NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
मिज़ोरम: राज्य स्थापना से अब तक के चुनावों पर एक नज़र
सत्ताधारी पार्टी के रूप में एकमात्र पार्टी कांग्रेस वर्ष 2013 में अपना वोट और सीट शेयर बढ़ाने में कामयाब रही है। ये एक अलग मामला है कि कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर को मात देने सक्षम हो।
विवान एबन
27 Nov 2018
Mizoram Assembly Elections
Image Credit: Incredibly Numing/Flickr

यह चुनाव मिज़ोरम के इतिहास में पहला चुनाव है जहां कई पार्टियां चुनावी मैदान में अपनी क़िस्मत आजमा रही हैं। परंपरागत तौर पर राज्य के गठन के बाद से मिज़ोरम कांग्रेस और मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) सरकार के हाथों में ही घूमता रहा है। सत्ताधारी पार्टी के रूप में कांग्रेस ही एकमात्र पार्टी है जिसने अपना वोट और सीट शेयर बढ़ाया है जिसे उसने वर्ष 2013 में हासिल किया था। हालांकि किसी भी पार्टी ने लगातार तीन बार सरकार नहीं बनाई है। सीईओ संकट के दौरान सत्ता विरोधी कारक तथा मिज़ो राष्ट्रवाद के प्रबंधन को देखते हुए कांग्रेस लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने में कामयाब हो सकती है। हालांकि मिज़ोरम के मुख्यमंत्री लाल थान्हावला का एक बयान कि कांग्रेस राज्य में अपने समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन के लिए तैयार थी ये चुनाव परिणामों को लेकर अनिश्चितता की ओर संकेत दे सकता है।

इस चुनाव में कांग्रेस और एमएनएफ ने अपने-अपने 40 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। बीजेपी 39 सीटों पर जबकि ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट 35 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। दि पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन फॉर आइडेंटिटी एंड स्टैटस इन मिज़ोरम (पीआरआईएसएम) ने 13 उम्मीदवारों को उतारा है वहीं नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने 9, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने 5 और ज़ोरमथर ने 24 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।

1987 का चुनाव 

वर्ष 1987 में भारत सरकार और एमएनएफ के बीच मिज़ो समझौते के बाद पहला चुनाव हुआ था। कांग्रेस और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (पीपीसी) दो प्रतिस्पर्धी पार्टियां थीं जबकि एमएनएफ उम्मीदवारों ने निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में चुनाव लड़ा था। कांग्रेस ने 40 सदस्यीय इस विधानसभा के लिए 40 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा और पीपीसी ने 36 उम्मीदवारों को। इस चुनाव में 69 स्वतंत्र उम्मीदवार थे। स्वतंत्र उम्मीदवारों को 43.31 प्रतिशत सबसे ज़्यादा वोट शेयर मिले, कांग्रेस 32.99 फीसदी के साथ दूसरे स्थान पर रही और पीपीसी को 23.70 प्रतिशत वोट मिले। स्वतंत्र उम्मीदवारों ने 24 सीटें जीतीं, कांग्रेस ने 13 और पीपीसी को मात्र 3 सीट मिले। 

1989 का चुनाव 

दो साल बाद मिज़ोरम में वर्ष 1989 में फिर से चुनाव हुआ। इस बार कांग्रेस और पीपीसी के साथ एमएनएफ भी चुनाव लड़ रही थी। कांग्रेस ने 34 उम्मीदवार मैदान में उतारे जिनमें से 23 ने जीत हासिल की। एमएनएफ ने 40 उम्मीदवारों को उतारा जिनमें से 14 जीत दर्ज की वहीं पीपीसी ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें उसे केवल 1 सीट मिली। 50 स्वतंत्र उम्मीदवारों में से केवल 2 ही कामयाब हो पाए। कांग्रेस को 34.85 प्रतिशत, एमएनएफ 35.29 प्रतिशत और पीपीसी में 19.66% वोट मिले। स्वतंत्र उम्मीदवारों ने इस चुनाव में 10.19 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। 

1993 का चुनाव 

वर्ष 1993 में चुनावी तस्वीर साफ बदल गई। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने मिज़ोरम के चुनाव में प्रवेश किया और पीपीसी ने कोई नामांकन पत्र दाखिल नहीं किया। इस बार के चुनाव में लड़ाई स्वतंत्र उम्मीदवारों के साथ बीजेपी, कांग्रेस और एमएनएफ के बीच थी। बीजेपी ने 8 उम्मीदवारों को उतारा जिनमें से किसी ने भी चुनाव नहीं जीता और 7 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई। कांग्रेस ने 28 उम्मीदवारों को उतारा जिसमें से 16 ने जीत दर्ज की और एमएनएफ ने 38 उम्मीदवार को इस चुनाव में उतारा जिनमें से 14 ने जीत हासिल की। 47 स्वतंत्र उम्मीदवारों में से 10 ने जीत दर्ज की। इस चुनाव में एमएनएफ को सबसे ज़्यादा यानी 40.41 प्रतिशत वोट-शेयर मिला। कांग्रेस 33.10 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही, इसके बाद स्वतंत्र उम्मीदवारों और बीजेपी को क्रमश: 23.38 प्रतिशत और 3.11 प्रतिशत वोट मिले।

1998 का चुनाव 

वर्ष 1998 के चुनावों में दस दलों ने हिस्सा लिया। इस बार चुनाव लड़ने वाली पार्टियां थीं; बीजेपी, कांग्रेस, एमएनएफ, जनता दल (जेडी), समता पार्टी (एसएपी), लोक शक्ति (एलएस), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), मारालैंड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एमडीएफ), एमएनएफ (नेशनलिस्ट) [एमएनएफ (एन)] और मिज़ोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (एमपीसी)। इस बार बीजेपी ने 12 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा जिनमें से कोई भी नहीं जीत पाया। जेडी और एसएपी ने 10-10 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था; एलएस ने 15; आरजेडी ने 8; एमएनएफ(एन) ने 24; और एमडीएफ ने 2 उम्मीदवारों को उतारा था लेकिन इन पार्टियों के किसी भी उम्मीदवार को सफलता नहीं मिली। कांग्रेस ने 40 उम्मीदवारों को उतारा लेकिन केवल 6 प्रत्याशी ही जीत पाए। जबकि एमएनएफ ने 28 उम्मीदवारों को उतारा जिनमें से 21 ने जीत हासिल की। एमपीसी ने 28 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे जिसमें 12 सीटों पर जीत हासिल कर दूसरा स्थान प्राप्त किया।

वोट शेयर की बात करें तो कांग्रेस को कुल डाले गए वोट का सबसे ज़्यादा 29.77 प्रतिशत वोट मिला। एमएनएफ 24.99 प्रतिशत मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहा और एमपीसी को 20.44 प्रतिशत मिले। एमएनएफ (एन) को बीजेपी की तुलना में 9.23 फीसदी जबकि बीजेपी को 2.50 फीसदी मिले। एमडीएफ को 2.28 प्रतिशत मिला। बाकी दलों को कुल डाले गए वोट का 1 प्रतिशत से भी कम वोट मिला। चुनाव लड़ रहे 44 स्वतंत्र उम्मीदवारों और केवल 1 जीते हुए उम्मीदवार के बावजूद उन्हें 9.82 प्रतिशत मत मिले।

2003 का चुनाव

वर्ष 2003 में फिर 10 पार्टियों ने चुनाव लड़ा। बीजेपी, कांग्रेस, एमएनएफ, एमपीसी और एमडीएफ ने एक बार फिर चुनाव लड़ा। इस बार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई), ज़ोरम नेशनलिस्ट पार्टी (जेडएनपी), जनता दल (यूनाइटेड) [जेडी (यू)], एफ्रेम यूनियन (ईयू) और ह्मार पीपुल्स कन्वेंशन (एचपीसी) भी शामिल हुईं।

बीजेपी, सीपीआई और कांग्रेस ने क्रमशः 8, 4 और 40 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, हालांकि बीजेपी और सीपीआई का भाग्य ने साथ नहीं दिया। कांग्रेस ने 12 सीटों पर चुनाव जीता। एमएनएफ, एमपीसी और जेडएनपी ने क्रमश: 39, 28 और 27 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। एमपीसी और जेडएनपी ने क्रमशः केवल 3 और 2 सीटों पर जीत हासिल किया और एमएनएफ ने 21 सीट जीतकर भारी बहुमत हासिल कर लिया। जेडी (यू) की किस्मत काफी ख़राब रही, उसने 28 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा लेकिन उनमें से सभी की ज़मानत ज़ब्त हो गई। ईयू, एचपीसी और एमडीएफ ने क्रमश: 3, 1 और 2 सीटों पर चुनाव लड़ा। एचपीसी और एमडीएफ ने एक एक सीट पर चुनाव जीता। 12 स्वतंत्र उम्मीदवारों में से कोई भी सफल नहीं हुआ।

इस बार विजेता पार्टी को सबसे ज़्यादा वोट शेयर मिला। एमएनएफ को 31.6 9 प्रतिशत और इसके बाद कांग्रेस को 30.06 फीसदी वोट मिला। एमपीसी को 16.16 फीसदी और जेएनएनपी को 14.70 फीसदी मिले। एमडीएफ को 1.95 प्रतिशत और बीजेपी को 1.87 प्रतिशत वोट मिले। बाकी दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों को कुल डाले गए वोट का 1 प्रतिशत से भी कम वोट मिला।

2008 का चुनाव

वर्ष 2008 के चुनाव में दस पार्टियां- बीजेपी, कांग्रेस, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), एमएनएफ, एमपीसी, जेडएनपी, जेडी (यू), लोक भारती (एलबी), लोक जन शक्ति पार्टी (एलजेपी) और एमडीएफ मैदान में थी। इस बार के चुनाव में कांग्रेस ने पूरी तरह क़ब्ज़ा जमा लिया। उसने 40 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें से 32 सीटों पर जीत हासिल की। इसके बाद एमएनएफ ने 39 सीटों में से 3 सीटें जीतीं। एमपीसी और जेडएनपी ने क्रमशः 16 और 17 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केवल दो-दो 2 सीटें जीत पाई। एमडीएफ ने 1 सीट पर चुनाव लड़ा जिसमें वह सफल हो गया। उन पार्टियों में से जो कोई भी सीट नहीं जीत पाई उनमें बीजेपी 9 सीटों पर, एनसीपी ने 6, जेडी (यू) ने 2, एलबी ने 5 और एलजेपी ने 38 सीटों पर लड़ा।

कांग्रेस ने सबसे ज़्यादा वोट शेयर 38.89 फीसदी हासिल किया। इसके बाद एमएनएफ, एमपीसी और जेडएनपी ने क्रमशः 30.65, 10.38 और 10.22 प्रतिशत वोट हासिल किया। 33 स्वतंत्र उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा जिसमें सभी असफल हुए। इन उम्मदीवारों को केवल 7.69 प्रतिशत वोट मिला। बाकी उम्मीदवार 1 प्रतिशत से ज़्यादा वोट प्राप्त करने में नाकाम रहे।

2013 का चुनाव

मिज़ोरम के वर्ष 2013 के चुनाव में पहली बार नन ऑफ द एबव (NOTA-नोटा) बटन का विकल्प शामिल किया गया। हालांकि केवल 8 दलों ने ये चुनाव लड़ा। ये दल थे बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी, एमएनएफ, एमसीपी, जेडएनपी, एमडीएफ और जय महा भारत पार्टी। चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार कांग्रेस वर्ष 2008 में प्राप्त 32सीट से बढ़कर वर्ष 2013 में 34 सीट तक पहुंच गई। उसने 40 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। एमएनएफ ने 31 उम्मीदवारों को उतारा जिनमें से 5 ही सफल रहे। एमपीसी ने 8 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केवल 1 सीट पर ही जीत दर्ज कर पाई।

कांग्रेस को 44.63 प्रतिशत वोट मिले। पार्टी को वर्ष 2008 के चुनाव की तुलना में बढ़ोतरी हुई। एमएनएफ का वोट शेयर कम होकर 28.65 फीसदी हो गया। पूरी तरह से असफल होने के बावजूद जेडएनपी को 17.42 प्रतिशत और एमपीसी को 6.15 प्रतिशत वोट मिले। किसी भी अन्य पार्टियों, स्वतंत्र उम्मीदवार, या नोटा को 1 प्रतिशत से ज़्यादा वोट नहीं मिला।
जैसा कि स्पष्ट है वर्ष 1987 से 2013 तक कांग्रेस के भाग्य में लगातार बदलाव देखा गया। हालांकि, 11 दिसंबर को परिणामों की घोषणा होने तक कोई भी नतीजे का केवल अनुमान ही लगा सकता है।
 

MIZORAM
Mizoram elections 2018
Assembly elections 2018
Mizo National Front
Congress
mnf
voting patterns

Related Stories

हार्दिक पटेल भाजपा में शामिल, कहा प्रधानमंत्री का छोटा सिपाही बनकर काम करूंगा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

ED के निशाने पर सोनिया-राहुल, राज्यसभा चुनावों से ऐन पहले क्यों!

ईडी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी को धन शोधन के मामले में तलब किया

राज्यसभा चुनाव: टिकट बंटवारे में दिग्गजों की ‘तपस्या’ ज़ाया, क़रीबियों पर विश्वास

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

केरल उप-चुनाव: एलडीएफ़ की नज़र 100वीं सीट पर, यूडीएफ़ के लिए चुनौती 

पूर्वोत्तर के 40% से अधिक छात्रों को महामारी के दौरान पढ़ाई के लिए गैजेट उपलब्ध नहीं रहा

कांग्रेस के चिंतन शिविर का क्या असर रहा? 3 मुख्य नेताओं ने छोड़ा पार्टी का साथ

‘आप’ के मंत्री को बर्ख़ास्त करने से पंजाब में मचा हड़कंप


बाकी खबरें

  • srilanka
    न्यूज़क्लिक टीम
    श्रीलंका: निर्णायक मोड़ पर पहुंचा बर्बादी और तानाशाही से निजात पाने का संघर्ष
    10 May 2022
    पड़ताल दुनिया भर की में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने श्रीलंका में तानाशाह राजपक्षे सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर बात की श्रीलंका के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. शिवाप्रगासम और न्यूज़क्लिक के प्रधान…
  • सत्यम् तिवारी
    रुड़की : दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवार ने घर के बाहर लिखा 'यह मकान बिकाऊ है', पुलिस-प्रशासन ने मिटाया
    10 May 2022
    गाँव के बाहरी हिस्से में रहने वाले इसी मुस्लिम परिवार के घर हनुमान जयंती पर भड़की हिंसा में आगज़नी हुई थी। परिवार का कहना है कि हिन्दू पक्ष के लोग घर से सामने से निकलते हुए 'जय श्री राम' के नारे लगाते…
  • असद रिज़वी
    लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी
    10 May 2022
    एक निजी वेब पोर्टल पर काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर की गई एक टिप्पणी के विरोध में एबीवीपी ने मंगलवार को प्रोफ़ेसर रविकांत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में घेर लिया और…
  • अजय कुमार
    मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर
    10 May 2022
    साल 2013 में डॉलर के मुक़ाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया तभी मज़बूत होगा जब देश में मज़बूत नेता आएगा।
  • अनीस ज़रगर
    श्रीनगर के बाहरी इलाक़ों में शराब की दुकान खुलने का व्यापक विरोध
    10 May 2022
    राजनीतिक पार्टियों ने इस क़दम को “पर्यटन की आड़ में" और "नुकसान पहुँचाने वाला" क़दम बताया है। इसे बंद करने की मांग की जा रही है क्योंकि दुकान ऐसे इलाक़े में जहाँ पर्यटन की कोई जगह नहीं है बल्कि एक स्कूल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License