत मुद्दों की बात आने पर बड़ी चतुराई से यह संदेश देते हैं कि विपक्ष ही इसे मुद्दा नहीं बना पा रहा है या उनका नेतृव्य ही सही तरह से उठा नहीं पा रहा है, जबकि हक़ीक़त में इस तरह के मुद्दों पर चुप्पी साधकर या इनसे ध्यान भटकाकर ख़ुद मीडया ने अबकि बार और अधिक संगठित तौर पर सत्तारूढ़ दल और मोदी को वाकओवर दिया है।

अब यह कहने का समय आ गया है कि क़रीब-क़रीब पूरा भारतीय मीडिया मोदीमय होकर प्रधानमंत्री के प्रचारतंत्र का हिस्सा बन गया है। यही वजह है कि वह न मूल मुद्दों पर चर्चा कराना चाहता है, न सत्ताधारी पक्ष से असहज करने वाले प्रश्न पूछता है और न ही विपक्ष के नेताओं के उन बयानों को ही तरजीह देता है जो सीधे तौर पर देश और समाज की चिंता से जुड़े हुए हैं। असल में तो वह मतदाताओं को वही दिखा, सुना, पढ़ा और बता रहा है जो मोदी चाहते हैं।

यहाँ तक कि पेड न्यूज़ से बहुत आगे निकलकर अब मुख्यधारा का मीडिया भाजपा के आइटी सेल और भाजपा के प्रवक्ताओं के अनुरूप सरकार की रणनीति पर काम करता मालूम देता है। इसके लिए वह हमेशा ही विपक्ष के नेताओं को नए-नए और ग़ैर-ज़रूरी मुद्दों पर हमलावर तरीक़े से घेरता दिखता है।

यही वजह है कि मोदी के ख़राब बयान भी 'मोदी का एक और मास्टर स्ट्रोक', 'मोदी का अब तक का सबसे बड़ा हमला' और 'मोदी का पलटवार' वगैरह बनकर सुर्खियां बटोरते हैं। दूसरी तरफ़, मोदी के विरोध में एक ज़रा-सी चूक या टिप्पणी को भी रणनीति के तहत मीडिया भारी विवादास्पद प्रायोजित करके सत्तारूढ़ी दल का एजेंडा सेट करता है।

मोदी का आईटी सेल और मोदी के प्रवक्ताओं के साथ-साथ मोदी के समर्थक एंकर तथा पत्रकार तो दो क़दम आगे बढ़कर प्रधानमंत्री के झूठ और अफ़वाहों को सनसनीखेज़ ख़बर की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। मोदी के समर्थन में संगठित और प्रायोजित ट्रोल को वे देश की आवाज़ बताकर एक तरह की अराजकता को बड़े पैमाने पर प्रचारित कर रहे हैं। पूरा मीडिया ही जैसे मोदी की मीडिया तरह काम कर रहा है।

मीडिया और मोदी के संदर्भ में देखा जाए तो सभी बड़े अख़बार और चैनलों ने अपनी-अपनी विविधता को समाप्त कर दिया है। अब कोई सा भी अख़बार उठाकर या चैनल बदलकर देखो तो लगभग सभी ने मोदी के पक्ष में माहौल तैयार करने के मामले में अपनी-अपनी पहचान खो दी है। नोटबंदी, आतंकवादी व नक्सलवादी हमले और पाकिस्तान पर हमले जैसे मुद्दों पर तथ्यपरक रिपोर्टिंग नहीं की। मीडिया मोदी की भक्ति में इस तरह से लीन होता दिखता है जिसमें वह अपने भीतर झांकना छोड़ चुका है। इस दौरान ख़बरों से लेकर विज्ञापन, निजी लेखों से लेकर संपादकीय, तस्वीरों से लेकर आम सभा के दृश्य, भाषण, कार्यक्रम और बहसों में एक विशेष व्यक्ति के पक्ष में प्रचार करने के कारण कुछ भी अलग-सा नजर नहीं आता है। मोदी की नित नई काल्पनिक कहानियों की सच्चाई जाने बग़ैर वह उसे सच की तरह प्रसारित करता है। इसके आगे बहुत तेज़ी से वह उस दौर की ओर ले जा रहा है जहाँ विरोध और मतभेद की गुंजाइश न के बराबर रह जाए।

यह हाल तब है जब वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान क़रीब 70 प्रतिशत मतदाताओं मोदी को वोट नहीं दिया था। वहीं, हाल के कई सर्वे और विश्लेषणों से यह साफ़ रहा है कि मोदी दिन-ब-दिन बहुमत से बहुत दूर होते जा रहे हैं, बावजूद इसके जिस तरह से मुख्यधारा का पूरा मीडिया मोदी और सिर्फ़ मोदी के गुणगान कर रहा है उससे वह अपने पाठक या दर्शक वर्ग के बीच में पूरी निर्लज्जता के साथ कठघरे में खड़ा हुआ है।

इसी नज़रिये से इस बार का चुनाव मुख्य तौर पर प्रधानमंत्री के व्यवहार और वोट प्रबंधन पर केंद्रित होना चाहिए, जिन्होंने चुनाव तथा राजनीति के स्तर को तो बहुत नीचे पहुँचा ही दिया है, मुख्यधारा की मीडिया की बची साख, विश्वसनीयता और भाषा की मर्यादाओं को भी तार-तार कर दिया है।

साभार: enewsroom 

Courtesy: Enewsroom
Narendra modi
Media
Mainstream Media
Godi Media
demonetisation
5 years of Modi government
BJP
BJP IT cell

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License