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भारत
राजनीति
मंडी हाउस से संसद मार्ग तक आक्रोश मार्च :13-बिंदु रोस्टर क्या, विरोध क्यों?
13 पॉइंट रोस्टर को समाजिक न्याय और आरक्षण विरोधी बताते हुए और सरकार से विभागवार आरक्षण को खत्म करने के लिए कानून कि मांग को लेकर हजारों कि संख्या में शिक्षक और शोधर्ती छात्रों ने मंडी हाउस से संसद मार्ग तक आक्रोश मार्च किया |
मुकुंद झा
31 Jan 2019
DUTA MARCH

तकरीबन साल भर  से दिल्ली के शिक्षक विभागवार रोस्टर के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. इस संघर्ष की शुरुआत इलाहाबद हाई कोर्ट के मार्च में दिए गए  उस फैसले से हुई थी जिसमें कोर्ट ने रोस्टर के जरिये आरक्षण देने के लिए विश्वविधालय के बजाए विभाग को इकाई मानने का नियम बताया था। इस नियम की वजह से आरक्षण की प्रक्रिया पर हुए हमले की वजह से दिल्ली शिक्षक संघ ने खूब विरोध प्रदर्शन किया। इस विरोध को भांपते हुए  सरकार ने खुद इलाहबाद हाई कोर्ट के फैसले के  खिलाफ स्पेशल लव पिटीशन फाइल की. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस स्पेशल लिव पिटीशन को खारिज कर दिया।

शिक्षक संघ और शोध छात्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निराशा जताते हुए सरकार से मांग की थी  कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए  अध्यादेश लाए जिससे आरक्षण को विश्वविद्यालय को एक इकाई के रूप में माना जाए।परन्तु सरकार द्वारा इस पर कोई सकारात्मक पहल नही की गयी जिससे आहत शिक्षकों और शोधार्थी विद्यार्थियों ने आज हजारों की संख्या इकठ्ठा होकर दिल्ली में मंडी हाउस से संसद मार्ग तक आक्रोश मार्च किया ।

13-बिंदु रोस्टर क्या है, विरोध क्यों?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के दिशानिर्देशों के अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय ने '13-पॉइंट रोस्टर 'पेश' किया है। इस आरक्षण रोस्टर लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों में नई नियुक्तियों में आरक्षण लागू करने के लिए प्रत्येक विषय विभाग को एक इकाई मानेगा न कि कालेज या विश्विद्यालय को। जबकि इससे पहले 200 पॉइंट रोस्टर कॉलेज या विश्वविद्यालय को एक इकाई मानता था। 

13-बिंदु वाले रोस्टर में पहले तीन स्थान सामान्य वर्ग, चौथे से अन्य पिछड़ा वर्ग, सातवें से अनुसूचित जाति और 14 से अनुसूचित जनजाति के लिए जाते हैं, लेकिन इसका मतलब है कि छोटे विभागों में, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सवैधानिक आरक्षण में भरी कटौती होगी। इसको समझाते हुए एक शिक्षक ने हमें एक फ़ोटो दिखाई जिसमें उन्होंने  बतया  है कि कैसे 13 पॉइंट रोस्टर आरक्षण को खत्म करेगा |

रोस्टर क्या है.jpg

इसी तरह, एक विषय विभाग में आरक्षण 35.71% (14 में से 5 नियुक्तियों) का योग है, जो संवैधानिक रूप से अनिवार्य 49.5% आरक्षण से कम है।दिल्ली विश्विद्यालय के शिक्षक ललित ने बतया कि पहले  200पॉइंट रोस्टर का लाभ यह है कि एक विभाग में आरक्षण की कमी की भरपाई अन्य विभागों द्वारा की जाती है लेकिन मोदी सरकार जो अभी नया रोस्टर ला रही है इससे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से आने वाले लोग कभी प्रोफसर नही बन सकेंगे। 

DUTA  के अनुसार, विभागवार रोस्टर से एसटी, एससी और ओबीसी पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों के लिए शिक्षण पदों में भारी कमी आएगी, जिससे उच्च शिक्षा में उनके प्रतिनिधित्व और भागीदारी में न के बराबर रह जाएगी। उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखे पत्र में इसका उल्लेख किया है। इसके अलावा, DUTA अध्यक्ष राजीव रे ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में, एक अराजक स्थिति पैदा होने वाली है, अगर  सरकार तुरंत  इसे नए रोस्टर को हटा पुरानी व्यवस्था लागू करती है । 

राजीव आगे कहते  कि अभी अतिथि शिक्षक और एड हॉग शिक्षको का  हर चार महीने के लिए ही नियुक्त किया जता है  और उसके बाद फिर से नियुक्त किए जाते हैं।इस नए रोस्टर के बाद से  कॉलेज या विश्वविद्यालय-वार रोस्टर से कोई भी बदलाव आने से उन पदों की प्रकृति को बदल जाएगी  जिससे उस पद पर काम कर रहे हैं शिक्षक कि नियुक्ति पर असर पड़ेगा । 

“कोर्ट और सरकार दोनों कि मिलीभगत है”

विद्यासागर जो दिल्ली विश्विद्यालय के शोधार्थी है वो कहते है कि सरकार हमारे साथ अन्याय कर रही है, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग से मैं पहली पीढ़ी का शिक्षार्थी हूं, हमे बहार करने के लिए पूरा जोर लगया जा रहा  है, दूसरी तरफ वे उच्च जातियों को 10 प्रतिशत की वृद्धि दे रहे हैं, यह है जातिवादी मानसिकता  का सबसे अच्छा उदाहरण जो भाजपा की राजनीति को दर्शाता है। जब कोई पिछली 200 बिंदु प्रणाली को देखता है, तो यह प्रकृति में बहुत समावेशी था,नई व्यवस्था सीधे हमें बहिष्कृत कर रही है, हमें द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में देखा जा रहा है, मैं पहली पीढ़ी का शिक्षार्थी हूं, अगर मैं आज विरोध नहीं करता, तो मैं नहीं करता विश्वास है कि कोई भी आगे बढ़ने और शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम होगा।

विद्या सागर.jpg

डीयू  के अस्थाई शिक्षक अमित ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि ये नई व्यवस्था बहुजनों  को विश्विद्यालयों से बाहर करना चाहती है जो काफी लंबे संघर्ष के बाद आज विश्विद्यालयों में पहुँच रहे है उसे भी बाहर करने में लगी है इसमें कोर्ट और सरकार दोनों कि मिलीभगत है यह संघ समर्थित मोदी सरकार हर वो निर्णय जो दलित बहुजनो के खिलाफ है उसे कोर्ट के माध्यम से ला रही ।

 

“ यह लड़ाई संविधान को बचाने की लड़ाई है”

डीयू के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज के शिक्षक अब्दुल हफीज़ के अनुसार संविधान प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करने एवं सामाजिक न्याय के प्रावधानों को ध्वस्त करने की कुटिल चाल है ।

 यह 13 प्वाइंट डिपार्टमन्टल रोस्टर सिस्टम...

जिसे न्यायालयों के रास्ते लाने की कोशिश है...

लेकिन जो पद्धति संविधान के आदेशों का पालन ना करती हो...

वह पद्धति अपने अस्तित्व में ही असंवैधानिक है...

 चाहे वह न्यायालयों के गलियारों से ही क्यूं ना परोसा गया हो...

उनके अनुसार यह लड़ाई संविधान को बचाने की लड़ाई है...!

यह लड़ाई अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने की लड़ाई है...!

यह लड़ाई ना सिर्फ अपने को, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को बचाने की लड़ाई है...!

यह लड़ाई सामाजिक न्याय की लड़ाई है...!

 

 

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