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भारत
राजनीति
मोदी काल: पत्रकारिता के लिए बर्बादी के साल
बीते कुछ समय में समाचार समूहों द्वारा सत्ता विरोधी खबरों को दबाया गया या दबाव के कारण ऐसी खबरों को वापिस ले लिया गया।
हर्ष कुमार
26 Jun 2018
अमित शाह

लोकतंत्र के चौथे खम्भे यानी मीडिया की आवाज़ को दबाने की कोशिश समय-समय पर सत्ता द्वारा की जाती रही है। चाहे 1975 में इमरजेंसी के दौरान पत्रकारों की अभिव्यक्ति छीनना हो या मौजूदा समय में एक अप्रत्यक्ष इमरजेंसी का दौर पैदा करना हो। पेरिस स्थित एनजीओ “रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर” के 2018 के अध्ययन अनुसार पत्रकारों की स्वतंत्रता की श्रेणी में भारत 180 देशों में 138वें स्थान पर है। मौजूदा भाजपा के 4 साल के शासन काल में पत्रकारिता जगत में खौफ का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन सालों में कई बार समाचार समूहों  ने सत्ता विरोधी खबरों को दबाया  या राजनीतिक दबाव के कारण ऐसी छापी गयी खबरों को वापस ले लिया।

हाल ही में समाचार एजेंसी आई.ए.एन.एस ने मनोरंजन रॉय द्वारा दायर आर.टी.आई के आधार पर एक खबर छापी। आर.टी.आई से खुलासा हुआ कि 8 नवंबर 2016 को लागू की गई नोटबंदी के दौरान महज़ पाँच दिनों (13 नवबंर तक) में अहमदाबाद के ज़िला सहकारी बैंक में 745 करोड़ रुपए जमा किए गए,जो  देश  के किसी भी बैंक के मुकाबले सबसे अधिक है।

यह भी पढ़े अहमदाबाद के एक बैंक और अमित शाह का दिलचस्प मामला

 

शुरुआत में इस खबर को कई समाचार समूहों ने छापा मगर खबर छापने के कुछ ही घंटों के भीतर कई नामी समाचार पत्रों की वेबसाइट जैसे फर्स्टपोस्ट,न्यू इंडियन एक्सप्रेस,टाइम्स नाओ और न्यूज़ 18 ने इसे अपनी वेबसाइट से हटा लिया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी वेबसाइट ने खबर छापकर उसे हटा लिया होI बीते 4 सालों में कई मौकों पर ऐसा होता रहा है जब सत्ता पर आसीन नेताओं के विरोध में जाने वाली खबरों को दबाव में हटाया गया हो।

इससे पहले 9 अक्टूबर 2017 को एन.डी.टी.वी. के मैनेजिंग डायरेक्टर श्रीनिवासन जैन और मानस प्रताप सिंह ने अमित शाह के बेटे जय शाह पर एक खबर छापी जिसका प्रसारण टी.वी पर भी किया गया। खबर में बताया गया कि कैसे जय शाह की कम्पनी को आश्र्चर्यजनक तरह से लोन दिए गए। इस खबर के छपने के एक हफ्ते बाद एन.डी.टी.वी. की वेबसाइट से इसे हटा लिया गया। एन.डी.टी.वी. के अनुसार उन्हें कानूनी कारणों की वजह से ऐसा करना पड़ा। गौरतलब है कि  इससे पहले द वायर ने जय शाह की कम्पनी के मुनाफे में 2014 के बाद आईआश्चर्यजनक बढ़त पर एक खबर छापी थी । बड़े मीडिया संसथान इस खबर पर अधिक जानकारी इकठ्ठा करने और इस पर बात करने तकसे बचते नज़र आयेI

 

14 सितम्बर 2017 को टाइम्स ऑफ इंडिया के जयपुर संस्करण ने मोदी सरकार की “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना“ की आलोचना करते हुए एक लेख छापा था। लेख में में बताया गया कि कैसे इस योजना का लाभ किसानों को मिलने की बजाए बीमा कम्पनीयों को मिल रहा हैI रिर्पोट के अनुसार अप्रेल 2017 तक इस योजना से बीमा कम्पनीयों को 10 हज़ार करोड़ का मुनाफा हुआ है। इस खबर को अख़बार की वेबसाइट से कुछ ही घंटों के बाद हटा लिया गया।

 

जुलाई 2017 में टाइम्स ऑफ इंडिया के अहमदाबाद संस्करण ने अमित शाह से जुड़ी खबर छापी थी।अख़बार ने यह खुलासा किया कि  2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव और 2017 के राज्यसभा चुनाव में अमित शाह द्वारा दायर हलफनामें से मालूम चलता है की 5 साल में उनकी संपत्ती में 300 फीसदी का इज़ाफा हुआ है।लेकिन खबर प्रकाशित होने के कुछ ही घंटो के भीतर अख़बार की वेबसाइट से इस खबर को हटा लिया गया । अखबार की ओर से इस बाबत कोई स्पष्टीकरण नहीं आया की ख़बर क्यों  हटाई गई।

इसी कड़ी में मई 2014 में टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और इकोनॉमिक टाइम्स ने स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर एक खबर छापी थी। खबर के अनुसार स्मृति ईरानी ने 2014 लोकसभा चुनाव में दायर हलफनामे में अपनी शैक्षणिक योग्यता दिल्ली  विश्विद्यालय के स्कूल ऑफकॉर्रेस्पोंडेंस से बीकॉम पार्ट वन 1994 बतायी थी।यही जानकारी उन्होंने 2011 के राज्यसभा चुनाव में भी दी थी, लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव में ईरानी द्वारा दायर हलफनामे में उन्होंनेबताया था कि 1996 में दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.ए  की परीक्षा उत्तीर्ण की है। इस खबर को भी कुछ समय बाद ऊपर की तीनों वेबसाइट नहटा लिया।

smriti irani

 यह भी पढ़े  कोबरापोस्ट जाँच : पत्रकारिता की पवित्रता गहरे खतरे में

ग़ौरतलब है कि हाल ही में क पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या कर दी गई थी जिसके बाद कशमीरी विधायक लाल सिंघ ने पत्रकारों  को धमकाते हुए कहा की अपनी सीमा में रहें नहीं तो उनका हाल भी  शुजात की तरह हो जाएगा।इस तरह के बयान दर्शातें हैं कि किस कदर मौजूदा आलाकमान विरोध में उठ रहीं किसी भी आवाज़ को कुचल देना चाहती है ।

 

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